Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 7

ईर्ष्या नहीं, ईश्वर चाहिए

155 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

सत्पुरुष वही है जो संसार शरीर और भोगों से विरक्त है।
अनासक्ति
शास्त्र सभा में जो शब्द निकलते हैं, वैसे शब्द यदि एकान्त में अपने लिए निकल जायें तब तो ज्ञानी है अन्यथा ग्रामोफोन है।
ज्ञान
आत्मन्! तुम्हें तो प्रत्येक पदार्थ या अवस्था के गुण ग्रहण करने की ही आदत डालनी चाहिए।
चरित्र
अपने लक्ष्य में ज्ञायक स्वरूप बना रहना एक किला है, यदि तुझ पर विपदा रूप शत्रु आक्रमण करे, तब अपने उपयोग को उस किला में गुप्त कर दे, फिर तू अजेय है।
ध्यान
किसी भी कार्य को तन-मन-धन और सर्वस्व लगाकर भी किया हो तब भी वह पर है, उसे छोड़ना ही होगा, आत्म स्वरूप में उपयोग रमाये बिना असन्तोष नष्ट न होगा अतः जो मार्ग जान चुके हो, उस पर प्रवृत्ति करने में विलम्ब मत करो।
पुरुषार्थ
हे आत्मन्! तूने अनन्त भव बिता दिये, जिनमें विविध भोग भोगे, अब यह भव बिना भोग के ही सही, फिर बिना अहंकार ममकार का ही सही फिर तू अनन्तकाल सुख भोगेगा, दुःख की छाया भी न रहेगी।
अनासक्ति
पत्थर पर कितनी टाँकियों की चोट लगती है, यदि टाँकियों की चोट सहले तो पूज्य मूर्ति बन जाती है यदि टाँकी की चोट न सह सके और भग्न हो जावे तो वह पत्थर भी किसी काम का नहीं रहता इसी प्रकार नाना विपदाओं का सहन हो जावे तो आत्मा महात्मा बन जाता है, यदि न सह सके तो संसारी बन जाता है।
पुरुषार्थ
विचार के अनुकूल वस्तु स्वरूप बनाने में अशान्ति है और वस्तु स्वरूप के अनुकूल विचार बनाने में शान्ति है।
संतोष
जहाँ तक शरण का प्रश्न है, तेरे क्षमादि परिणामों को छोड़कर अन्य कुछ भी जगत् में शरण नहीं है।
क्षमा
हाथ से छूटे उसका नाम त्याग है और हृदय से छूटे उसका नाम वैराग्य है। संसारी तन धन को, संन्यासी मन-जीवन को संभालता है।
अनासक्ति
जिन माता-पिता ने पाला वे ही छोड़कर चले जाते तब दूसरा कौन साथ देगा, मृत्यु तो ‘रिटर्न’ टिकट है।
समाधि
ईर्ष्या का दुःख प्रायः निष्फल ही जाता है अधिकतर तो जिस बात की ईर्ष्या होती है, वह ऐसी बात होगी जिस पर हमारा वश नहीं होता है।
क्षमा
ईर्ष्या और क्रोध जीवन को छोटा कर देते हैं।
क्षमा
जितना सौ दीक्षा देने में पुण्य मिलता है उतना एक समाधि कराने में पुण्य मिलता है।
समाधि
भवसागर पार करने के लिए शुद्धभाव रखने से श्रेष्ठ कोई नौका नहीं है।
धर्म
दुनिया में वस्त्र रहितों की संख्या तो बहुत है किन्तु वासना रहितों की संख्या कम है।
अनासक्ति
यदि आपके निमित्त से हिंसा हो रही है तो आप भी हिंसक हैं।
अहिंसा
भीड़ का भी आनंद होता है, लेकिन भीड़ से करोड़ गुना आनंद एकान्त में मिलता है।
ध्यान
ज्ञान से बड़ा आनंद संसार में अन्य कोई नहीं है। ‘‘खुशी पर से मिलती है, आनंद निज से प्राप्त होता है।’’
ज्ञान
योगी के एक क्षण का आनंद भोगी को जीवन भर में नहीं मिल पाता है।
ध्यान
दूसरों के रूपों को देखने के कारण आज तक हमारी आत्मा रूपातीत न हो पायी है।
अनासक्ति
सबको अपना बनाने की चाह शव बना देती है, सब कुछ छोड़ने की चाह शिव बना देती है।
अनासक्ति
इन्द्रिय विषयों की अभिलाषा आभ्यन्तर परिग्रह है।
अनासक्ति
शरीर से भोगों के त्यागी और भावों से भोगों के रागी का शुभ उपयोग नहीं हो सकता है।
अनासक्ति
भगवान् भवातीत बनने का उपदेश तो दे सकते हैं, भवातीत बना नहीं सकते हैं, बनना स्वयं को पड़ेगा।
पुरुषार्थ
योग और उपयोग के निर्मल रहने पर ही कल्याण संभव होता है।
ध्यान
भगवान् से न डरो तो चलेगा लेकिन कर्मों से जरूर डरो क्योंकि किए हुए कर्मों का फल तो भगवान् को भी भोगना पड़ता है।
कर्म
संक्लेशता की हानि होने पर असाता कर्म साता रूप संक्रमित हो जाता है।
कर्म
कषाय परिणाम जहर है जो एक क्षण में सभी जप तप को नष्ट कर देता है।
क्षमा
कष्टों में कर्त्तव्यों को भूलने वाला बहिरात्मा है। छिपे कर्त्तव्य में ही मजा है।
चरित्र
आप सबसे लड़-झगड़ तो सकते हो किन्तु कषायों में अकेले ही जलना पड़ेगा।
क्षमा
प्रत्येक कषाय का काल ४८ मिनट होता है। अगर आप अन्तर्मुहूर्त बच गये तो विकार अपने आप शान्त हो जायेंगे।
क्षमा
जैसे-जैसे मोह घटता है और योग निर्मल होता है वैसे-वैसे गुणस्थान बढ़ता है और जैसे-जैसे मोह बढ़ता है वा योग चंचल होता है तो गुणस्थान गिरता है।
अनासक्ति
गुणस्थान उपवास, जाप से नहीं बढ़ते निर्मल परिणामों से बढ़ते हैं।
ध्यान
आप तभी तक श्रेष्ठ हो, तभी तक ज्येष्ठ हो, जब तक आपके मन में कुछ लेने की इच्छा नहीं हुई, इच्छा होते ही मन नीचे चला जाता है और मन के नीचे जाते ही चारित्र (आध्यात्मिक स्तर) नीचे चला जाता है।
संतोष
जीवन को नियम के अधीन कर देना आलस्य पर विजय पाना है।
पुरुषार्थ
संसार की असारता ही संसार में सदा ध्यान करने योग्य है।
अनासक्ति
संयम की विराधना से बचना ही आत्म प्रभावना है एवं श्रावक की टूटी आस्था को धर्म से जोड़ना धर्म की प्रभावना है।
धर्म
परिणामों की विशुद्धि केवल मंत्र जाप से नहीं, स्वाध्याय से भी होती है।
ज्ञान
आपके जैसे भाव होते हैं देह का परिणमन वैसा होना प्रारम्भ हो जाता है।
मन
भगवान् को मन्दिर में सुमन न चढ़ाओ तो चलेगा पर अपने सु-मन को भगवान् की भक्ति में नहीं लगाओगे तो नहीं चलेगा। अरे भाई! जब कुरूप, निर्धन, अपंग को राज कन्या वरमाला नहीं डालती तो फिर कुरूप मन अर्थात् अशुद्ध मन वाले को मुक्ति लक्ष्मी कैसे वरमाला डालेगी।
भक्ति
मुझे ईर्ष्या नहीं, ईश्वर चाहिए, मैं प्रसिद्धि के लिए विशुद्धि नहीं खोना चाहता हूँ, मैं शल्य में नहीं वात्सल्य में जीना चाहता हूँ, मैं हर काम में आऊँ जरूरी नहीं, मैं हर एक के काम आऊँ ऐसी मेरी भावना है, मैं जीत कर हारना नहीं, हारकर भी जीतना चाहता हूँ अर्थात् हारकर भी दूसरों का दिल जीतना चाहता हूँ।
विनम्रता
धर्म के बल से मनुष्य, देव, विद्याधर और धरणेन्द्र के सुख प्राप्त होते हैं, इस लोक, पर लोक में चन्द्रमा के समान यश तथा पूजा, सम्मान आदि प्रतिदिन प्राप्त होते हैं। पाप के द्वारा दुर्गति सम्बन्धी दुःख नरकगति तथा असहनीय निन्दा और अपयश प्राप्त होते हैं इसलिए हे भाई! जो इष्ट हो वही करो।
धर्म
सम्यग्दृष्टि जीव तीनों लोकों में कही भी हो पूज्य ही होता है, पर सम्यग्दर्शन के बिना साधु भी पद-पद पर निन्दनीय होता है।
भक्ति
अज्ञानी कर्मों से बंधता है और ज्ञानी कर्मों से छूटता है।
कर्म
जिसने वैराग्य रूपी तलवार के द्वारा इन्द्रियरूपी चोरों को नष्ट कर दिया उसको स्वर्ग मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। वैराग्य के बिना शरीर को दण्डित करना व्यर्थ है। जब चित्रादि में निर्मित स्त्री मन में क्षोभ उत्पन्न करती है तब स्त्री के संसर्ग और वार्तालाप में मन एकाग्र कैसे रह सकता है?
ब्रह्मचर्य
जो एकाग्रता से सदा वीतरागता की उपासना करता है वह संसार के सभी सुखों को भोगकर उन्हीं के समान हो जाता है।
ध्यान
न किसी के अभाव में जियो न किसी के प्रभाव में जियो ये जिन्दगी है आपकी, अपने स्वभाव में जियो।
संयम
जलना नहीं तपना सीखो, जलने वाला राख और तपने वाला परमात्मा बन जाता है।
पुरुषार्थ
वैभव से ज्यादा पुण्य निर्मल सोच के लिए चाहिए।
मन
तीर्थ मंगल, क्षेत्र मंगल, काल मंगल में भी प्रबल भाव मंगल होता है।
मन
करोड़ों स्वर्ण मुद्राएँ इतनी कीमती नहीं जितनी कीमती एकक्षण की भाव विशुद्धि है, साधना से ज्यादा शक्ति भोगों में लगती है, साधना से शक्ति तो क्रमशः बढ़ती है किन्तु भोगों से शक्ति क्रमशः घटती जाती है।
मन
संसार में सभी प्राणियों को संयोग-वियोग, लाभ-अलाभ, सुख-दुःख तथा मान-अपमान नियम से प्राप्त होते ही हैं।
कर्म
जब मेरा भव ही शाश्वत नहीं तो वैभव कैसे शाश्वत होगा?
अनासक्ति
धर्मात्मा श्री को श्रीमति में नहीं श्री जी में लगाता है।
भक्ति
जगत् के सारे वास छोड़े बिना सिद्धों में वास नहीं हो सकता है। धर्म संत भेष में नहीं संत स्वभाव में होता है।
धर्म
प्रतिष्ठा की आकांक्षा ही साधना से पतन कराती है।
विनम्रता
साधु की सच्ची साधना ही सिद्ध भगवान् बनाती है।
धर्म
संसार में कर्म बंधन का मूल कारण स्त्री है मोक्ष का कारण स्त्री त्याग है।
ब्रह्मचर्य
सच्चा सुख स्त्री आदि से नहिं संतोष से मिलता है।
संतोष