Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 7 / 41

चिन्ता के दुष्परिणाम—१. मन का उदास रहना, २. बुद्धि का भ्रष्ट होना, ३. मस्तिष्क का भारीपन होना, ४. चेहरे का मुरझाना, ५. शरीर की शक्ति का क्षीण होना, ६. क्रोधी स्वभाव का होना, ७. बालों का सफेद होना, ८. समय से पूर्व वृद्धत्व का आगमन होना है।
स्वास्थ्य
क्या बताऊँ बहन जब बहू थी, तो अच्छी सास नहीं मिली और अब सास बनी तो अच्छी बहू नहीं मिली अर्थात् महिलाएँ प्रायः अपनी गलती न स्वीकार करना चाहती हैं और न सुधरना चाहती हैं।
परिवार
जीवन में पहले दिन से कुछ न कुछ दान करने की आदत डालें, अगर आप दस हजार की आमदनी में दान नहीं कर सकते तो दस लाख होने पर भी नहीं कर पायेंगे। गुप्त दान को प्राथमिकता देनी चाहिए।
दान
हमें जो मिलता है, उससे हमारी जिन्दगी चलती है, जो देते हैं उससे जिन्दगी बनती है। दान देने से पहले अपने कमजोर भाई को सहारा दो क्योंकि भगवान् से ज्यादा आपके भाई को आवश्यकता है। स्वयं जाकर दिया गया दान उत्तम, अपने यहाँ बुलाकर दिया गया दान मध्यम और माँगने पर दिया गया दान अधम व सेवा के बदले दान देना निष्फल है।
दान
एक व्यक्ति जिसके पूर्वज बहुत ही सम्पत्ति छोड़ गये थे और वर्तमान में भी अच्छा व्यवसाय है, निरोग है, पढ़ा-लिखा है लेकिन प्रतिसमय खाते-पीते, सोते-जागते भय बना रहता है क्योंकि उसने पूर्व में अभयदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति के पास बहुत पैसा है, लक्ष्मी सम्भाले नहीं सम्भल रही, किसी प्रकार का भय भी नहीं है, वह विद्वान् है लेकिन हमेशा रोगी ही बना रहता है, मूँग की दाल भी नहीं पचती क्योंकि उसने पूर्व में औषधिदान नहीं दिया था।
दान
दान से सम्पत्ति घटती नहीं, बढ़ती है, अँगूरों की शाखाएँ काटने से और अधिक अँगूर आते हैं। दानी के चरित्र का पता दान की अपेक्षा देने की विधि से अधिक लगता है।
दान
दुष्ट पुरुषों का बल है 'हिंसा', राजाओं का बल है दण्ड देना, स्त्रियों का बल है सेवा अथवा रोना, सत्पुरुषों का बल है धन, असफल व्यक्तियों का बल है धैर्य, गुणवानों का बल है क्षमा, संतों का बल है साधना।
चरित्र
इस असार एवं दुःख पूर्ण संसार में अनन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल व्यतीत हो गए, उन समस्त कालों में यही मन्त्रराज महत्त्वपूर्ण रहा है अर्थात् अतीत काल में जिन भव्य प्राणियों ने मुक्ति पाई है, विदेहादिक से वर्तमान काल में पा रहे हैं, पाँच भरत और पाँच ऐरावत क्षेत्र से भविष्यत् काल में मुक्ति पायेंगे, यह सब मन्त्रराज का ही प्रभाव जानना चाहिए।
णमोकार
यदि कोई तराजू के एक पलड़े पर णमोकारमन्त्र को स्थापित करे तथा दूसरे पलड़े पर त्रिलोक की सम्पत्ति को स्थापित करें तो प्रथम पलड़ा ही भारी होगा, ऐसे महान् गौरवशाली णमोकारमन्त्र को ''मैं त्रियोग की शुद्धिपूर्वक नमस्कार करता हूँ''।
णमोकार
जो व्यक्ति स्वभाव से धैर्यवान है, वह महान् विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होता, संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है, अपने धैर्य के बिना और कोई संकट से मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता, सज्जनों का धन तो धैर्य ही है जिसके पास धैर्य है, वह जो भी इच्छा करता है उसे प्राप्त कर सकता है।
चरित्र
सब कुछ खोने से बुरा क्या है? वो उम्मीद खोना जिसके भरोसे सब कुछ वापस पा सकते हैं। दुर्घटना को भी अवसर बनाना सीखना है, गिरो तो कुछ उठाकर ही उठना है।
चरित्र
भरी नदी की भाँति व्यवहार, वचन और भावों में गंभीरता होना चाहिए चाहें, बिजली कितनी ही तड़के पर आकाश में खलबली नहीं मचती है, विविध लहरों में भी निश्चलता यही समुद्र का सच्चा गांभीर्य है।
चरित्र
असावधानी विनाश को शीघ्र ही बुलाती है, सचेत रहो, सावधानी रखो, जीवन महल के किसी भी दरवाजे से काम-क्रोध रूपी किसी भी चोर को अंदर न घुसने दो और सावधानी के साथ जो पहले से घुसे बैठे हों, उन्हें दृढ़ता और शूरता के साथ निकालने की प्राणपन से चेष्टा करते रहो, सावधानी ही साधना है।
संयम
कामान्ध को कुछ नहीं दिखता, जो नशा करके मदोन्मत्त हो जाए उसे भी कुछ नहीं दिखता और जो किसी स्वार्थ के लोभ से अन्धा हो जाता है उसे भी किसी काम में कोई दोष दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति
अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए, उस साध्य के सिद्ध होने तक दूसरी किसी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए, रात-दिन सपने तक में उसी की धुन रहे, तभी सफलता मिलती है।
पुरुषार्थ
जैसे समरभूमि में युद्ध हो या न हो परन्तु योद्धा प्रतिक्षण तैयार रहते हैं क्योंकि पता नहीं शत्रु कब आक्रमण कर दे? वैसे ही साधक प्रतिक्षण तैयार रहते हैं क्योंकि पता नहीं मृत्यु कब आक्रमण कर दे?
समाधि
अपने गुरु के प्रति अपने प्रभु के प्रति अपने पति के प्रति यदि अशुभ परिणाम हो रहे हों तो बस समझ लेना कि मेरी खोटी गति का बंध हो गया है व मेरे तीव्र पाप कर्म का उदय चल रहा है।
कर्म
सच्ची शिक्षा—ममता छोड़ो मनन करो, बाधक नहीं साधक बनो, भोले नहीं पर सरल बनो, स्वच्छन्द नहीं पर स्वतन्त्र बनो, कुटिल नहीं पर चतुर बनो, मानी नहीं पर महान् बनो, कृतघ्नी नहीं कृतज्ञ बनो, क्रूर नहीं करुणा करो, शत्रुता नहीं मित्रता करो, हैवान नहीं इंसान बनो, भोगी नहीं योगी बनो, ईर्ष्यालु नहीं सच्चे इंसान बनो, कंस नहीं कृष्ण बनो, रावण नहीं राम बनो, मरीचि नहीं महावीर बनो।
ज्ञान
दुनिया पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं करना, वह कब, किस ओर लुढ़क जाए पता नहीं, गुरु जो रास्ता दिखाए, बस उसी पर चलना। वह सुई कभी नहीं खोती जिसमें धागा होता है। उसी प्रकार वह जीव कभी नहीं रोता जिसके अंदर जिनवाणी रूपी सूत्र होता है।
भक्ति
समय पर रोने से आँसू भी मोती बन जाते हैं और असमय पर हँसी व मुस्कुराहट भी मौत बन जाती है। समय के साथ चलो वरना पीछे रह जाओगे और पछताओगे।
समय
गुस्सा अक्ल को खा जाता है, अहंकार मन को खा जाता है, चिन्ता आयु को खा जाती है, रिश्वत इंसान को खा जाती है, लालच ईमान को खा जाता है और झूठ सभी गुणों को खा जाता है।
चरित्र
सत्य पर कोई विश्वास नहीं करता, झूठ पर सब विश्वास करते हैं, शराब बेचने वाले को कहीं नहीं जाना पड़ता, दूध बेचने वाले को गली-गली जाकर बेचना पड़ता है, इसी प्रकार सत्य को बार-बार परीक्षा देनी पड़ती है।
सत्य
प्रसन्नचित्त व्यक्ति जहाँ कहीं भी जाता है, वहाँ अपना प्रभाव छोड़ आता है, वह सबको उत्साहित करने के साथ-साथ प्रेरणा देना, प्रसन्न रहना सिखाता है, ऐसा प्रसन्नचित्त व्यक्ति धूप की वह किरण है जिसका अत्यन्त सुखद प्रभाव खेतों और वनस्पतियों पर पड़ता है।
संतोष
मुस्कुराहट थके हुओं के लिए आराम है, निराश लोगों के लिए आशा की किरण है, दुःखी लोगों के लिए सूर्य की रोशनी है और कष्टों के लिए प्रकृति की सबसे बेहतरीन दवा है।
संतोष
मुस्कुराहट मोल नहीं मिलती, न ही इसे चुराया जा सकता है, न ही उधार लिया जा सकता है, न ही भीख में मिलती है क्योंकि इसका तब तक कोई मोल नहीं है, जब तक कि इसे दूसरों को नहीं दिया जाता है।
संतोष
जो बहुत खिल-खिलाकर हँसते हैं, समझ लो भीतर-ही-भीतर बहुत दुःखी होते हैं, बात-बात पर हँसी भरे-पूरे जीवन का चित्र नहीं उभारती, जीवन की शून्यता और दर्द को उभारती है।
मन
हँसी मन की गाँठें बड़ी आसानी से खोल देती है, हँसकर भी जीना है रोकर भी जीना है जब जीना ही है तो क्यों न हँसते-हँसते जिया जाये। अमीर दिल ही मुस्करा सकता है।
संतोष
पता है तुम्हारी और हमारी मुस्कान में क्या फर्क है? तुम खुश होकर मुस्कुराते हो, हम तुम्हें खुश देखकर मुस्कुराते हैं। मुस्कुराना एक ऐसा उपहार है बिना मोल के भी जो अनमोल है, देने वाले का कुछ कम नहीं होता पाने वाला निहाल हो जाता है।
संतोष
जो व्यक्ति प्रसन्न स्वभाव का होता है वह निश्चय ही किसी भी कठिन से कठिन कार्य को सफलतापूर्वक करके संतोषप्रद परिणाम ले सकता है। एक प्रसन्न चित्त युवक जीवन के अभिशाप को वरदान में बदल सकता है।
संतोष