Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 14

सबसे सुन्दर एक-जिसका नाम विवेक

160 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

शक्ति क्षीण होने से बुढ़ापा भी शीघ्र आता है।
स्वास्थ्य
तन से वृद्ध हो गये तो कोई बात नहीं किन्तु मन से वृद्ध मत बनो।
मन
आत्महित के कार्य करने वाला मरने के कुछ घंटे पूर्व ही वृद्ध होता है।
समय
वृद्धावस्था और मृत्यु के वश में पड़े हुए मनुष्य को औषधि, मंत्र, होम और जप भी नहीं बचा पाते हैं।
समाधि
ज्ञानी श्मशान में रहकर भी सिद्धों की बस्ती का जीवन जीता है और अज्ञानी बस्ती में रहकर भी गिद्धों की आसक्ति का जीवन जीता है।
ज्ञान
जो कार्य प्रज्ञा कर सकती है वह कार्य तलवार नहीं कर सकती है।
विवेक
जिस कषाय भाव से वर्तमान की शान्ति भंग हो रही है उससे भविष्य में सुख कैसे मिल सकता है। 'गुस्सा' करना दूसरे की गलतियों की सजा खुद को देना है।
क्षमा
अपनी हजारों गलतियों के बाद भी हम अपने आपको प्यार करते हैं फिर किसी की एक गलती पर हम उससे नफरत क्यों करते हैं?
क्षमा
बुद्धिमान वह नहीं जो बहुत सी बातें जानता है अपितु वह है जो काम की बातें अधिक जानता है।
विवेक
बुद्धिजीवी समस्याओं को हल करते हैं जबकि मेधावी समस्याओं को पैदा ही नहीं होने देते हैं। बुद्धिमान वह है जो बुद्धिमत्ता से ज्यादा खुशी को पसंद करता है।
विवेक
दुष्कर्म करने की अपेक्षा दुष्कृत को स्वीकार करने में अधिक बुद्धिमत्ता है।
विवेक
बुराई से बुराई पैदा होती है इसलिए आग से भी बढ़कर बुराई से डरना चाहिए।
विवेक
किसी वस्तु के दोष का ध्यान न करते हुए विद्वान् उनके गुणों को ग्रहण कर लेते हैं जैसे भौंरा काँटे वाले पौधे का भी उपयोग कर लेता है।
विवेक
वास्तविक विद्वान् वही है जो दूसरों में गुणों को खोजता है एवं अवगुणों को नहीं देखता है।
विवेक
विवेकशील कीचड़ में पड़ें रत्न को भी ग्रहण कर लेते हैं।
विवेक
पराक्रम का प्रमुख अंग विवेक है।
विवेक
विवेकी मनुष्य को पाकर गुण सुंदरता को प्राप्त होते हैं जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न अत्यन्त सुशोभित होता है।
विवेक
उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है विवेकी होने से क्षणिक वस्तुओं में शोक और आनंद दोनों नहीं होते हैं।
विवेक
कोपाग्नि, दुर्भाव, ईर्ष्या और प्रतिशोध विवेक को नष्ट कर देते हैं।
विवेक
न्याय से कमाओ, विवेक से खर्च करो।
विवेक
विवेकहीन व्यक्ति के सारे गुण व्यर्थ हैं।
विवेक
बिना विवेक के वीरता महासागर की लहरों में डोंगी-सी डूब जाती है।
विवेक
दृश्य को बदलना अपने हाथ में नहीं है परन्तु दृष्टिकोण को बदलना अपने ही हाथ में है, निषेधात्मक दृष्टिकोण व्यक्ति को हताश किए बिना नहीं रहता है।
मन
किसी भी व्यक्ति को नाराज किए बिना अपनी बात कह देने की काबलियत ही व्यावहारिकता है। अधिक बलवान तो वही होते हैं जिनके पास बुद्धि बल होता है, जिनमें केवल शारीरिक बल होता है उन्हें बलवान नहीं माना जाता है।
विवेक
जिनके ऊपर दोषारोपण करने से योग और क्षेम में बाधा आती हो उन लोगों को देवता की भाँति सदा प्रसन्न रखना चाहिए।
विवेक
सारी शिक्षाएँ एक किनारे रखी जाएँ और शिष्टाचार दूसरे किनारे रखा जाए तो शिष्टाचार की कीमत अधिक होगी।
चरित्र
श्रेष्ठ घोड़ों को कोड़े की छाया ही काफी होती है, कोड़ा नहीं, कोड़े मारने की जरूरत तो खच्चरों को होती है, घोड़े तो कोड़े की छाया में ही चल पड़ते हैं।
विवेक
यह संसार उन लोगों के लिए सिद्ध है जो अवसर देखकर काम करते हैं।
विवेक
उत्पत्ति और विनाशशील वस्तुओं के वश में न होना अर्थात् उनके लिए दुःखी न होना ही मनुष्य की वास्तविक विजय है।
अनासक्ति
जो बिना कहे समझे वह देवता, जो कहने पर समझे वह मनुष्य, जो कहने पर भी न समझे वह जानवर के समान है।
विवेक
दुनिया आपके अनुसार नहीं चलेगी आपको दुनिया के अनुसार चलना होगा अतः यदि संसार में सुखी रहना है तो समन्वय करना सीख लें।
विवेक
जीने का आनंद संघर्ष में नहीं समर्पण में होता है संघर्ष में हमेशा पुरस्कार नहीं तिरस्कार ही मिलता है और समर्पण में सदा आदर-सत्कार मिलता है, इतिहास में हनुमान का समर्पण और रावण का संघर्ष दोनों दृष्टान्त हैं।
भक्ति
परिस्थितियों व वातावरण के अनुरूप अपने आपको ढालने (बदलने) वाला ही सुखी होता है। सुख के लिए अपने से हीन गरीबों को देखकर जियें।
संतोष
अपने सेवक से बहुत हिलमिल न जाओ, शुरू में यह मेलजोल बड़ा सुखद लगता है किन्तु अंत में तिरस्कार को जन्म देता है।
संगति
आज जो अच्छा महसूस हो रहा है वह कल भी अच्छा था पर समझ नहीं पा रहे थे क्योंकि हमारी सोच अच्छी नहीं थी अतः इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अच्छे-बुरे पदार्थ नहीं, हमारी सोच होती है।
मन
प्रतिभावान वह है जिसमें समझदारी व कार्यशक्ति विशेष है।
ज्ञान
आँखों के सामने जब फूल खिला है तो काँटों के बारे में सोच-सोचकर स्वयं को क्षत-विक्षत मत कीजिए।
मन
विवेकी पुरुष को अपने मन में यह विचार करना चाहिए कि मैं कहाँ हूँ, कहाँ जाऊँगा? मैं कौन हूँ? यहाँ क्यों आया हूँ? और किसलिए? किसका शोक करूँ?
विवेक
स्वयं को न बदलने वाला कभी आनंदित नहीं हो सकता, सदा संतप्त व दुःखी रहता है तथा वह स्वर्ग में भी नरक निर्मित कर देता है।
विवेक
रात-रात भर प्रार्थना करने की अपेक्षा एक घंटा भी दूसरों को ज्ञान देने में खर्च करना ज्यादा अच्छा है। ज्ञानवान् को जगत् में कोई झंझट नहीं रह जाती है।
ज्ञान
यदि किसी वस्तु की आवश्यकता है तो वह है व्यावहारिक ज्ञान की।
ज्ञान
जिसके पास ज्ञान है वही सच्चा धनवान है।
ज्ञान
ज्ञानी पद ग्रहण करते समय रोता है और अज्ञानी पद ग्रहण करते समय हँसता है क्योंकि पद आपद का आस्पद (स्थान) है।
ज्ञान
जन्म के बाद मृत्यु, उत्थान के बाद पतन, संयोग के बाद वियोग, संचय के बाद क्षय निश्चित है। यह समझ कर ज्ञानी हर्ष व शोक के वशीभूत नहीं होते हैं।
ज्ञान
जो ज्ञानियों के साथ चलता है वह अवश्य ज्ञानी हो जाता है।
संगति
ज्ञानी वह है जो वर्तमान को ठीक से पढ़ सके और परिस्थिति के अनुसार चल सके।
ज्ञान
ज्ञानी प्रशंसा से फूलते नहीं हैं और निंदा से कूलते नहीं हैं।
ज्ञान
स्थितियाँ गतिशील हैं उन्हें लेकर चिन्तित होना ज्ञानी को शोभा नहीं देता है।
ज्ञान
भूल मालूम होते ही उसे तुरन्त सुधारना ही ज्ञानी का लक्षण है।
ज्ञान
स्वयं की प्रशंसा व दूसरों की निन्दा (बुराई) करने वाला कभी ज्ञानी नहीं हो सकता है।
विनम्रता
दो ज्ञानियों के मिलने से रहस्य खुलते हैं और दो अज्ञानी के मिलने से विसंवाद के द्वार खुलते हैं।
ज्ञान
बल से कम बुद्धि से ज्यादा काम लेने वाला विवेकी माना जाता है।
विवेक
प्रशंसा करने वाले ने तुम्हें क्या दे दिया? वह तो आप में क्षोभ पैदा करके संकल्प-विकल्प की चक्की चलाकर चला गया है।
विनम्रता
जब सुखी जीव भी अपना सुख और ज्ञान नहीं दे सकते हैं तब जिनके पास सुख नहीं है वे हमें सुखी कैसे कर सकते हैं।
विवेक
गाड़ी में पेट्रोल के समान संहनन के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं होता है।
धर्म
रात्रि में 'पानी' पीना खून एवं भोजन व द्रव्य खाना 'मांस' के समान माना गया है, तब रात्रि में अभिषेक पूजन कैसे करें?
आहार
नरकों में उपदेश देने वाले आचार्य नहीं होते फिर भी पूर्व संस्कार से सम्यग्दर्शन हो जाता है।
धर्म
चाण्डाल धीवरादि सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकते हैं अणुव्रत धारण कर सकते हैं पर अभिषेक नहीं कर सकते हैं क्योंकि जैन दर्शन में पर्याय की प्रधानता से क्रियायें होती हैं।
धर्म
विज्ञान मानववादी है और महावीर मानवतावादी थे, आतंकी दुर्घटनाओं, बड़ी-बड़ी बीमारियों में भी वर्तमान विज्ञान के उपकरण कारण बन रहे हैं लोगों का जीवन-अस्त व्यस्त हो रहा है, लाभ कम हानि ज्यादा हो रही है।
Misc.
'पर' का विचार एवं पर की चर्चा ही बेचैनी के कारण है।
मन