Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 22

जुबान पर ताला नहीं लगाम चाहिए।

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जल्दबाजी का व्यसन हमें विचार करने का मौका ही नहीं देता, विना विचारे किया गया कार्य सफल नहीं होता है।
विवेक
व्यक्ति को दूसरों से नहीं अपनों से खतरा होता है, गाँधीजी को गोडसे ने मारा, सीता को राम ने वन में छोड़ा, रावण की मौत का कारण विभीषण हुआ, अञ्जना को घर से सास ने निकाला और विपत्ति में पिता ने छाया तक नहीं दी, पाण्डवों को मारने का प्रयास कौरवों ने किया, आदिनाथ को मारीच ने बदनाम किया, भरत ने बाहुबली से युद्ध किया।
संगति
संसार के सब काम ध्यान से करते हैं, जैसे नोट गिनना, गाड़ी चलाना, भोजन करना, टी.वी. देखना आदि सब ध्यान से करते हैं पर माला, पूजा, ध्यान, प्रवचन विना ध्यान के करते हैं।
ध्यान
इतने बड़े बनो कि चिन्ता न सताए व इतने उदार बनो कि गुस्सा न आये, दस प्रतिशत लापरवाही से नब्बे प्रतिशत चिन्ताएँ बढ़ जाती हैं।
मन
इतनी थकान काम करने की मेहनत से नहीं होती जितनी टाल-मटोली की आदत से होती है। हर चीज आसान होने से पहले मुश्किल लगती है।
पुरुषार्थ
यदि पुरुष संसार लक्ष्मी में आसक्त हो जाता है, तो मुक्ति लक्ष्मी उससे दूर हो जाती है और यदि सांसारिक लक्ष्मी की उपेक्षा करता है तो मुक्ति लक्ष्मी निकट आती है।
अनासक्ति
रुकावटों से उबरने का एक ही हल है, हिम्मत न हारना। जैसे शान्त समुद्र से नाविक कभी कुशल नहीं बनता है, जब उसमें लहरें उठती हैं तब नाविक कुशलता प्राप्त करता है।
पुरुषार्थ
जब तक योग्य समय न प्राप्त हो, तब तक अपना बुरा करने वाले के साथ भी सद्व्यवहार करना चाहिए।
विवेक
कषाय का कण मात्र भी यदि जीवित है तो आत्मा के अनन्त तेज 'जो कि स्वाधीन है' उसको नष्ट कर देता है।
संयम
आचरण के विकास का मूल 'भाव शुद्धि' है, पहले चलना सीखो तब दौड़ना आयेगा।
चरित्र
सत् और असत् पुरुषों में बहुत बोलना सत्यव्रत है, सत् और असत् पुरुषों में परिमित बोलना भाषा समिति है, सज्जनों में ही अधिक या कम बोलना सत्य धर्म है इस प्रकार इन तीनों में अन्तर है।
वाणी
नम्रता सबके साथ रखो, मगर नजदीकी बहुत कम लोगों के साथ और उन्हे भी भरोसा करने से पहले परख लो।
संगति
जरूरत से ज्यादा बोलने का मतलब यह नहीं होता कि आप बातचीत में कुशल हैं।
वाणी
गलतियाँ हमें सीखने का अवसर देती हैं, उनसे सीखना बहुत जरूरी है, गलती को दुहराना सबसे बड़ी गलती है।
ज्ञान
अपनी गलती के लिए न तो किसी पर दोष लगायें न बहाने बनायें।
चरित्र
अपनी गलती महसूस करें तो माफी मांगे अपनी सफाई पेश न करें।
विनम्रता
गलती स्वीकार करने से दूसरा व्यक्ति विनम्र हो जाता है।
विनम्रता
बहसबाजी अहङ्कार की लड़ाई से ज्यादा कुछ भी नहीं है, असहमत हुये विना असहमति जताना कला है।
वाणी
आप खुश होंगे तो लोग आपके पास आयेंगे, आप दुखी होंगे तो लोग आँख चुरायेंगे, लोग आपकी खुशियां बाँटना चाहते हैं, आपका दुःख नहीं बाँटना चाहते हैं, जिन्दगी के कड़वे घूँट आपको अकेले ही पीना पड़ेंगे।
संगति
दयालुता, आपसी समझ और आत्मत्याग से रिश्ते बनते हैं, ईर्ष्या, स्वार्थ, अहङ्कार और रूखे व्यवहार से टूटते हैं।
संगति
लोकनिन्दा का भय न हो तो मनुष्य को राक्षस बनते देर नहीं लगती है।
चरित्र
कार्य के प्रारम्भ के पहले समय, स्थान और परिणाम के विषय में विचार जरूर कर लेना चाहिए।
विवेक
यदि एक बिन्दु सिन्धु से पृथक् हो जाती है तो सूर्य उसे सुखा देता है, जो समाज से, धर्म से कट कर रहेगा, वह सूख जायेगा।
संगति
ब्रह्म 108 का प्रतीक है- 'ब' वर्ण 23, 'र' वर्ण 27, 'ह' वर्ण 33, 'म' वर्ण 25 = 108।
णमोकार
उदार बनो उड़ाऊ न बनो अर्थात् बर्बाद करने वाले नहीं, 'आय के अनुसार होगा व्यय, तो कभी न होगा क्षय'।
संतोष
धन, जमीन का बटवारा हो सकता है कर्मों का नहीं, पुण्य छिपाकर करो, पाप छपा कर करो।
कर्म
जैसे थोड़े से जामन से दूध फट जाता है, वैसे थोड़े से क्रोध से मोक्ष मार्ग बिगड़ जाता है।
क्षमा
कर्मों की विचित्रता- कोई तो विशाल भवनों में रहता है, किसी को वृक्ष की छाया भी नहीं मिलती है, कोई रेशम और रत्नों में मढ़ा है, किसी को फटा वस्त्र भी नहीं मिलता है।
कर्म
जीवन में सुखी होने के लिये दूसरों से तुलना करना और दूसरों से अपेक्षा रखना छोड़ें।
संतोष
अपेक्षा हर सुख की मिठास को फीका कर देती है।
संतोष
छलाङ्ग लगाने के पहले देख भाल कर लेना चाहिये।
विवेक
विना देखे किसी वस्तु का प्रयोग न करें और विना पढ़े कहीं हस्ताक्षर न करें।
विवेक
उदारता का हर कार्य स्वर्ग की ओर एक कदम रखता है।
दान
शेर को भी मक्खियों से रक्षा तो करना ही पड़ती है।
विवेक
जुबान को ताले की नहीं, लगाम की जरूरत पड़ती है।
वाणी
कर्ज, फर्ज, मर्ज (रोग) कभी छोटे नहीं होते हैं।
विवेक
एक मिनट देर से पँहुचने से एक घण्टा पहले पहुँचना अच्छा है।
समय
जिद खराब होती है- सीता ने सोने का मृग पाने की जिद की, जिससे राम का वियोग एवं भयङ्कर युद्ध हुआ। रावण ने सीता को पाने का जिद की तो प्राणों की आहूति कर दी, पर सीता को वापस नहीं कर सका। पवनञ्जय ने अञ्जना को देखने की जिद की जिससे बाइस वर्ष द्वेष रखना पड़ा।
संयम
'राम नाम सत्य है' मुर्दे को नहीं, डोली में बैठने वाले दूल्हे को सुना देना तो उसका जीवन बर्बाद होने से बच सकता है।
समाधि
जिस विष का प्रभाव मन्द हो गया है उस विष की तरह थोड़े भी विकार के कारण को अपनाने से कल्याण नहीं होता है।
संयम
जो साधर्मी पर आपत्ति आने पर भी सोता रहता है, कुछ प्रतिकार नहीं करता है, वह समस्त सम्पत्ति से वञ्चित रहता है, क्योंकि अर्हन्तदेव ने वैय्यावृत्य को बाह्य और अभ्यन्तर तपों का हृदय कहा है, अर्थात् शरीर में जो स्थिति हृदय की है वही स्थिति तपों में वैयावृत्य की है।
धर्म
स्वाध्याय के लाभ- तर्कणा, ब्रह्मचर्य, बुद्धि का उत्कर्ष, परमागम की परम्परा पुष्ट होती है, मन, इन्द्रियाँ और आहारादि संज्ञाओं का निरोध होता है, क्रोधादि कषायों का भेदन होता है, दिनों-दिन तप में वृद्धि होती है, संवेग भाव बढ़ता है, परिणाम प्रशस्त होते हैं, समस्त दोष दूर होते हैं, अन्य वादियों का भय नहीं रहता, जिनशासन की प्रभावना करने में समर्थ होता है।
ज्ञान
जैसे न चाहते हुए भी संसार के जीवों को गरीबी आदि का कष्ट भोगना पड़ता है, वैसे ही कर्म से पीड़ित ज्ञानी को भी न चाहते हुए भी भोग भोगना पड़ता है, अतः सम्यग्दृष्टि जीव भोगों का सेवन करते हुए भी उनका सेवन नहीं करता है, क्योंकि विना इच्छा के किया गया कर्म विरागी होता है।
कर्म
राग-द्वेष से किये गये कार्य और त्याग से जीव को बन्ध होता है और तत्त्वज्ञान पूर्वक किये गये कार्य व त्याग से मोक्ष होता है।
अनासक्ति
भरत चक्रवर्ती जैसा पुण्यानुबन्धी(सातिशय) पुण्य मोक्षलक्ष्मी की ओर ले जाता है। अतः बन्ध होने पर भी सहन करने योग्य है।
कर्म
राग-द्वेष के त्याग को साम्यभाव कहते हैं। अतः मैं जीवन में राग और मरण में द्वेष का त्याग करता हूँ, लाभ में राग अलाभ में द्वेष का त्याग, इष्ट संयोग में राग और इष्ट वियोग में द्वेष का त्याग, उपकारक मित्र में राग और अपकारक शत्रु में द्वेष का त्याग, सुख में राग दुःख में द्वेष का त्याग करता हूँ, क्योंकि साम्य भाव समस्त सदाचार का शिरोमणि है।
संयम
जो ऐश्वर्य माँगता है वह ईश्वर को नहीं माँगता है।
भक्ति
मित्र पर अन्ध श्रद्धा व शत्रु पर अन्ध अश्रद्धा नहीं होनी चाहिये।
विवेक
चोरी से नहीं सेवा वृत्ति से विद्या मिलती है।
ज्ञान
मधुर वचन बोलने वालों के पास दरिद्रता कभी नहीं आती है।
वाणी
विना परीक्षा के पुरस्कार नहीं मिलता है।
पुरुषार्थ
काम वासना से विवेक नष्ट हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
राक्षसी आचरण से आध्यात्मिक साधना नहीं होती है, उसके लिये संयम चाहिये।
संयम
प्रजा का पालन करना नहीं प्रतिज्ञा का पालन करना बड़ा धर्म है।
धर्म
जिस व्यक्ति से किसी को प्रेम न मिला हो, उसके लिये कौन प्राण देगा?
भक्ति
गुरू का शासन कठोर होता है, किन्तु गुरू स्वयं कठोर नहीं होते हैं।
ज्ञान
नमक व मीठा निकाल दिया जाय तो शेष स्वाद अपने आप छूट जाते हैं।
आहार
किससे क्या खराब- अनुचित आहार से पेट खराब होता है, आलस्य से दिन खराब होता है, कर्कशा स्त्री से रात खराब होती है, मूर्ख पुत्र से कुल खराब होता है, झूठ बोलने से बात खराब होती है, कटु भाषण से सम्बन्ध खराब होते हैं, लोलुपता से नियत खराब होती है, अनियमितता से स्वास्थ्य खराब होता है, जरुरत से ज्यादा धन हो तो बुद्धि खराब होती है और अपने कर्तव्यों का पालन न किया जाय तो पूरा जीवन खराब होता हैं। कर्तव्य ही धर्म है, कर्त्तव्य ही पूजा है, कर्तव्य से ही उज्ज्वल भविष्य बनता हैं।
चरित्र
जीवन एक युद्धक्षेत्र है, हम सब योद्धा हैं, यहाँ सभी को जीवन से लड़ना होता है। जीवन में मुसीबतें भी आती हैं, उनसे लड़ना सीखो मुसीबतों के सामने झुकने और घुटने टेकने से काम नहीं चलेगा। जीवन में आयी चुनौतियां भी एक चुनाव हैं, चुनाव का सामना तो करना ही होगा। हालांकि यह पैराशूट लेकर विमान से कूदने जैसा भारी काम है। तुम्हे इस निराशा के चक्र से बाहर निकलना होगा, कि 'मैं कुछ नहीं कर सकता' अपने साहस को मजबूत बनाइये और चलना शुरू कीजिए। सफलता आपका इन्तजार कर रही है, ईश्वर यद्यपि आपके साथ हर पल है, लेकिन पहला कदम आपको ही उठाना होगा।
पुरुषार्थ
शाम को पश्चिम में सूर्यास्त होते देखिये, और फिर सोचिए सूर्य ने पश्चिम का अनुकरण किया तो डूब गया, हम भी पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करेंगें तो संसार समुद्र में डूब जायेंगे।
चरित्र