समस्तं साम्राज्यं तृणमिव परित्यज्य भगवान्, तपस्यन्निर्माणः क्षुधित इव दीनः परगृहान्। किलाटट्दिक्षार्थी स्वयमलभमानोऽपि सुचिरं, न सोढव्यं किं वा परमिह परैः कार्यवशतः।।
जिन्होनें समस्त साम्राज्य को तृण की तरह छोड़कर के निर्वाण के लिए तपस्या की थी, वे भगवान् भी दीन की तरह भोजन के लिए दूसरों के घरों में जाते रहे, लेकिन भोजन नहीं मिला और क्षुधा परीषह सहना पड़ा, फिर दूसरों को तो अपनी कार्य की सिद्धि के लिए परीषह सहन करना ही चाहिये।
He who abandoned His whole empire like a blade of grass and practised austerity for liberation — even that Lord went like a pauper to others' houses for food, yet found none and had to endure the affliction of hunger. How much more, then, must ordinary people endure hardship to accomplish their own aim.
— आराध्य सूत्र · #17
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