Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 8 / 41

मुस्कुराओ! गुलाब काँटों में मुस्कुराता है, आप भी प्रतिकूलता में मुस्कुराओ तो लोग आपसे गुलाब की तरह प्रेम करेंगे। जीवन में सुख आये तो हँस लेना और दुःख आये तो उसे हँसकर उड़ा देना।
संतोष
उन्मुक्त अट्टहास नई प्रेरणा, स्फूर्ति और विचारों का स्रोत है। जिस प्रकार वनस्पतियों के लिए खुली धूप की जरूरत होती है उसी प्रकार मनुष्य के लिए हँसना टॉनिक का काम करता है। मुख मण्डल हृदय का दर्पण है।
स्वास्थ्य
पशुओं के लिए माता दुग्धपान तक ही माता रहती है, अधम व्यक्तियों के लिए विवाह पर्यन्त तथा मध्यम व्यक्तियों को गृह कार्य देखभाल करने तक माता रहती है, उत्तम व्यक्तियों को तो माता जीवनपर्यन्त तीर्थ के समान रहती है।
परिवार
पुत्र पिता के सामने भूमि पर बैठा हुआ जैसा अच्छा लगता है वैसा सिंहासन पर नहीं। पुत्र को पिता के चरण दबाने में जो सुख मिलता है, वह राज्य पर शासन करने में नहीं। उसे पिता की जूठन खाने में जो सुख मिलता है, वह तीनों लोकों को भोगने में नहीं।
परिवार
क्रोध को जीतने के लिए मौन हो जाना, उस जगह को बदल देना, विषय को बदल लेना, अपने हाथ पैर मुँह को ठंडे पानी से धो लेना, दर्पण में अपना चेहरा देखना, अपने मुँह में पानी भर लेना, कुछ समय के लिए श्वास रोक लेना, परमात्मा की मुद्रा को देखना, आदि सूत्रों के उपयोग से क्रोध पर विजय पाई जा सकती है।
क्षमा
ईश्वर ने सबको अपना-अपना गुण दिया है जिससे सबका सम्मान होता है। कोयल की शोभा मधुर स्वर में है, स्त्री की शोभा उसके पतिव्रत होने में है, कुरूप की शोभा उसके विद्वान् होने से है, तपस्वी त्यागी की शोभा उसके क्षमा, शील, संयम से है। यदि कोई तपस्वी होकर भी अति क्रोधित हो जाये तो समाज में उसका सम्मान नहीं होता क्योंकि विपरीत गुणों में सम्मान नहीं मिलता है।
क्षमा
क्रोध से ज्यादा खतरनाक वैर है क्योंकि क्रोध तो अल्प समय के लिए आता है किन्तु वैर की गाँठें वर्षों तक कब्जा जमाए रहती हैं, जिससे आपसी बोल-चाल भी बंद हो जाती है और प्रेम-स्नेह के सम्बन्ध खत्म हो जाते हैं तथा सुलह के सारे रास्ते भी बंद हो जाते हैं और इसी से तनावपूर्ण जीवन हो जाता है सदैव आर्त-रौद्र ध्यान चलता रहता है, जिससे नियम से अधोगति में जाना पड़ता है।
क्षमा
वैर की सड़ांध संड़ास की तरह होती है, जिससे जीवन का एक क्षण भी शान्ति से नहीं कटता है, अतः क्रोध को छोड़िये क्योंकि क्रोध नहीं होगा तो वैर की उत्पत्ति ही नहीं हो सकती है। आग में खेलने वालों का अन्त राख की ढेरी है।
क्षमा
जातीय गुटों के संघर्ष के कारण कर्फ्यू में ड्यूटी दे रहे एस.पी. के मुँह पर एक लड़के ने थूक दिया इंस्पेक्टर ने लड़के के माथे पर रिवाल्वर तान दी, एस.पी. ने रोका रुमाल से पोंछकर कहा जो काम रुमाल से हो जाये उसके लिए रिवाल्वर चलाने की क्या आवश्यकता है।
क्षमा
क्रोध को काबू में रखने से उसके फायदे अनेक हैं, स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहेगा, पारिवारिक रिश्ते बहुत मधुर रहेंगे, मैत्रिक व्यवसायिक सम्बन्ध मधुर रहेंगे, आपकी छवि बहुत ही खास रहेगी, इज्जत मिलेगी, शोहरत मिलेगी, सफलता मिलेगी, हर परिस्थिति में तालमेल बैठा सकेंगे।
क्षमा
क्रोध के लक्षण शराब और अफीम दोनों से मिलते हैं, शराबी की भाँति क्रोधी मनुष्य भी पहले आवेश वश लाल-पीला होता है, फिर आवेश के मन्द पड़ जाने पर भी यदि क्रोध न घटा तो वह अफीम का काम करता है और मनुष्य की बुद्धि को मन्द कर देता है, अफीम की तरह वह दिमाग को कुतर कर खा जाता है।
क्षमा
ब्राह्मणों के क्रोध को दान से, वैश्यों के क्रोध को मीठे वचनों से, क्षत्रिय के क्रोध को आदर सम्मान से, शूद्र के क्रोध को शक्ति से व गुरुजनों के क्रोध को प्रणाम करके शान्त करना चाहिए।
क्षमा
जिसे दूसरे की सुविधा व दूसरे को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता है वह जिंदगी में कुछ भी नहीं कमा पाता है यहाँ तक कि संतोष भी नहीं मिलता है।
विनम्रता
मनुष्य का स्वभाव होता है कि जब वह दूसरे पर दया करता है तो वह चाहता है कि याचक पूरी तरह विनम्र होकर उसे स्वीकार करे, अगर याचक दान लेने में कहीं भी स्वाभिमान दिखलाता है तो आदमी अपनी दानव वृत्ति और दयाभाव भूलकर नृशंसता से उसके स्वाभिमान को कुचलने में व्यस्त हो जाता है।
दान
बुढ़ापा रूप (सुन्दरता) को, आशा धीरता को, मृत्यु प्राणों को, दोष देखने की आदत धर्माचरण को, क्रोध लक्ष्मी को, नीच पुरुषों की सेवा सत्स्वभाव को, काम लज्जा को और अभिमान सर्वस्व को नष्ट कर देता है।
चरित्र
मुनियों को नमस्कार करने से उच्च गोत्र, दान देने से भोग, उपासना से पूजा प्रतिष्ठा, भक्ति से सुन्दर रूप की और स्तवन से कीर्ति की प्राप्ति होती है।
भक्ति
जितना प्रयत्न व परिश्रम परद्रव्य के उपार्जन या रक्षण में किया जाता है, उससे भी कम प्रयत्न यदि समता भाव के सम्भालने में किया जावे तो सांसारिक वैभव तो अनायास व अनाकुल सुख की प्राप्ति भी अविलम्ब होगी।
संयम
जो आत्मा जिस भाव रूप परिणमन करता है, वह उस भाव के साथ तन्मय हो जाता है, अतः अर्हन्त के ध्यान में तन्मय आत्मा स्वयं भाव अर्हन्त हो जाता है।
ध्यान
पर द्रव्य का आश्रय कर कुछ भी विचार कर दुःखी हो लो और आगे के लिए कर्म बाँध लो किन्तु परद्रव्य कभी सहायक नहीं होगा, मात्र अपने समता परिणाम का ही विश्वास रखो और समता सुधा का पान कर अमर बनो।
संयम
जीवन में सरलता से बढ़कर सुख नहीं, यदि पलकें झुकाकर जियोगे तो दुनिया पलकें बिछा देगी। दूसरों के प्रति उदारता, अपने प्रति कृपणता रखना ही दयालुता है।
विनम्रता
वासनाओं में लिपटे लोग इस योग्य नहीं कि हम उनके सामने भक्ति से सर झुकाये, वैराग्य और परमात्मा से दिल लगाना ही वे महान् गुण हैं जिनकी चौखट पर बड़े-बड़े वैभवशाली और प्रतापी लोगों के सिर भी झुक जाते हैं।
अनासक्ति
दुःख देने वाले व्यक्ति को शिक्षा अथवा दण्ड देने का यही एक उत्तम उपाय है कि तुम उसके बदले में भलाई करो जिससे वह मन ही मन लज्जा से भर जावे, यही उसके लिए गहरी मार है।
क्षमा
यदि तुम्हारा पड़ोसी जानबूझ कर झगड़ा करने की भावना से तुम्हें सताता हो तो भी सर्वोत्तम बात यही है कि तुम अपने हृदय में बदले की भावना न रखो और न बदले में चोट पहुँचाओ।
क्षमा
छल, कपट, धोखा, मायाचारी करने वाला व्यक्ति मोर के समान होता है जैसे मोर देखने में सुन्दर, बोलने में मधुर बोलता है किन्तु उसका भोजन सर्प होता है।
सत्य
जहाँ भी छल-कपट है वहाँ अपने सद्भावों की हत्या है, शुभ विचारों का नाश है, शुभ विचारों के अभाव में पतन निश्चित है इसलिए कपटवादी नहीं स्पष्टवादी बने।
सत्य
विद्या, तप, धन, शरीर, युवावस्था और उच्चकुल ये छह सज्जनों के लिए गुण और दुष्टों के लिए दुर्गुण हैं जिनके कारण विवेक के नष्ट होने पर अभिमानी और दोषपूर्ण दृष्टि वाले होकर वे दुष्ट लोग महापुरुषों की तेजस्विता को नहीं देख पाते हैं।
विवेक
कर्ज होना गृहस्थ का कष्ट है, धन रखना योगियों का कष्ट है, आभूषण धारण करना विधवा का कष्ट है, भागना राजा का कष्ट है, पति का परस्त्री आसक्त होना स्त्री का कष्ट है, पुत्र का कुपुत्र होना माता-पिता का कष्ट है, स्त्री का योग्य न होना पति का कष्ट है और मन में संतोष न होना सभी का कष्ट है।
संतोष
जिस प्रकार काठ अपने ही अंदर से प्रकट हुई अग्नि द्वारा भस्म होकर खत्म हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य अपने ही भीतर रहने वाली तृष्णा से नाश को प्राप्त होता है।
संतोष
संतोषरूपी अमृत से जो लोग तृप्त होते हैं उन्हें जो शान्ति व सुख की प्राप्ति होती है, वह धन के लोभियों को जो इधर-से-उधर दौड़ते हैं, उन्हें प्राप्त नहीं होती है।
संतोष
दुनिया में कोई भी सन्तुष्ट नहीं है—गरीब अमीर होना चाहता है, अमीर सुन्दर दिखना चाहता है, कुँवारे शादी करना चाहते हैं और शादीशुदा मरना चाहते हैं।
संतोष