Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

अनेक त्यागियों और धर्मात्माओं के बीच रहकर अपने को अकेला देखता हुआ प्रसन्न रह करके जीवन बिता, आज के युग में बाह्य में अकेला मत रह अन्तरङ्ग में अकेला रह, बहुत पुरुषों के समागम में कषाय वृद्धि और समाधिहीनता का भय है तो समागम छूटने में संयम हीनता का भय है, इस काल में समागम बहुत सहायक है।

Living amidst many renunciants and pious souls, pass your life content though seeing yourself alone; in this age do not be outwardly alone but inwardly alone. In the company of many there is fear of rising passions and loss of equanimity, while in the loss of company there is fear of losing restraint; in this era, company is greatly helpful.

— आराध्य सूत्र · #5716

इसी विषय के और सूत्र

सभी संगति →
संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति