Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Dharma

धर्म

423 सूत्र · पृष्ठ 3 / 6

ऋषि बनो या कृषि करो, भगवान् आदिनाथ का मुख्य संदेश है।
धर्म
पुण्य का परिवार–पिता–ज्ञान, माता–दया, भाई–सत्य, बहन–सुबुद्धि, पुत्र–सन्तोष, पुत्री–ममता, मूल बाबा–क्षमा।
धर्म
जो पुरुष धर्म, अर्थ और काम इन तीनों का समयानुसार सेवन करता है, वह इस जन्म और पर-जन्म में धर्म, अर्थ, काम के संयोग को प्राप्त होता है।
धर्म
धर्म में राजनीति नहीं होती अपितु राजनीति में धर्म आवश्यक है।
धर्म
जो व्यक्ति अपने सत्कर्तव्यों के अनुष्ठान द्वारा पारलौकिक हित में प्रयत्नशील नहीं है वह जन्मान्ध हैं।
धर्म
चौरासी लाख योनियों और चतुर्गतियों में मनुष्य भव ही एक ऐसी सीढ़ी है, जो ऊपर व नीचे की पूर्ण यात्रा कराने में समर्थ है।
धर्म
अवकाश के दिन पुण्य कार्य कीजिए, ताकी बीते दिनों के पाप धुल सकें और आने वाले दिनों को नई दिशा व ऊर्जा मिल सके।
धर्म
शरीर और वैभव अनित्य है और मृत्यु निकट है अतः सिर्फ धर्म का ही संग्रह करना चाहिए।
धर्म
आपके परिवार में कब, कौन, किस पीढ़ी में सन्त बना यह महत्त्वपूर्ण नहीं, महत्त्वपूर्ण तो यह है कि आप कब सन्त बनेंगे।
धर्म
सुख भोगने के लिए स्वर्ग है तथा दुःख भोगने के लिए नरक है और सुख-दुःख दोनों से ऊँचे उठकर महान् आनन्द प्राप्त करने के लिए यह मनुष्य लोक है।
धर्म
गृहस्थ साधना नहीं कर पाता इसलिए साधकों की उपासना करता हैं।
धर्म
प्राणी को अंगों का महत्त्व ज्ञात है अतः उसे सभी अंग प्रिय हैं और एक भी अंग खराब नहीं चाहता, एक अंग खराब होने पर लाखों करोड़ों रुपये खर्च कर देता है, इसी प्रकार सम्यग्दर्शन के सभी अंगों का पालन करना चाहिए।
धर्म
कर्त्तव्य करके जीवन चलाना ही कर्म योग है।
धर्म
सम्यक् प्रवृत्ति करने में यदि लोक हास्य का भय है, तब वह सम्यक्त्व का अतिचार है, अतः लोक हास्य का भय मत करो, जो उचित हो, उसे करें।
धर्म
स्वभावदृष्टि, परमात्म स्मरण, शास्त्राभ्यास, दोषवाद में मौन, सद्वृत्त कथा, प्रियहित वचनालाप और सत्संग, इस प्रकार के क्रम से पुरुषार्थ करो अर्थात् पूर्व-पूर्व की और बढ़ो। यदि पूर्व में शिथिल हो जाओ या थक जाओ, तब उत्तर का आश्रय लो। सर्वप्रथम स्वात्म दृष्टि इसलिए है कि इससे भी चूक जाने पर कल्याण की आशा नहीं है।
धर्म
स्तोत्र, मंत्र, व्रत, पूजा, ध्यान, ज्ञान, उत्तम विचार, दान, शील, सहयोगीजन और गुरुजनों की सेवा के द्वारा मनुष्य जिससे संभव हो प्रयोजन सिद्ध करें।
धर्म
यह मत सोचो कि मैं धीरे–धीरे धर्म मार्ग का अवलम्बन करूँगा, वह अभी बिना विलम्ब के शुरू करना प्रारम्भ कर दो क्योंकि धर्म ही वह वस्तु है, जो मृत्यु के समय भी तुम्हारा साथ देने वाला अमर मित्र है।
धर्म
किसी से मत पूछो कि धर्म करने से क्या लाभ है? बस एक बार पालकी उठाने वाले कहारो की ओर देख लो और फिर उस आदमी को देखो जो उसमें सवार है।
धर्म
सन्त सुख का मोक्षमार्ग का उपदेश ही नहीं देते हैं, उपाय भी बताते हैं।
धर्म
संतों का काम ट्रेफिक पुलिस के समान है, जो समाज के गतिरोधों को दूर करता है।
धर्म
धर्म और देश के लिए जीवित रहना ही यथार्थ जीवन है।
धर्म
स्त्री का फल पुत्र है, शास्त्र का फल शान्ति है, सम्पत्ति का फल दान है, लक्ष्मी का फल कीर्ति है, श्रम का फल धन है, वैराग्य का फल दीक्षा है, दीक्षा का फल तपस्या है, तपस्या का फल कर्म नष्ट कर मोक्ष प्राप्त करना है और सद्गृहस्थ होने का फल प्रतिदिन श्री जिनेन्द्र देव के चरण कमल की भाव सहित पूजा करना तथा सत्पात्र को दान देना है।
धर्म
अन्य क्षेत्र में हुआ पाप धर्म क्षेत्र में नष्ट हो जाता है, धर्म क्षेत्र में किया पाप वज्र लेप के सदृश हो जाता है अत: धर्म क्षेत्र में निवास करते समय थोड़ा–सा भी पाप न करें।
धर्म
संसार भर के धर्म ग्रन्थ, सत्य वक्ता महात्माओं की महिमा का घोष करते है।
धर्म
त्यौहार में पदार्थ ग्रहण किए जाते हैं तथा पर्व में समस्त पदार्थों का विषय वासनाओं का त्याग किया जाता है।
धर्म
जैन दर्शन संस्कृति, समन्वय व सामंजस्य प्रधान है।
धर्म
जो भी अधर्म के पथ पर चलेगा उसका पतन अवश्य होगा चाहे वह श्रावक हो या साधु।
धर्म
जो श्रावक मुनि बनने के अतितीव्र भाव रखता है वही मुनि बन पाता है।
धर्म
जैसे आप अपनी सम्पत्ति अपने पुत्रों को सौंपते हो वैसे ही जिनशासन की सम्पत्ति सदाचरण द्वारा सौंपना चाहिए।
धर्म
स्व-पर कल्याण की भावना से संत बनना बहुत कठिन हैं।
धर्म
जिस प्रकार अन्न की उत्पत्ति के लिए आदर्श बीज भंडारों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मानव विकास के लिए श्रद्धालु, संतोषी एवं दृढ़व्रती व्यक्तियों के आश्रमों की आवश्यकता होती है।
धर्म
शिष्य में तीन चीजें जरूर होनी चाहिए–आदर, आज्ञा और अनुशासन पालन।
धर्म
जिनकी बुद्धि शास्त्र के अनुसार चलती है वे सम्यग्दृष्टि हैं और जो अपनी बुद्धि के अनुसार शास्त्र को चलाते हैं वे मिथ्यादृष्टि है।
धर्म
जिन वचन महापुण्य के उदय से मिलते हैं व उनके रहस्य का ज्ञान महापुरुषार्थ से होता है।
धर्म
जिसका मन धर्मशास्त्र सुनने में सदा लालसायुक्त रहता है, वही इस जगत् में परमार्थ को अच्छी तरह जानता है, अन्य नहीं।
धर्म
आध्यात्मिक जीवन जीने की कला है शास्त्र स्वाध्याय।
धर्म
शास्त्र स्वाध्याय शिवपुर पहुँचाने वाला वायुयान है।
धर्म
सिर्फ शास्त्र को पढ़ लेने से आत्मा पवित्र नहीं होती है, जैसे सन्दूक में साबुन बन्द रखने से कपड़ा साफ नहीं होता है, अतः जैसे साबुन का प्रयोग करना अनिवार्य है वैसे ही शास्त्रों के सूत्रों को आचरण में उतारना अनिवार्य होता है।
धर्म
नीति और सिद्धान्तों का अनुग्रहण और अनुपालन शास्त्रों के स्वाध्याय बिना असम्भव है।
धर्म
सत्साधना में बढ़ते हुए योगी को यदि गिरने का कोई निमित्त है तो प्रतिष्ठा।
धर्म
पश्चाताप कोई भी कर सकता, प्रायश्चित्त तप धर्मात्मा ही ग्रहण करते हैं।
धर्म
जैनदर्शन में वीतरागता और अहिंसा के विषय में कभी दो प्रमाण नहीं मिलेंगे।
धर्म
जैसे किसी कैदी को न्यायालय से बरी होने का आदेश प्राप्त हो लेकिन अभी वह जेल में है और ड्रेस भी जेल की पहने है उस समय वह जेल की नहीं बल्कि जेल से मुक्ति की अनुभूति करता है, उसी प्रकार अरहंत भगवान् को भाव मोक्ष होने से अनंत सुख है।
धर्म
कल्की धर्म का नाश करता उपकल्की धर्म को बढ़ाता है।
धर्म
देव-शास्त्र-गुरु समान होते हुए भी भगवान् के समान जिनवाणी की स्थापना नहीं होती गुरु को बिना नहाये भी छू लेते है पर स्त्रियाँ नहीं छूती हैं।
धर्म
दर्जी को कपड़ा, नाई को सिर, ड्राइवर को जीवन सौंपते उससे ज्यादा श्रद्धा धर्म के प्रति होना चाहिए।
धर्म
राष्ट्र धर्म, राज धर्म, समाज धर्म की अपेक्षा आत्मधर्म श्रेष्ठ होता है।
धर्म
जिस गुणस्थान का भेष है तदनुरूपभाव भी होना चाहिए।
धर्म
विदेशों में विद्या धन है, संकटों में बुद्धि धन है, पर लोक में धर्म धन है और शील सर्वत्र धन है।
धर्म
धर्म कामधेनु है, धर्म चिन्तामणि है, धर्म स्थिर रहने वाला कल्पवृक्ष है और धर्म अविनाशी निधि है।
धर्म
धर्म श्रवण से पापों का नाश, पुण्य, बुद्धि, स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
धर्म
भय, उदारता, कीर्ति, आशा और लज्जा से पंचमकाल में धर्म की प्रवृत्ति होती है।
धर्म
ढाईद्वीप सिद्धक्षेत्र है यहाँ पाप न करें।
धर्म
पापों का प्रायश्चित और हितकारी धर्म करने में बिल्कुल भी विलम्ब न करें।
धर्म
मुनि शापानुग्रह में समर्थ होते हैं अतः उनका अपमान दोनों लोको में दुःखदायी होता है।
धर्म
हम मरने के बाद स्वर्ग जाएँ, यह महत्त्वपूर्ण नहीं, पर मरने के पहले स्वर्ग बना जाएँ यह महत्त्वपूर्ण है।
धर्म
संसार में वीतराग जैसा देव नहीं, निर्ग्रन्थ जैसा गुरु नहीं, अहिंसा जैसा धर्म नहीं, णमोकार जैसा मंत्र नहीं, अभय जैसा दान नहीं, सत्य जैस तप नहीं, ब्रह्मचर्य जैसा व्रत नहीं और संतोष जैसा सुख नहीं है।
धर्म
इतिहास कहता है कि कल सुख था, विज्ञान कहता है कि कल सुख होगा, लेकिन धर्म कहता है कि अगर मन सच्चा और दिल अच्छा है तो हर रोज सुख है।
धर्म
धर्म में बुद्धि रहे अधिक पढ़ने से क्या? जीवों पर दया रहे अधिक दानों से क्या? मन शान्त रहे असंतुष्ट रहने वाले कुपुरुषों से क्या प्रयोजन है?
धर्म
तुम तपस्वी लोगों की महिमा को नहीं नाप सकते, यह काम उतना ही कठिन है, जितना कि दिवंगत आत्माओं की गणना करना है।
धर्म
गृहस्थाश्रम में रहने वाला मनुष्य ब्रह्मचर्य आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम का प्रमुख आश्रय हैं।
धर्म
यह जिनवचन इन्द्रिय सुख का विरेचन करने वाली अमृतरूप औषध है, जन्म-मरण की व्याधि को हरने वाली है तथा सब दुःखों का क्षय करने वाली है।
धर्म
और तो और, स्वयं देवेन्द्र भी अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाये और आपना प्रभुत्व गँवा बैठे, यदि पवित्र प्रतिज्ञा वाले सन्त लोग क्रोध भरी दृष्टि से इन्द्र की ओर देख लेवें।
धर्म
धर्मात्माओं के उपदेश एक सुदृढ़ लाठी के समान हैं क्योंकि जो उनके अनुसार काम करते हैं, उन्हें वे गिरने से बचाते हैं।
धर्म
धर्म शास्त्र में जो काम हेय बताये गये हैं, उनको भी जो नहीं छोड़ सकते ऐसे मनुष्यों को देखो; उनके चाहे मनोरथ सफल भी हो गये हों, तो भी उन्हें शान्ति नहीं मिलेगी।
धर्म
यदि आत्म बलशाली ऋषि गण तुम पर नाराज है तो विविध प्रकार के आनन्द से उल्लसित भाग्यशाली जीवन और समस्त ऐश्वर्य से पूर्ण तुम्हारा धन फिर कहाँ होगा?
धर्म
धन घर तक साथ चलेगा, परिवार श्मशान तक साथ चलेगा पर धर्म और सेवाभाव तो दूसरे जन्म तक भी आपके साथ चलेगा।
धर्म
धर्म के द्वार क्षमा, नम्रता, सरलता, संतोष।
धर्म
दया, दान, इन्द्रिय-दमन, देवदर्शन, पूजन और गुरु की दासता जिसके पास है वह दुर्गति को प्राप्त नहीं होता है।
धर्म
जिस क्षण हम पापों का त्याग अंतरंग से कर देते हैं, उसी क्षण हमें धर्म की प्राप्ति हो जाती है।
धर्म
पापजाल से विमुक्त ही ब्राह्मण है, शान्त गुणों से भूषित व्यक्ति श्रमण है, आशाओं को छोड़ने वाला ही संन्यासी है, सत्य रूपी भूषण से भूषित व्यक्ति ही साधु है।
धर्म
दो ही अपने विपरीत कर्म के कारण शोभा नहीं पाते, अकर्मण्य गृहस्थ तथा प्रपंच में लगा हुआ संन्यासी।
धर्म
गुरुओं के दर्शन न करने से सम्यक्त्व की हानि होती है, गुरुओं की आज्ञा भंग करने से आराधना की हानि होती है, समय पर प्रतिक्रमण न करने से व्रत की हानि होती है, साधर्मी की परस्पर वैय्यावृत्ति न करने से धर्म तीर्थ की हानि होती है, तप न करने से निर्जरा की हानि होती है, क्रोध-क्लेश करने से स्नेह की हानि होती है, मान करने से पुण्य की हानि होती है, मायाचार करने से पुण्य और यश की हानि होती है, लोभ से शान्ति की एवं स्त्री की आकांक्षा से ब्रह्मचर्य की हानि होती है।
धर्म
सच्चा धर्म दिखावे और आडम्बर का नाम नहीं है बल्कि मानव सेवा और त्याग भावना द्वारा दीन-दुखियों के आँसू पोंछने और प्यार बाँटने का नाम है।
धर्म
जैनदर्शन के व्रत जीने के लिए है मरने के लिए नहीं/यदि जीवन का अंत निश्चित है तो व्रत नहीं तोड़ना चाहिए।
धर्म