Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 14

सबसे सुन्दर एक-जिसका नाम विवेक

160 सूत्र · पृष्ठ 2 / 3

कषाय करने वाला व्यक्ति अपना पुण्य क्षीण करता है व पाप बाँधता है।
कर्म
अपने मिलने वालों के संग जैसा हम व्यवहार करेंगे, वही बीज बनकर पनपेगा, वैसा वे हमारे साथ व्यवहार करेंगे। अपने साथियों को पद, आयु के अनुसार आदर-सम्मान स्नेह दें, उनके अभिवादन का समुचित उत्तर दें, बात के दौरान अशिष्ट और अश्लील भाषा का प्रयोग न करें, उपकार के बदले धन्यवाद देना न भूलें, किसी रुग्ण से बात करें तो सदा हौसला बढ़ायें, रोग की भीषणता का आभास न होने दें। हर्ष-विषाद न करके समता की रक्षा करना भी तपस्या है।
चरित्र
सोचना आस्रव है, सोचना ही है तो आत्मा परमात्मा का चिंतन करो। बोलना आस्रव है, बोलना ही है तो जिससे वैराग्य का विकास हो वही बोलो। चेष्टा आस्रव का कारण है, करना पड़े तो इन्द्रिय संयम, प्राणी संयम के संयमरूप चेष्टा हो।
संयम
काम वह करो जो सबकी जानकारी में किया जा सके। बात वह बोलो जिसके गुप्त बनी रहने की चिन्ता न करनी पड़े।
चरित्र
बच्चों को खेलने का अवसर दीजिए, जो खतरों से नहीं खेलेंगे वे जीवन में आगे कैसे बढ़ेंगे? किसी बच्चे को वह पुस्तक मत दीजिए जो आप खुद नहीं पढ़ेंगे।
परिवार
कमाते हैं सिर से पर सिर को भोजन कराने अर्थात् स्वाध्याय की कभी सोचते ही नहीं है।
ज्ञान
कॅरियर निर्धारण में दूरदर्शी सोच, संयम, स्वयं की रुचि, प्रभुता, योग्यता, हुनर हर पहलु का सही मिश्रण होना चाहिए।
विवेक
हाथ-पैर के साथ-साथ मंदिर में मन को भी पवित्र करके जाना चाहिए।
भक्ति
कोई भी कार्य हो क्रय-विक्रय, किसी तरह की सेवा, घर का कोई कार्य या रिश्ता सभी जगह जरूरत का सही आँकलन अत्यन्त आवश्यक है।
विवेक
मूर्खों की संख्या हमेशा ज्यादा होती है। हमें क्या मूर्खों की परवाह करनी चाहिए या समझदारों का अनुसरण करना चाहिए?
विवेक
प्रश्न ऐसा न पूछें, जिसका कोई उत्तर ही न हो।
विवेक
बोलने और प्रश्न करने से पहले सोचें कि परिणाम क्या होगा?
वाणी
अधिक लोगों के द्वारा लिया गया निर्णय सभी के लिए सही हो जरूरी नहीं।
विवेक
अगर निर्णय सही है तो आप सफल कहलायेंगे और अगर गलत हुआ तो आप अच्छे मार्गदर्शक बनेंगे, निर्णय उचित समय में लिए जाने चाहिए, विलम्ब करने से विफलता की संभावना अधिक रहती है।
विवेक
वियुक्त वस्तु के संयोग होने का नियम नहीं है, परन्तु संयुक्त वस्तु का वियोग नियम से होता है। सदा अपने ज्ञायक स्वभाव की रक्षा करें।
अनासक्ति
अच्छा या बुरा कुछ नहीं है, केवल विचार ही किसी वस्तु को अच्छा या बुरा बनाते हैं।
मन
आँख से देखना नियत है पर क्या देखेगी यह अनियत है अन्यथा पञ्चेन्द्रिय निरोध मूलगुण पालन के पुरुषार्थ का उपदेश क्यों?
संयम
वे ही शब्द अनुराग से सुनो जो परिणाम की निर्मलता के लिए आवश्यक है।
वाणी
उसे ही देखो जिसके देखने से आपके दर्शन, ज्ञान, चारित्र में बाधा न आ सके।
संयम
वही भोजन पान, रस ग्रहण करो, जितने से समिति पालन और स्वाध्याय आदि संयम के साधन के योग्य शारीरिक शक्ति रहे।
आहार
वही बात विचार में लाओ जो आत्महित के लिए आवश्यक हो, यदि विपरीत बात विचार में आवें तो भेदविज्ञान की भावना से शीघ्र नष्ट कर दो।
मन
किसी के सम्बन्ध में किसी को कुछ समाचार आदि कहने में सबके हित का ध्यान रखना मनुष्य जीवन में ऊँचे उठने का एक मन्त्र है।
वाणी
दूसरे की स्वच्छन्द प्रवृत्ति से असन्तुष्ट न रहकर अपनी स्वच्छन्द प्रवृत्ति से असंतुष्ट रहो। वीर प्रतिज्ञा निभाता है, दीन च्युत हो जाता है।
चरित्र
ऐसी चेष्टा मत करो जिससे तुम्हारा अहंकार प्रतीत हो या दूसरों को क्लेश उत्पन्न हो। शान्ति का प्रदर्शन भी अशान्ति के बिना नहीं होता है।
विनम्रता
तुम्हारे नाम से यदि कोई सामाजिक संस्था खोली जाये, तब वहाँ कभी डेरा नहीं डाल देना क्योंकि वह राग का साधन हो सकता है।
अनासक्ति
थोड़ा-सा तो जीवन है, उसका भी विश्वास नहीं और विकल्प साधन कितने बना रखे हैं क्या यह शान्ति का मार्ग है?
अनासक्ति
उम्र के बड़े हो गये तो अब भावनाओं के भी बड़े होना चाहिए, लड़के वालों से लड़की ने कहा, ''रामायण तो आप अभी सुन लीजिए, महाभारत घर आकर सुनाऊँगी।''
परिवार
झूठी तसल्ली देर सवेर चिंता का कारण होती है।
सत्य
सकरी गली से आते हुए साँड को देखकर राजा का स्वामित्व जताये बिना रास्ता छोड़
विवेक
नकल करना है तो फिल्म एक्टर की चेष्टाओं की नहीं मूल नायक की करो।
विवेक
'ओल्ड इज गोल्ड' यह नियम हर जगह लागू नहीं होता, जिस दवा की डेट निकल गयी है, वह अभक्ष्य है, हर पुराना विचार सही हो जरूरी नहीं है।
विवेक
देव-अदेव, पात्र-अपात्र, शुभ-अशुभ, गुण-अवगुण और शास्त्र आदि के विषय में जो विचार है वह विवेक कहलाता है, विवेक के बिना सब व्यर्थ है।
विवेक
दिन में कोई भी कार्य ऐसा न करें, जिससे रात की नींद हराम हो जाए।
चरित्र
रात में कोई कार्य ऐसा न करें कि सुबह मुँह दिखाने योग्य न रहें।
चरित्र
एक मिनट मोबाइल से बात करने में एक घंटे की शान्ति भंग हो जाती है।
मन
एक घंटे टी.वी. देखने पर १२ घंटे आँख बन्द करना जरूरी होता है।
Misc.
अपेक्षा ही मनोव्यथा की जड़ है अतः किसी से भी अपेक्षा न रखें।
संतोष
जो उपलब्ध है उसकी श्रेष्ठता न समझी जाये तो अभाव ही दिखेगा।
संतोष
जो काम प्रेम से हो सकता है वह क्रोधावेश या द्वेष से नहीं होता है।
क्षमा
जहाँ कुछ दिन ठहरना है वहाँ मकान बना रहा है, जहाँ अनंत काल रहना वहाँ के बारे में सोच नहीं रहा है। ''सज्जन को शान्ति अमृत है।''
अनासक्ति
तोता पिंजड़े को नहीं सजाता, आप तन पिंजड़े को कैसे सजाने में लगे हो, तोता मुक्त होना चाहता आप क्यों नहीं, तोता पराधीनता के कारण दुःखी, आप स्वतंत्र होकर क्यों दुःखी जीवन जी रहे हो। धर्म का ह्रास पापियों से नहीं ढोंगी/पाखण्डी धर्मात्माओं से होता है।
अनासक्ति
किसी से भी बहुत ज्यादा उम्मीद और आशा मत पाल लेना वरना जब उम्मीद पूरी नहीं होगी तब बहुत कष्ट होगा।
संतोष
इंसान होता है प्यार करने के लिए और पैसा होता है उपयोग करने के लिए किन्तु लोग प्यार पैसों से करते और उपयोग इंसान का करते हैं।
धन
अपनी गलतियाँ मानने में कभी भी देर न करें क्योंकि रास्ता जितना लम्बा होगा, वापसी उतनी मुश्किल हो जायेगी।
विनम्रता
जीवन में दो व्यक्ति असफल होते हैं, एक वो जो सोचता है पर करता नहीं, एक वो जो करता है पर सोचता नहीं।
पुरुषार्थ
चमकते काँच के पीछे कहीं मूल्यवान रत्नों को न्यौछावर तो नहीं कर रहे हो ?
विवेक
जीवन भर कोई व्यक्ति पाप नहीं करता किन्तु क्षण भर का पाप जीवन बर्बाद करता है।
कर्म
ईर्ष्या, लोभ, काम, क्रोध आदि का कोई भी वेग हो, आप उस वेग में तात्कालिक कोई भी निर्णय मत लेना क्योंकि आवेग में विवेक खो जाता है और आवेग में लिया गया निर्णय कभी भी यथार्थ नहीं होता। कार्य दिख रहा है कारण खोजो।
विवेक
किसी भी रोते या मुस्कुराते को देखकर प्रभावित मत होना क्योंकि ज्ञानी कार्य को नहीं कारण को देखता है, अश्रुपात देखकर न्यायालय में न्याय नहीं दिया जाता, हेतु देखकर न्याय दिया जाता है, अश्रु देखकर निर्णय मत करना, चेहरा और भाव भी देखना जरूरी है।
विवेक
योग्यता और परिस्थिति को ध्यान में न रखकर महत्त्वाकांक्षाएँ गढ़ने वाला दुःखी रहता और उपहास सहता है।
संतोष
पवित्रता की परीक्षा अपवित्रता के घर्षण में होती है।
चरित्र
ऐसा कोई काम मत करो जिससे स्वयं के या दूसरे के परिणाम खराब हो। जो खतरों से डरते हैं, जिन्हें कष्ट सहने में भय लगता है, जिन्हें कठोर परिश्रम करना नहीं आता, उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करना चाहिए।
पुरुषार्थ
आप खाली हाथ आये और खाली हाथ जाओगे, जो आज आपका है वह कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा, आप इसे अपना समझकर प्रसन्न हो रहे हो, बस यही प्रसन्नता आपके दुःखों का कारण है।
अनासक्ति
जहाँ बुद्धि के प्रयोग की आवश्यकता है वहाँ बल का प्रयोग करना व्यर्थ है।
विवेक
बुद्धि क्षीण होने लग जाये तो भी विवेक को क्षीण मत होने देना।
विवेक
बुद्धिमान वे हैं जो बोलने से पहले सोचते हैं, मूर्ख बोलते पहले सोचते बाद में हैं।
वाणी
बुद्धिमान व्यक्ति धन के नाश को, मनस्ताप को, पत्नी के दोषों को प्रकट न करें।
विवेक
बुद्धिमान को उपाय के साथ-साथ कार्य की हानि को भी सोच लेना चाहिए।
विवेक
बुद्धिमान को उत्तम और अधम व्यक्तियों से विरोध नहीं करना चाहिए।
संगति
अज्ञानी सधर्मी व ज्ञानी विधर्मी के द्वारा शोधित व पकाया भोजन ग्रहण न करें।
आहार