Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 7

ईर्ष्या नहीं, ईश्वर चाहिए

155 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

तपस्या और विद्या अन्तःकरण की पवित्रता बिना व्यर्थ है।
चरित्र
अध्यात्म शास्त्र यानि गूढ़ विद्या, रहस्यमयी ज्ञान, आत्म बोध, भेदविज्ञान वह है जिसके सुनते ही भाव बदल जाये, आचरण में आते ही रहन-सहन बदल जाये।
ज्ञान
दूसरों के लिए हम उपादान नहीं बन सकते लेकिन निमित्त बन सकते हैं, अतः अच्छे काम में निमित्त अवश्य बने क्योंकि निमित्त के बिना काम नहीं होता है।
चरित्र
जो मनुष्य अपने साथी से घृणा करता है, वह उसी मनुष्य के समान हत्यारा है जिसने सचमुच हत्या की है।
क्षमा
आगे वालों से जलिए मत और पीछे वालों पर हँसिए मत।
क्षमा
आज दुनिया का हर आदमी इसलिए दुःखी हैं कि उसका पड़ोसी क्यों सुखी है?
क्षमा
ईर्ष्या करने वाले, घृणा करने वाले, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहने वाले और दूसरों के भाग्य पर निर्वाह करने वाले सदा दुःखी ही रहते हैं।
क्षमा
किसी के भी गुणों में दोष ढूँढना, ईर्ष्या, निन्दा करना नरक गति की तैयारी करना है।
क्षमा
ईर्ष्या करके मनुष्य उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता, पर अपनी निद्रा, सुख, पुण्य, सन्तोष अवश्य खो देता है। ‘‘स्वयं को उपदेश देने वाला उन्नति करता है।’’
क्षमा
दुष्टा ईर्ष्या दरिद्रतारूपी दानवी को बुलाती है और मनुष्य को नरक के द्वार तक ले जाती है।
क्षमा
ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है, ईर्ष्या से अपना ही महत्त्व कम होता है।
क्षमा
ईर्ष्या करने वाले का सबसे बड़ा शत्रु उसकी ईर्ष्या ही है।
क्षमा
हत्यारे की कुल्हाड़ी की तुलना में ईर्ष्या की धार दो गुनी तेज होती है।
क्षमा
जैसे जंग लगने से लोहा खराब हो जाता है, वैसे ही ईर्ष्या से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
क्षमा
ईर्ष्या जीत लो तो राग स्वयं दिशाओं में भाग जाता है।
क्षमा
जितना आप पाप करके कर्मों का बंधन नहीं करते उतना कर्त्ता पने से बंध करते हैं।
कर्म
माध्यस्थ भाव कषायों से बचने के लिए होता है।
संयम
अपनी प्रशंसा करना, पूज्य पुरुषों में दोष निकालने का स्वभाव होना, बहुत काल तक वैर धारण करना ये तीव्र कषायी जीव के चिह्न हैं।
क्षमा
अपना हित चाहते हो तो कषाय भाव से निज की रक्षा करो।
संयम
विषय कषाय की ज्वाला आत्मा को दग्ध करती है, अन्दर ही अन्दर झुलसाती है, बाहर धुँआ भी दिखाई नहीं देता है।
अनासक्ति
शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करना चाहिए और गुरु के भी दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए।
विवेक
अवगुण नाव के छिद्र के समान हैं जो नाव को ले डूबते हैं।
चरित्र
ग्यारहवें गुणस्थान से चौथे गुणस्थान में आना सम्यक्त्व का नहीं चारित्र का दोष है।
चरित्र
ज्ञान एंटीना के समान है चारित्र टेलीविजन के समान है एंटीना तरंगें पकड़ता है, टेलीविजन चित्र दिखाता है। ऐसे ही जिनवाणी की तरंगों को पकड़ना ज्ञान का विषय है, परन्तु जिनवाणी में प्रसारित वर्गणाओं का दृश्य चारित्र ही प्रकट करता है।
ज्ञान
ज्ञान से सम्मान मिलता है, सेवा से प्रशंसा प्राप्त होती है, चारित्र से पूज्यता प्राप्त होती है।
ज्ञान
मन का भ्रमण ही जीव के भव भ्रमण का कारण है, मन की निर्मलता श्रेष्ठतम तीर्थ है।
मन
मन, स्वाध्याय से एकाग्र होता है और चिन्ता छोड़ने से प्रसन्न होता है।
मन
स्वयं का कल्याण, देव, शास्त्र, गुरु के आश्रित नहीं अपितु मन की पवित्रता के आश्रित है।
मन
मन की एकाग्रता के अभाव में दृष्टि विषय-कषाय पर जाती है।
मन
जिसका मन शान्त होगा उसे ही सुख शान्ति की प्राप्ति होगी।
मन
चिन्तन धारा के अभाव में कल्याण की प्राप्ति असंभव है।
ध्यान
आत्मा का चिंतन करने से क्षुधा, मात्सर्य, काम, क्रोध, मान, माया, लोभ, भय और निद्रा आदि का नाश होता है। ज्ञानी हमेशा गुणग्राही होता है।
ध्यान
जो ज्ञानी जीव है वह विषयों का संग होने पर भी उनसे लिप्त नहीं होता, जैसे मल के मध्य में पड़ा सोना मल से लिप्त नहीं होता है।
अनासक्ति
जीव की सहन शक्ति और उत्साह शक्ति ही उसे महान् बनाती है।
चरित्र
इस जीव ने अचेतन से सुख प्राप्त करने के भ्रम में अनन्त जन्म धारण किए हैं।
अनासक्ति
जीवन के अंतिम क्षणों में भी जो अपनी शान्ति और स्वतंत्रता को नष्ट नहीं होने देते वो ही मोक्ष के अधिकारी हैं।
समाधि
सुखमय जीवन जीने के लिए हर परिस्थिति में रहना सीखो।
संतोष
जीना हमारा अधिकार है और दूसरों को जीने देना हमारा कर्त्तव्य है।
अहिंसा
आपको पाप से डर नहीं लगता और पापी कहलाने से डर लगता है, जो पाप से डरते हैं वे मुमुक्षु होते हैं, जो पापी कहलाने से डरते हैं वे मायावी दीर्घ संसारी होते हैं।
कर्म
शक्ति से कम या ज्यादा तप दोनों ही आत्म कल्याण से च्युत करा सकते हैं।
पुरुषार्थ
कठिनता से प्राप्त धर्म को पाकर विषय सुख में रंजित होना, भस्म के लिए चंदन को जलाने जैसा है। विषयों से विरक्त होने पर भी तप भावना, धर्म भावना, समाधि भावना अति दुर्लभ है। जिसको सहना आ गया उसको रहना आ गया।
धर्म
प्राणायाम से शरीर की और ध्यान से आत्मा की शक्ति बढ़ती है।
ध्यान
धर्म कोई वाशिंग पाउडर नहीं, जिसे पहले इस्तेमाल करो फिर विश्वास करो। धर्म तो जिन्दगी के साथ भी और जिन्दगी के बाद भी जीवन बीमा कम्पनी की तरह लाभदायक ही है।
धर्म
जब से अग्नि, अम्बर हैं तब से धर्म दिगम्बर है और जब तक अग्नि अम्बर हैं। तब तक धर्म दिगम्बर है। अकषाय भाव का नाम धर्म है।
धर्म
व्यवहार दृष्टि कैमरे जैसी एवं निश्चय दृष्टि एक्स-रे जैसी होती है।
विवेक
यदि किसी को अपना बनाना चाहते हो तो उसका नाम लो, नाम सभी को प्रिय होता। जितने भी भूतल पर सो गये, सोयेंगे वे सब नाम के राग में निज को खो गये। बाहर की ख्याति अन्दर से खाली कर देती है।
अनासक्ति
पर की निंदा करने वाला और स्वयं की निंदा नहीं करने वाला मिथ्यादृष्टि होता है।
वाणी
जो चारित्र को धारणकर परीषह के भय से छोड़ देते हैं वे कायर पुरुष हैं।
चरित्र
जिसका यश:कीर्ति नाम कर्म का उदय होता है, उसके नाम को रोकने वाला कोई नहीं है। नव नारायण नव बलभद्र में सिर्फ राम-लक्ष्मण, कृष्ण बलराम का ही नाम प्रसिद्ध है। १२ चक्रवर्तियों में भरत ही प्रसिद्ध हुए, ११ रुद्रों में सिर्फ शिव ही प्रसिद्ध हुए बाकी क्यों नहीं? प्रशंसा मुक्ति नहीं बंधन है।
कर्म
असाधु को साधु बनाने का भाव ही प्रभावना है।
धर्म
जिसकी होनहार खराब होती है वह गुरु के सामने अपने दोषों की आलोचना नहीं करता है। शुद्ध प्रेम सब थकान दूर करता है।
विनम्रता
पर्याय को दोष मत दो अपने परिणामों को दोष दो, पर्याय तो मटके के समान है उसमें अमृत भरो या जहर विवेक आपका है।
विवेक
स्वयं की बुद्धि सुखकारी, गुरु की बुद्धि विशेष, पर की बुद्धि विनाश कारी और स्त्री बुद्धि प्रपंचकारी होती है अतः अपने ज्ञानी शुभ चिन्तकों की सलाह से काम करें।
विवेक
मुनिराज परिग्रह में नहीं निज गृह में विचरण करते हैं। नारी सबसे बड़ा परिग्रह है।
अनासक्ति
जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा, जो होगा अच्छा होगा, तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया ? तुमने क्या पैदा कर दिया, जो नष्ट हो गया? तुमने जो लिया यही से लिया, तुमने जो दिया यही पर दिया; जो आज तुम्हारा है, वह ''कल किसी और का था, कल किसी और का होगा, परिवर्तन संसार का नियम है'' तुम इसे अपना मान रहे हो, बस यही तुम्हारे दुःख का कारण है।
अनासक्ति
जो परिणामों की विशुद्धि का घात कर रहा है उससे बड़ा शत्रु संसार में कोई नहीं है।
मन
पानी के छानने की तरह यदि अपने परिणामों को भी छान लें अर्थात् बुरे परिणाम छोड़ अच्छे परिणाम ग्रहण करें तो कल्याण निश्चित है।
विवेक
अज्ञान से किए पाप सम्यग्ज्ञान से नष्ट हो जाते हैं, पर ज्ञानी बनकर किए पाप वज्रलेप के समान होते हैं। सातिशय (पुण्यानुबंधी) पुण्य वही जो पुण्य का बंध कराये।
कर्म
सभी को पापों का ज्ञान होता है पर पापों से बचने का ज्ञान सबको नहीं होता है।
कर्म
पुण्य के अभाव में असंयम का आगमन शीघ्रता से होता है।
संयम