Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 7

ईर्ष्या नहीं, ईश्वर चाहिए

155 सूत्र · पृष्ठ 3 / 3

यदि पुण्योदय न हो तो शान्त भाव से समय व्यतीत करें।
संतोष
धर्म पुरुषार्थ से कर्म भी कमजोर हो जाते हैं।
पुरुषार्थ
बुराई मन को खुशी देती है परन्तु आत्मा को दुःख देती है किन्तु अच्छाई मन और आत्मा दोनों को सुख देती है।
चरित्र
भव्य जीव पल-पल अपने विशुद्ध भावों की रक्षा करता है।
धर्म
जैसे पिंजड़े का तोता पिंजड़े से मुक्त होना चाहता है, निकट भव्य शरीर से मुक्त होना चाहता है।
अनासक्ति
निकट भव्य जीव को पाप का जो पश्चाताप से शोक होता है वह शोक किसी को नहीं होता है।
कर्म
भाषा और भाव की निर्मलता ही भव से पार करायेगी।
वाणी
प्रेम मन से, विश्वास बुद्धि से परन्तु श्रद्धा आत्मा से उत्पन्न होती है।
भक्ति
भगवान् आपको भगवान् नहीं बनाएँगे, आपको अपने भाव ही भगवान् बनायेंगे।
भक्ति
साधक को संकट में या अंतिम दिन नहीं प्रतिपल भगवान् दिखते हैं।
भक्ति
देवाधिदेव के भक्तों की देव रक्षा अवश्य करते हैं।
भक्ति
जो भाग्य में है वह भागकर ही आएगा, जो भाग्य में नहीं वह आकर भी भाग जाएगा।
कर्म
बड़ा बनने का अवसर छोटे ने दिया उसकी उपेक्षा क्यों ? अर्थात् छोटे के कारण आप बड़े हैं अतः उसका ध्यान रखें।
विनम्रता
विसंवाद से बचने के लिए एकत्व आवश्यक है।
Misc.
लोकोत्तर आचार छोड़ जो लोकाचार को अपनाता है उसका निर्जरा का कारण संयम नष्ट हो जाता है।
संयम
व्यक्ति की महानता अहं से नहीं, विनय से प्रकट होती है।
विनम्रता
जितनी तीव्रता से पापास्रव किया है उतनी ही विशुद्धि से निर्जरा भी करनी पड़ेगी।
कर्म
साम्यभाव और निःशल्य भाव के बिना समाधि संभव नहीं है।
समाधि
गुरु आज्ञा न मानने वाले की कभी समाधि संभव नहीं हैं।
समाधि
टकराव टालिए क्योंकि टकराव ही बिखराव का कारण है।
Misc.
ईर्ष्या की आग को बुझा दीजिए नहीं तो यह आपको जलाकर राख कर देगी।
क्षमा
वैय्यावृत्ति से आत्मबल, साधना, अनुभव, ज्ञान आदि की वृद्धि होती है।
धर्म
निजदेव से मिलने के लिए जिनदेव से मिलना अनिवार्य है।
भक्ति
कलिकाल में मन को वश में करने का उपाय शास्त्र का अध्ययन ही है।
ज्ञान
शरीर का रोग तो सिर्फ वर्तमान की पर्याय को नष्ट कर सकता है किन्तु भोगों का रोग भव-भव की पर्यायों को नष्ट कर देता है।
अनासक्ति
जिसका मन सदा शुद्धज्ञान में रमा रहता है अन्य किसी कार्य में जिसकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती है उसके भोग आसक्ति के अभाव में संसारवर्धक नहीं होते हैं।
अनासक्ति
विद्या सभी का भूषण है।
ज्ञान
ज्ञानांकुश से मन रूपी हाथी को वश में किया जाता है।
मन
जो प्रतिदिन जिनालय जाता है वह एक दिन सिद्धालय अवश्य पहुँच जाता है।
भक्ति
मनुष्य गति में मरने या जीने नहीं आये अपितु जन्ममरण मिटाने आये हैं।
धर्म
स्त्रियाँ सिर्फ ईर्ष्या से दुःखी होती हैं।
क्षमा
घृणा से घृणा को नष्ट नहीं किया जा सकता है, घृणा को दूर करने के लिए स्नेह की आवश्यकता होती है।
क्षमा
प्रेम कहता है आगे बढ़ो, प्रतिस्पर्धा कहती है मेरे पीछे रहो।
Misc.
घृणा व द्वेष से ग्रसित व्यक्ति दूसरों को सुख नहीं पहुँचा सकता है।
क्षमा
ईर्ष्या अपनी हीनता के बोध से जन्म लेती है और ईर्ष्या उस हीनता को दूर नहीं करती सिर्फ दबाती है। ईर्ष्या रखने वाले मनुष्य को इतना दुःख अपनी असफलता पर नहीं होता जितना दुःख दूसरे की सफलता देखकर होता है।
क्षमा