Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 9 / 41

सुख का मूल संतोष है, एक आदमी जल और स्थल के सारे रत्न पाकर गरीब रह सकता है और एक आदमी फटे वस्त्रों और रूखी रोटियों में भी धनी हो सकता है।
संतोष
सुनना चाहते हैं इसीलिए न सुनने का दुःख होता है। देखना चाहते हैं इसीलिए न दिखने का दुःख होता है। बल चाहते हैं इसीलिए निर्बलता का दुःख होता है। जवानी चाहते हैं इसीलिए वृद्धावस्था का दुःख होता है। तात्पर्य है कि वस्तु के अभाव में दुःख नहीं होता, वस्तु की चाहत से, उसके अभाव का अनुभव करने से दुःख होता है।
संतोष
लोग व्यक्ति विशेष के आदर में भी धर्म का ही आदर करते हैं। यदि कोई व्यक्ति माने कि मेरा आदर है तो वही ठगाया गया, पतित हुआ, दुःखी हुआ, दुःखों का बीज बो चुका, लोगों की कोई हानि नहीं हुई, उन्होंने शुभोपयोग का लाभ ही उठाया है, घात तो उसी का हुआ जिसने भ्रम किया।
विनम्रता
अजीब चाहत होती है इंसान की जो प्राप्त है उसका आनंद नहीं उठाता क्योंकि इंतजार है थोड़ा और प्राप्त हो जाए और यह थोड़ा कभी खत्म ही नहीं होता है।
संतोष
बाह्य परिकर (भोग-उपभोग की सामग्री एवं नौकर चाकर) से भी शान्ति नहीं मिलती है इसके उदाहरण देखने हो तो सम्राट, मन्त्री, श्रीमन्तों के समीप जाकर देखो।
संतोष
लोभ से ही क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से ही काम की प्रवृत्ति होती है और लोभ से माया, मोह, अभिमान, उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं।
संतोष
मनुष्य को जितना अधम जुआ बनाता है उतना और कोई नहीं क्योंकि इससे उसकी कीर्ति, विद्वत्ता और सम्पत्ति; ये सब उसका साथ छोड़ देते हैं, उसका हृदय कुकर्म करने की प्रेरणा पाता है यहाँ तक कि खाने और कपड़े तक के लिए भीख माँगनी पड़ती है।
चरित्र
कंजूस धन का रक्षक होता है उसका जीवन गाय चराने वाले चरवाहा की तरह होता है, जो दिन भर गाय चराता है रात भर मच्छर उड़ाता है।
दान
सूर्योदय के पहले सभी को सोकर उठ जाना चाहिए यदि पति न भी उठ पाये तो पत्नि को तो उठ ही जाना चाहिए क्योंकि यदि गृहलक्ष्मी सूर्योदय के बाद तक सोती रहती है तो उसके यहाँ की धनलक्ष्मी भाग जाती है।
समृद्धि
जो दुःख से पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी, अजितेन्द्रिय और उत्साह रहित है, उनके यहाँ लक्ष्मी का वास नहीं होता है।
समृद्धि
यदि नदी में नहाते हो तो सैंकड़ों टन पानी सिर पर होने पर भी वजन मालूम नहीं होता किन्तु जब उस पानी को घड़े में भरकर सिर पर रखते हो तो पानी भार लगता है, कारण पानी को अपना मान लिया, ठीक उसी प्रकार संसार में, परिवार में, पदार्थों में रहना परिग्रह नहीं है किन्तु उन्हें अपना मानना परिग्रह है।
अनासक्ति
दुनिया में सबसे बड़ा ग्रह परिग्रह है, जिसके पास परिग्रह है उसे ही नवग्रह परेशान करते हैं। आश्चर्य है, लोग जीने के लिए धन कमाते हैं और धन की सेवा करते-करते मर जाते हैं। भोजन को पचाना आसान है, पर दूसरों के धन को पचाना आसान नहीं है।
अनासक्ति
दूसरे का धन तुम्हारा हो सकता है किन्तु दूसरे का धर्म कदापि तुम्हारा नहीं हो सकता है। पैसे कमायें मगर कमाते वक्त यह भी सोचें कि हमारा लक्ष्य क्या है?
धर्म
धन यदि अच्छे मार्ग से आता है तो वह अच्छे कार्यों में ही खर्च होगा और यदि अन्यायपूर्वक कमाया गया होगा तो उसके व्यय के रास्ते भी पाप के ही होंगे।
धन
पैसे से भोजन खरीदा जा सकता है, लेकिन भूख नहीं, पैसे से हँसी खरीदी जा सकती है मगर खुशी नहीं, पैसे से बिस्तर मिल सकते हैं नींद नहीं, किताबें मिल सकती है मगर ज्ञान नहीं, घड़ी मिल सकती है मगर समय नहीं, साथी मिल सकता है मगर दोस्त नहीं, चमक-दमक मिल सकती है मगर खूबसूरती नहीं, मकान मिल सकता है मगर घर नहीं, दवा मिल सकती है मगर सेहत नहीं, अँगूठी मिल सकती है मगर जीवन साथी नहीं, इसलिए पैसों को ज्यादा महत्त्व न दें, उसका अहंकार न करें, पर स्वाध्याय से आप जो चाहे वह सब मिल सकता है।
धन
इस दुनिया में परमात्मा सभी को नब्बे रुपये देकर भेजता है किन्तु लोग पूरे सौ करने के चक्कर में नब्बे का सुख नहीं भोग पाते, लेकिन हाँ, जो दस कम है उसका दुःख जरुर भोगते हैं और सौ कभी होते नहीं हैं, किसी के इंक्यानवे, बानवे, तेरानवे हो जाते हैं तो किसी के चौरानवे, पंचानवे, छयानवे हो जाते हैं और किसी-किसी के तो निन्यानवे तक हो जाते हैं किन्तु सौ किसी के भी नहीं हो पाते और वे सब यहीं छोड़कर चले जाते हैं।
संतोष
दुनिया में वे लोग अभागे नहीं जिनके पास दुकान-मकान, कार-बंगला, धन-दौलत, पुत्र-सम्पदा नहीं, बल्कि सच्चे अभागे तो वे हैं जिनके पास प्रभु भक्ति के लिए और सत्संग के लिए समय नहीं है अर्थात् जिनके ऊपर प्रभु की छत्रछाया व गुरु की कृपा नहीं है।
भक्ति
कर्जे में डूबा कोई भी व्यक्ति मानसिक शान्ति का दावा नहीं कर सकता है। आप एक बार कर्ज लेंगे, परन्तु कर्ज बार-बार आपकी चेतना पर हावी हो जाएगा और आप महसूस करेंगे कि आप अपने ही मालिक नहीं रहे हैं।
धन
संसार में रत्नत्रय से बढ़ा कोई वैभव नहीं है, अतः उसकी रक्षा करनी चाहिए मनुष्य वस्त्रों के बिना शोभित हो सकता परन्तु लज्जा व धैर्य के बिना नहीं।
धर्म
जो मैला वस्त्र रखने वाला, दाँतों का मैल साफ न करने वाला, अधिक भोजन करने वाला, कटुवादी, सूर्य उदय तक सोने वाला है उसे लक्ष्मी छोड़ देती है चाहे वह भगवान् ही क्यों न हो?
समृद्धि
भवितव्यता जिस पदार्थ को नहीं चाहती, उसे तुम अत्यन्त चेष्टा करने पर भी नहीं रख सकते और जो वस्तुएँ तुम्हारी हैं, तुम्हारे भाग्य में हैं, उन्हें तुम इधर उधर फेंक भी दो, फिर भी वे तुम्हारे पास से नहीं जावेंगी।
कर्म
मित्रता का सम्बन्ध आँख और हाथ के रिश्ते जैसा है, हाथ को चोट लगती है तो आँख आँसू बहाती है और आँख रोती है तो हाथ आँसू, पोंछते हैं।
संगति
तप, दान, व्रत, शील, संयम आदि के धारण करने की ओर जो प्रेरित करे वही तीनों लोकों में परम मित्र है और जो इन कार्यों में विघ्न करता है तथा हिंसा, असंयम और प्रमाद आदि को प्रेरित करता वह परम शत्रु है।
संगति
उत्सव में, कष्ट आने पर, अकाल में, शत्रु संकट में, राज्यद्वार पर और शमशान तक जो साथ देता है वहीं बंधु है।
संगति
विदेश में विद्या और घर में पत्नी मित्र होती है रोगी का मित्र औषधि और मृतक का पर लोक में मित्र धर्म ही है।
संगति
दोस्त बनाने का 'रॉ' मटीरियल है मुस्कान, बिना कुछ खर्च किए केवल प्रसन्नता देकर आप ढेर सारे दोस्त पा लेते हैं जो आपकी जीत के लिए आपको प्रोत्साहन रूपी रसायन देते हैं।
संगति
शैक्ष्य काल और बाल्यकाल में माता-पिता, दीक्षा में गुरु, पर लोक में धर्म काम आता है किन्तु मित्र सदा सहायक होते हैं।
संगति
सूर्य कहाँ और कमल कहाँ, मेघ कहाँ और प्रमुदित मयूर कहाँ, चन्द्रमा कहाँ और समुद्र वृद्धि कहाँ? ठीक है दूरी के कारण सत्पुरुषों की मित्रता टूटती नहीं है।
संगति
दीपक मिट्टी का है या सोने का यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह रोशनी कितनी दे रहा है यह महत्त्वपूर्ण है, इसी तरह दोस्त अमीर है या गरीब यह महत्त्वपूर्ण नहीं बल्कि मुसीबत में वह हमारे साथ रहा या नहीं ये महत्त्वपूर्ण है।
संगति
राजा, ब्राह्मण, वैद्य, मूर्ख, मित्र, गुरु और प्रियजनों के साथ कभी विवाद नहीं करना चाहिए। लोग इहलोक-परलोक में मित्र को कभी दुःखी नहीं देखना चाहते हैं।
संगति