Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 14

सबसे सुन्दर एक-जिसका नाम विवेक

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याद रखना जिस दिन आपके कारण माँ-बाप की आँखों में आँसू आते हैं, उस दिन आपका किया हुआ सारा धर्म माँ-बाप के आँसू में बह जाता है।
परिवार
श्री के राग में श्रीजी को मत भूलो। राग सत्य पर आवरण कर देता है।
अनासक्ति
यदि सपने सच न हो तो रास्ते बदलो सिद्धान्त नहीं क्योंकि पेड़ भी सुख से जीने के लिए पत्तियाँ बदलते जड़ें नहीं बदलते हैं।
चरित्र
अन्दर जब विषय कषाय की आँधी चलती है तब विवेक की आँख बन्द हो जाती है।
विवेक
रत्नत्रय धर्म को पाकर विषय सुख में रंजित होना भस्म के लिए चंदन को जलाने के समान निष्फल है। विषय विरक्त होने पर भी तप भावना, धर्म भावना सुखपूर्वक मरणादि रूप समाधि अति दुर्लभ है।
धर्म
जहाँ विवेक होता है वहाँ वेग नहीं काम करता, जहाँ वेग होता वहाँ विवेक नहीं होता है।
विवेक
करणीय अकरणीय का ज्ञान ही विवेक कहलाता है।
विवेक
सब प्रकार की क्रियाओं में विवेक प्रधान है।
विवेक
विवेकी वैरागी मनुष्य स्त्री को शृंखला के समान मानता है।
अनासक्ति
जब आपका तन भी आपका साथ नहीं देगा तो फिर तन के सम्बन्धी कैसे आपका साथ दे सकते हैं, जिसके लिए कमाया वह तन भी आपके साथ नहीं जायेगा। पाप कर्म के उदय से घर में भी बहुत दुःख होता है।
अनासक्ति
जब हम दिन की शुरूआत करते हैं तब लगता है कि पैसा ही जीवन है, लेकिन जब शाम को लौटकर घर आते हैं तब लगता है कि शान्ति ही जीवन है।
संतोष
उपलब्धि और आलोचना एक-दूसरे के मित्र हैं, उपलब्धियाँ बढ़ेंगी तो निश्चित ही आपकी आलोचनाएँ होंगी।
Misc.
श्रद्धा रहित का तप करना एवं साधु बनना व्यर्थ है।
भक्ति
साधु साधना से दिव्य चिन्तामणि भी प्राप्त कर सकते और खली का टुकड़ा भी, अब विवेक उस साधक का है कि वह क्या प्राप्त करना चाहता है ?
विवेक
संवेदनशील इंसान कभी-कभी छोटी बातों को बहुत ज्यादा सोचकर अपनी सारी खुशी को दफन कर देता है।
मन
हमें शंका के आधार पर फैसला नहीं लेना चाहिए।
विवेक
किसी को दुबारा बुलाने के लिए 'आना' शब्द का प्रयोग करने के स्थान पर 'आइये' शब्द का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि आना में 'आ' के साथ 'ना' शब्द लगा हुआ है जो नहीं का सूचक है, ऐसे ही 'भोजन करो न' के स्थान पर 'भोजन कीजिए', 'बैठो न' के स्थान पर 'बैठिये' आदि शब्द बोले।
वाणी
हम जो भी करें उसमें हमें हेय-उपादेय का ज्ञान होना चाहिए।
विवेक
पुण्य या पुण्य क्रिया हेय नहीं है, उसके फल में तल्लीन हो जाना हेय है।
कर्म
जिस पुण्य के आवेग में जीव धर्म कार्य को भूल जाये, अहिंसा को भूल जाये, धर्मात्माओं की अवहेलना करने लग जाये, पुण्य क्रिया को भूल जाये वह पुण्य सर्वथा हेय है।
कर्म
जिस घर में जिनेन्द्र देव का समीचीन बिम्ब नहीं है उसे विद्वानों ने पक्षी के घोंसले के समान पापदायक कहा है।
भक्ति
अज्ञान से किया पाप सम्यग्ज्ञान से छूट जाता है परन्तु ज्ञान से जानकर किया पाप वज्रलेप हो जाता है।
कर्म
यदि धीरता और कायरता में भी मृत्यु होती है तो तू कायरता को छोड़कर धीरता से ही मरण कर। जो मनुष्य दो कोस गाँव को जाता है तो नाश्ता ले जाता है वह दुर्बुद्धि परलोक में जाते हुए क्या धर्म रूपी नाश्ता नहीं ले जायेगा ?
समाधि
जहाँ अज्ञान वरदान हो वहाँ बुद्धिमानी दिखाना मूर्खता है।
विवेक
अपनी भूल को स्वीकार करने में जो गौरव है वह अन्याय को चिरायु रखने में नहीं है।
विनम्रता
कितना भी दुःखद विषय क्यों न हो उसकी चर्चा करते समय कठोर भाषा का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
वाणी
पशु न बोलने से कष्ट उठाता है और मनुष्य बोलने से क्योंकि बोलने की कला नहीं जानता, कहाँ क्या बोलना?
वाणी
विवेक हीन व्यक्ति को केवल स्नेही होने के कारण गुप्त विचारना में सम्मिलित नहीं करना चाहिए।
विवेक
मन के हाथी को विवेक के अंकुश में रखो क्योंकि तुम्हारा विवेक ही तुम्हारा गुरु है।
मन
शंका के बादल विवेक के सूरज को ढँक देते हैं।
विवेक
जो मनुष्य हँसी उड़ाने वालों को शिक्षा देता है वह स्वयं अपमानित होता है। दुर्जनों को चेतावनी देने वाला अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारता है।
संगति
रोगी को देखकर आना शिष्टाचार है, दवा लाकर देना सच्ची संवेदना है।
दान
वक्त पर एक टाँका लगा दिया जाए तो बाद में नौ टाँके नहीं लगाने पड़ते हैं।
समय
जब तुम किसी दुर्बल को सताने के लिए उद्यत हो तो सोचो कि आपसे बलवान मनुष्य के आगे भय से जब तुम काँपोगे तब तुम्हें कैसा लगेगा?
अहिंसा
पहले यह देख लें कि इस काम में लागत कितनी लगेगी, कितना माल खराब जायेगा और इसमें लाभ कितना होगा? बाद में उस काम को हाथ में लें।
विवेक
कुछ काम ऐसे हैं जिन्हें नहीं करना चाहिए, उन्हें यदि तुम करोगे तो नष्ट हो जाओगे तथा कुछ काम ऐसे है कि जिन्हें करना ही चाहिए, यदि तुम उन्हें नहीं करोगे तो भी नष्ट हो जाओगे। जिसका तुम्हें उपकार करना है उसके स्वभाव का यदि तुम ध्यान न रखोगे, तो तुम भलाई करने में भी भूल कर सकते हो।
विवेक
हद से ज्यादा मात्रा में रखे जाने पर मोर पंख भी गाड़ी की धुरी को तोड़ डालते हैं।
संतोष
अनजाने मनुष्य पर विश्वास करना और जाने हुए योग्य पुरुष पर संदेह करना; ये दोनों ही बातें एक समान अगणित आपत्तियों की जननी है।
विवेक
जब एक सम्बन्धी जिसका सम्बन्ध तुमसे टूट गया हो और तुम्हारे पास किसी प्रयोजन के कारण वापस आता है तो तुम उसे सतर्कता के साथ स्वीकार करो।
संगति
बुद्धिमान लोगों के सामने उपदेशपूर्ण व्याख्यान देना जीवित पौधों को पानी देने के समान है।
ज्ञान