Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 8

चारित्र-ज्ञान-श्रद्धान, ये ही मोक्ष प्रधान

230 सूत्र · पृष्ठ 1 / 4

जिस आदमी के भीतर घृणा है उसके लिए सारा जगत् शत्रु हो जाता है और जिसके अंदर प्रेम है उसके लिए सारा जगत् मित्र हो जाता है।
क्षमा
वाद-विवाद न करना श्रेष्ठ पुरुषों का लक्षण है।
वाणी
मन की पवित्रता से चारित्र में पवित्रता आती है। चारित्रवान के साथ दुनिया होती है। अपरिग्रही अनगार को जो आनंद होता वह अहमिन्द्र को भी नहीं होता है, चक्रवर्ती को उसके अनंतवें भाग भी नहीं होता है।
चरित्र
मानस की सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षा नहीं चारित्र है क्योंकि यही सबसे बड़ा रक्षक है, चारित्र के बिना व्यक्तित्व खोखला है।
चरित्र
श्रावक अभिषेक के समय प्रभु के और आहार दान के समय गुरु के अति निकट होता है, तब दो बांसों के घर्षण के समान भक्ति व चारित्र की ज्योति प्रकट होती है।
भक्ति
चारित्र जीवन में शासन करने वाला तत्त्व है और वह प्रतिभा से उच्च है। छोटे-छोटे प्रलोभनों का आकर्षण चारित्र को गिरा देता है।
चरित्र
चारित्र की तलवार के साथ वैराग्य की ढाल होना परमावश्यक है।
चरित्र
जिसका चारित्र शुद्ध है, उसकी समाधि भी श्रेष्ठ होगी।
चरित्र
वैराग्य के बिना चारित्र विधवा स्त्री के शृंगार के समान है।
अनासक्ति
गुप्ति, समिति, परीषहजय, चारित्र की रक्षा करने वाली बारह भावनाएँ हैं।
चरित्र
यदि धन नष्ट हुआ तो कुछ नहीं हुआ, यदि स्वास्थ्य नष्ट हुआ तो कुछ नष्ट हुआ, यदि चारित्र नष्ट हुआ तो सब कुछ नष्ट हुआ अतः चारित्र अच्छी तरह रक्षणीय है।
चरित्र
अध्ययन करना-सुनना, चारित्र पालन करने वाले का ही सार्थक है।
चरित्र
खराब चित्र देखने से चित्त खराब होता है और चित्त खराब होने से चरित्र खराब हो जाता है। जैसे दिखते हो या दिखाना चाहते हो वैसे बनो।
चरित्र
जो हितकारी तप, दान, धर्म तथा चारित्र आदि को प्रेरणा देकर कराते हैं, वे श्रेष्ठ हैं।
धर्म
मायाचारी से कार्य सिद्धि नहीं होती, पुण्य से होती है।
कर्म
ज्ञान या चारित्र की कमी से मोक्षमार्ग नहीं छूटता श्रद्धा की कमी से नियम से मोक्ष मार्ग छूटता है। मौन से ज्ञान बढ़ता है।
धर्म
जब परमात्मा का राग परमात्मा नहीं बनने देता तब पाप का राग परमात्मा कैसे बनने देगा? एक लाख शिखर बंद जिन मंदिर की सुरक्षा करना सरल है, परन्तु एक क्षण के विशुद्ध परिणामों की सुरक्षा करना कठिन है।
अनासक्ति
वैराग्य योगी को नहीं, भोगी को होता है, योगी वैराग्य को सुरक्षित रखते हैं और वैराग्य योगी को सुरक्षित रखता है।
अनासक्ति
मृत्यु के समय उसे ज्यादा कष्ट होता है, जिसने इन्द्रिय और कषायों को नहीं जीता है।
समाधि
मुमुक्षु जीव ज्येष्ठ बनने की नहीं श्रेष्ठ बनने की भावना भाता है।
विनम्रता
मोह में हम बुराइयाँ नहीं देख पाते और घृणा में हम अच्छाइयाँ नहीं देख पाते हैं।
अनासक्ति
यदि मेरे लिए रोये तो मैं मरता नहीं हूँ और शरीर के लिए रोये तो मैं इसे साथ लेकर जाऊँगा नहीं।
समाधि
अपने छूट जाते हैं तो दूसरे अपने हो जाते हैं, अपना स्थाई कोई नहीं है।
अनासक्ति
मोक्षमार्ग व्यवस्थाओं का नहीं व्यवस्थित रहने का है, स्वच्छन्दता का नहीं है स्वतंत्रता का है, उदासी का नहीं उत्साह से साधना का मार्ग है।
धर्म
ज्ञान के साथ श्रद्धान, आचरण के साथ विवेक मोक्षमार्ग बनाता है।
धर्म
पाँच व्रतों को संयम माना है। शौच, तप, सन्तोष, स्वाध्याय और देव का स्मरण इन पाँच को नियम माना। करण आसन को कहते हैं, श्वासोच्छ्वास की स्थिरता प्राणायाम है तथा विषयों से इन्द्रियों की निवृत्ति करना प्रत्याहार है, संसार की असारता का चिंतन समाधि है और चिंतन में मन का लगना धारणा और मन का स्थिर हो जाना ध्यान है। ये ८ प्रकार का योग मुक्ति के लिए कारण है।
संयम
यदि मनुष्य यथा शक्ति धर्म कार्य को करते हुए भी उसमें सफलता न पा सके तो भी उसे उसका पुण्य अवश्य प्राप्त होता है।
कर्म
तन और धन के राग में ही जीव का पुण्य क्षीण होता है।
अनासक्ति
जीवन में किसी से राग और किसी से द्वेष भी मत करना, माँ के तीव्र राग ने सुकौशल मुनि को व्याघ्री बनकर खाया था और भाभी के द्वेष ने स्यालिनी बनकर सुकुमाल मुनि को खाया था।
अनासक्ति
शक करके बर्बाद होने से अच्छा है, विश्वास करके लुट जाना।
चरित्र
जब पर्याय शाश्वत नहीं, परिणाम शाश्वत नहीं है तो फिर पर की पर्याय में राग क्यों ?
अनासक्ति
प्रथम आत्म पोषण का लक्ष्य होना चाहिए न कि शरीर पोषण का।
धर्म
आगमज्ञान के अभाव में तत्त्वोपदेश नहीं करना चाहिए।
ज्ञान
व्रत का अर्थ है आत्म शोधन के निमित्त किए गये बुद्धि संगत उपायों को दृढ़तापूर्वक अपनाए रहना।
संयम
जिसके हृदय में सदा निर्मलता होती है, उसे व्रती कहते हैं।
संयम
जो नियम से नहीं बँधना चाहता, तो समझना कि वह नरक से बँध चुका है। कहता है रात्रि में नहीं खाते, पर नियम लेकर नहीं बँधेंगे।
संयम
दिगम्बर मुनि से भगवान् पारसनाथ के जीव ने हाथी की पर्याय में अणुव्रत धारण किए थे और महावीर के जीव ने शेर की पर्याय में मांस का त्याग किया था और आप उनके भक्त मनुष्य पर्याय में भी व्रत नहीं लेते तो फिर कैसे कल्याण हो सकता है?
धर्म
सिद्धालय में बैठने वाला मन व इन्द्रियों को वश में न करने के कारण संसार में भटक रहा है। वन्दनीय की वंदना किए बिना स्वयं वंदनीय नहीं हो सकते।
संयम
भावों से की गयी वंदना भव बंधन से मुक्त कराती है।
भक्ति
जिस जीव के वंदना में भाव नहीं लगते उसका भव भ्रमण अभी दीर्घ है।
भक्ति
वस्तु में न बंध है न मोक्ष है, लेकिन पर वस्तु बंध मोक्ष का कारण अवश्य है।
कर्म
जुबान का वजन बहुत कम होता, लेकिन बहुत कम लोग सम्हाल पाते।
वाणी
सबसे ज्यादा राग-द्वेष की वृद्धि वचनों से होती, आत्मा को चंचल करने का सबसे बड़ा हेतु वचन है।
वाणी
सम्माननीय बनकर जीना चाहते हो तो वाणी संयम रखना आवश्यक है।
वाणी
जो निज में वास न करने दे उसका नाम है 'वासना'।
अनासक्ति
जैसे बहुत समय से दुर्गन्धित मल-मूत्र वाले घड़े से दुर्गन्ध नहीं छूटती, वैसे ही सम्यक्त्व रूपी जल से धोने पर भी ज्ञानामृत से पूर्ण होने पर भी अनादिकालीन दुर्वासना आसानी से नहीं छूटती है। जैसे खोटे बर्तन में खीर सुरक्षित नहीं रहती वैसे ही विषय-कषाय से खट्टी आत्मा में जिनवाणी नहीं रहती। विषयों में प्रवृत्ति भूल से नहीं राग से होती है।
अनासक्ति
जैसे वायु का चक्रवात अपने साथ रास्ते की सब चीजों को उड़ा ले जाता है, वैसे ही विषयों की वायु का चक्रवात पुण्य के भण्डार को अपने साथ उड़ाकर ले जाता है।
अनासक्ति
हलाहल विष तो एक पर्याय को नष्ट करता है परन्तु विषयों का विष अनंत पर्यायों को नष्ट करता है।
अनासक्ति
ज्ञान, संयम, तप तभी तक हैं जब-तक विषय विष का सेवन नहीं किया है।
संयम
मनुष्य का विकास धन से नहीं, धर्म से होता है।
धर्म
चिन्ता प्रसन्न चेहरे को भी मलिन कर देती है।
मन
जब भी अनावश्यक, अनुपयोगी एवं अवांछनीय विचार मन में आने लगें तभी समझ लेना कि भगवान् से सम्बन्ध विच्छेद होना प्रारम्भ हो गया है।
मन
मन, वचन, काय की अशुद्धि में, विशुद्ध कार्य नहीं हो सकता है।
चरित्र
बाहरी पापाचरण के त्याग, विशुद्धि के परिणामों की निर्मलता के मुख्य कारण हैं।
कर्म
परिणामों में जितनी विशुद्धि होती है उतना पुण्य होता है।
कर्म
बिना ज्ञान के विशुद्धि नहीं आती और बिना विशुद्धि के चरित्र नहीं पलता है।
ज्ञान
सम्पूर्ण साधना/आराधना आचरण का सार विशुद्धि की वृद्धि करना है।
धर्म
वैराग्य का अर्थ परिवार या निमित्तों का नाश नहीं अपितु निज स्वभाव में दृष्टि का आना है।
अनासक्ति
पिच्छी को लेके चले थे, पर पीछे देखने के लिए नहीं आगे चलने के लिए।
धर्म
यदि समर भूमि में सेनापति का भाषण नहीं होता, तो योद्धाओं की भुजायें नहीं फड़कती और समवसरण में प्रभु की देशना नहीं खिरती तो किसी को वैराग्य नहीं होता।
अनासक्ति