Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 249

संयम सीख-मोती मिला सीप।

50 सूत्र

हड़बड़ी में अधूरी सांस लेना, खुशबू लेना, तास खेलने के लिए समय हैं शुभ कार्य के लिए समय नहीं हैं यह घ्राण इन्द्रिय का असंयम है।
संयम
ऐसे देखो जैसे माँ बेटे को, भाई बहन को, गाय बछड़े को देखती है, कुत्ता बिल्ली की तरह देखना आँख का असंयम है।
संयम
मन्त्र, भजन, प्रवचन सुनना संयम है, गाली, निन्दा एवं अश्लील कथाएँ सुनना कर्ण इन्द्रिय का असंयम है।
संयम
स्पर्शन में हाथी, रसना में मछली, घ्राण में भौंरा, चक्षु में पतङ्ग, कर्ण में हिरण ये पाँचों जीव एक-एक इन्द्रिय के विषय में आसक्त होकर अपने प्राणों को खो देते हैं, फिर जो पाँचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हैं उनका क्या होगा?
अनासक्ति
फुटवाल जिसके पास जाती है वही लात मारता है, इसी प्रकार जीव सुख की आशा से जिस के पास जाता है वही ठुकरा देता है।
अनासक्ति
यदि खेत में वाड़ी न हो तो लहलहाते खेत चौपट हो जाते हैं, इसी प्रकार संयम वाड़ी है संयम न हो तो शेष गुण भी स्थायी नहीं रहते हैं।
संयम
संयमी को देखकर आनन्द नहीं आना, असंयम है।
संयम
घर में भाई का जूठा नहीं खायेगें होटल में और वफर में जूठा खायेंगे, घर में वासी वस्तु नहीं खायेगें होटल में कई दिन पुरानी मेंदा इत्यादि की वस्तुयें खायेंगें।
आहार
डरना है तो पाप से डरो संयम से नहीं। मदिरालय की ओर जाने वाले हजारों कदम हैं, मन्दिर की ओर जाने वाले कम हैं।
धर्म
कोई पदार्थ पहली बार दिखने पर दृष्टि विरागी होती हैं, वही पदार्थ दूसरी बार देखने पर राग होता है, और उसी पदार्थ को तीसरी बार देखने पर प्रायः विवेक नहीं रहता है।
विवेक
तीन गति तेरासी लाख, निन्यानवे हजार, नौ सौ निन्यानवे योनियों में संयम नहीं होता है।
संयम
जैसे 'मृगमरीचिका' को जल समझ कर मृग मरुस्थल में जल के लिये दौड़ लगाते हैं उसी प्रकार संसारी प्राणी पंचेन्द्रिय के विषयोंसे सुख प्राप्त करने के लिये दौड़ लगाते हैं और अन्त में प्राण गवां देते हैं।
अनासक्ति
सम्यक् चारित्र का धारक मनुष्य धनहीन होकर भी मोक्ष का स्वामी हो जाता है और सम्यक् चारित्र से रहित चक्रवर्ती भी दुःखों की सन्तति को प्राप्त होता है।
चरित्र
नट के समान दुरात्मा मनुष्य को बहुत अध्ययन करने से क्या लाभ है, अध्ययन करना और शास्त्र का सुनना तो उसी का सार्थक है जो चारित्र का पालन करता है।
ज्ञान
दुर्जेय इन्द्रियों द्वारा ठगाया गया जो दीन पुरुष जिह्वा को जीतने में असमर्थ रहता है, वह कामादिक उद्दण्ड शत्रुओं को कैसे नष्ट कर सकता है।
संयम
जो सबको भक्षण करने वाली शाकिनी रूप जिह्वा को वश में नहीं कर सकता है, वह दीक्षा लेकर तप करता हुआ लज्जित क्यों नहीं होता है।
संयम
जो जिह्वालोभी मूर्ख मनुष्य भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार नहीं करता है, वह दुर्बुद्धि अभक्ष्य खाकर दुर्गति को प्राप्त होता है।
आहार
मनुष्यों का गृहस्थ रहना अच्छा है परन्तु इन्द्रिय, आहारदोष और रागद्वेषादिक के द्वारा कलङ्कित मुनि पद अच्छा नहीं है।
चरित्र
यथायोग्य निर्दोष आहार करना अच्छा है, परन्तु मासोपवास आदि की पारणा में सदोष आहार करना अच्छा नहीं है।
आहार
एक बार ही प्राणों का नाश करने वाला हालाहल विष खा लेना अच्छा है, परन्तु सदोष आहार लेना अच्छा नहीं है, क्योंकि वह संसार सागर में गिराने वाला है।
आहार
जिस असंयम से आज तक सुख नहीं मिला, अज्ञानी वहीं सुख खोज रहा है।
संयम
तम्बाकु के सेवन से प्रति वर्ष साठ लाख मौतें होती हैं।
स्वास्थ्य
रुद्र मुनि ग्यारहवें गुणस्थान से गिरकर विषयासक्त होकर सप्तम नरक तक में चले जाते हैं।
अनासक्ति
वैज्ञानिकों के अनुसार अनछने पानी की एक बूँद में 'छत्तीस हजार चार सौ पचास' जीव पाये जाते हैं किन्तु जैनाचार्यों के अनुसार असंख्यात जीव होते हैं।
अहिंसा
गृहस्थ की निर्जरा गजस्नान या मथानी की रस्सी की तरह है, एक ओर से निर्जरा होती है और दूसरी ओर असंयम से पुनः कर्म बँध जाते हैं।
कर्म
पंजाब में एक मुस्लिम भाई रोज मुर्गी लाकर घर में काटता था, उनकी पीड़ा पर उसको आनन्द आता था, उसके तीन बच्चे थे, एक बच्चे ने छोटे भाई पर छुरी चलाई, वह चिल्ला कर मर रहा था, यह आनन्द ले रहा था, माँ के डर से वह छत से गिर कर मर गया, माँ छोटे बच्चे को टब में नहला रही थी, उसको छोड़कर ऊपर तक गई तब तक छोटा बच्चा टब में गिरा और डूबकर मर गया। इस प्रकार उसे हिंसा का फल उसी जन्म में मिल गया।
अहिंसा
आचार्यों ने लिखा है- अगर तू इन्द्रियों का दमन नहीं कर पाया तो फिर परमार्थ की दुकान क्यों लगा रखी है। बाहर से धुला हुआ है और अन्दर से मलिन है ऐसे में तेरे हाथ में कुछ भी नहीं लगेगा।
संयम
मुठ्ठी में पत्थर बन्द कर उसे न छोड़ने की इच्छा रखने वाले पुरूष के हाथ में हीरा कहाँ से आ सकता है, कुछ पाना है तो कुछ छोड़ना अनिवार्य हैं।
अनासक्ति
लोग गड़न्त तो छोड़ते है पर मनगड़न्त नहीं छोड़ते हैं।
मन
घर को छोड़ देने पर भी अगर उसका विकल्प नहीं छूटता है तो आत्मा में स्थिरता नहीं आती है।
मन
उपकरण बदले पर लक्ष्य एवं क्रिया कलाप नहीं बदले इसलिए संसार में ही रुल रहे हैं।
विवेक
कषाय जितनी तीव्र होती है व्यक्ति उतने जल्दी विचलित होता है।
क्षमा
विषय वासना का चक्कर सबके लिए अहितकारी है, चाहे वे तीर्थंङ्कर भी क्यों न हों।
अनासक्ति
गम्भीरता के विना तपश्चरण का अनन्द नहीं आता है।
ध्यान
सांसारिक सुख तीन प्रकार का है पहला विषय सुख शहद लपेटी तलवार के सामान, दूसरा देवों का दिव्य सुख जलते हुए चन्दन की लकड़ी के सामान, तीसरा चक्रवर्ती का सुख विष मिश्रित अन्न के समान और सिद्धों का सुख आकुलता रहित होता है।
अनासक्ति
जो स्वयं पर अनुशासन नहीं कर सकता वह दूसरों पर क्या अनुशासन करेगा।
संयम
आग, वज्र, विष और सर्प से एक भव बर्बाद होता है किन्तु भोगों से अनन्त भव बर्बाद हो जाते हैं।
अनासक्ति
विषयासक्ति से देव भी एकेन्द्रियों में जन्म ले लेता है और नारकियों को वहाँ की सामग्री में राग न होने से पञ्चेन्द्रियों में ही उत्पन्न होते हैं।
कर्म
सर्प पिटारे में रहता है तो देवता नजर आता है, घर में निकल आता है तो काल नजर आता है, मिर्च की धूनी और लाठियों से पीटा जाता हैं, उसी प्रकार मनुष्य का मन संयम के पिटारे में रहता है तो धरती पर पूजा जाता है, संयम के अभाव में रावण व कंस की तरह मारा जाता है।
मन
इन्द्रिय जन्य ज्ञान व सुख आत्मानुभव में बाधक है अतः हेय है।
ज्ञान
पेट को नगर पालिका का कचरा घर या कब्रिस्तान नहीं बनाना चाहिए।
आहार
जिसका खान-पान शुद्ध नहीं होता है उसका खानदान शुद्ध नहीं होता है।
आहार
लाख पति भी क्षण भर में खाक पति बन जाता है, महलों में रहने वाला भी सुरक्षा हीन हो जाता है।
धन
षट्काय में स्वयं भी आते हैं, विषय कषाय से स्वयं का घात हो रहा है इस ओर ध्यान ही नहीं है।
अहिंसा
मुखाग्नि बेटा देता है, लेकिन सिगरेट पीने वाले अपने हाथ से ही अपने मुँह में मुखाग्नि देते हैं।
स्वास्थ्य
भिक्षा से भोजन करो, जङ्गल मे निवास करो, भोजन थोड़ा करो, ज्यादा मत बोलो, दुःख सहन करो, निद्रा जीतो, और प्राणी मात्र के प्रति मित्रता रखो एवं वैराग्य धारण करो।
संयम
जब माल होता है, तो दोस्त साथ देते हैं और जब मार पड़ती है, तो दोस्त किनारे हो जाते हैं।
संगति
मासोपवासी मुनि कंस बना– राजा उग्रसेन धर्मात्मा पुरूष थे, एक दिन उनके नगर में एक मासोपवासी मुनिराज का आगमन हुआ, राजा ने नगर में घोषणा करा दी कि मुनि का आहार राज महल में होगा, कोई साधु का पड़गाहन न करे, जब साधु चर्या को आये तब राजा के यहाँ पहली बार दासी का उपद्रव हो गया, साधु वापस चले गये और एक माह का पुनः उपवास ले लिया, पुनः साधु आये तो राजा ने वही घोषणा करायी, दूसरी बार नगर में हाथी का उपद्रव हो गया, पड़गाहन नहीं हो सका, साधु ने पुनः एक माह का उपवास किया, तीसरी बार साधु आये, तो उस समय नगर में आग लग गयी, इस प्रकार चार माह के उपवास हो गये। साधु बगीचे में ध्यान कर रहे थे, वहाँ से लोग निकले और चर्चा करने लगे कि ये राजा कितना दुष्ट है न स्वयं आहार देता है और न ही दूसरों को देने देता है। ये शब्द सुनकर साधु की कषाय भड़क गयी, निदान कर लिया कि अगले भव में मैं इसका बेटा बनूँ, मुनिराज संक्लेश परिणामों से मरे और उसी राजा की रानी के गर्भ में आये, तब रानी को ये भाव हुआ कि राजा के पेट को चीर कर खून पी लूँ, वे मुनि कंस बने और पिता को कारागार में डालकर यातनाएँ दीं।
क्षमा
भूल वश नींद की गोली खाई– जगदलपुर के डॉ. जगदीशचन्द्रमिश्र का बेटा उस दिन स्कूल जाने से मना कर रहा था, माँ ने कहा बेटा आज अन्तिम दिन है, कल से छुट्टियाँ होना है, स्कूल चले जाओ, टेबल पर तुम्हारी गोली रखी है उसको खालो, बेटा ने अपनी गोली के स्थान पर नींद की गोली खाई और स्कूल चला गया, वहाँ उसको नींद आने लगी तो वह क्लास से स्टोर रूम में जाकर सो गया, छुट्टी हो गयी, चपरासी ताला लगा करके चला गया, बच्चा वहीं सोता रहा, जब नींद खुली तो रो-रो कर भूख-प्यास के कारण स्वयं का मूत्र तक पिया और पुस्तकें तक फाड़ कर खालीं और मर गया, पन्द्रह दिन बाद पता चला, माँ की भूल से बच्चे की मौत हो गई।
विविध
पाँच मिनिट सेज पर सोने में ये सजा– एक दासी ने राजा की सेज लगाई और सोचा थोड़ी देर सोकर देखूँ, इतने में राजा आ गया, उसने कोड़े लगाये वह हँसती रही, राजा के पूँछने पर उसने कहा कि पाँच मिनट की इतनी सजा तो आप को कितनी सजा मिलेगी।
अनासक्ति