Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

स्वयूथ्यान्प्रति सद्भाव, सनाथाऽपेत कैतवा। प्रतिपत्तिर्यथायोग्यं, वात्सल्यमभिलप्यते।।

सद्भाव सहित और मायाचारी से रहित होकर साधर्मियों की यथायोग्य सेवा करना वात्सल्य कहलाता है।

Serving one's co-religionists appropriately, with goodwill and free of deceit, is called vatsalya (affectionate loyalty).

— आराध्य सूत्र · #1

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति