वाणी शब्दों की सीमा है पर स्वभाव की सीमा नहीं है। Words have limits, but one's true nature has no limit. — आराध्य सूत्र · #734 0 – भेजें 🖼️ इमेज सेव करें · Save image card
दूसरों की निंदा और अपनी प्रशंसा करने से नीचगोत्र का बंध होता है और वह बंध दूसरे गुणस्थान तक ही होता है अतः निंदा करने वाला नियम से ही मिथ्यादृष्टि पापी है। वाणी 0 – भेजें