Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

जिन पुरुषों के यश और मान का लोभ अधिक हो, उनके साथ मुमुक्षु पुरुष को कभी नहीं रहना चाहिए क्योंकि उसके साथ में या तो उल्लू बनकर रहना होगा या अपमान सहना होगा और उसे भी यश का पिशाच लग जावेगा तथा प्रशंसा का आसक्त निर्दय चित्त होता है।

A seeker of liberation should never live with men greedy for fame and honour, for with them one must either play the fool or endure insult, and one too becomes possessed by the ghost of fame; the mind addicted to praise grows pitiless.

— आराध्य सूत्र · #5715

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति