Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 12 / 41

सुनने वाले लाखों है, सुनाने वाले हजारों हैं, समझने वाले सैकड़ों हैं परन्तु सत्कार्य करने वाले कोई विरले ही हैं, सच्चे पुरुष वे ही हैं और सच्चा लाभ भी उन्हीं को प्राप्त होता है जो सत्कर्म करते हैं।
पुरुषार्थ
यह मत सोचो की लोग क्या कहेंगे? क्योंकि उनको जो कहना है वे तो कहेंगे ही। एक बार चंदू दादा जी अपने पप्पू को घोड़े पर बिठाकर जा रहे थे, तो कुछ लोगों ने देखकर कहा–बेटा आपको शर्म नहीं आती दादाजी पैदल चल रहे और आप घोड़े पर बैठे हो। तो पप्पू घोड़े से उतरकर चलने लगा और दादाजी को घोड़े पर बिठा दिया, आगे कुछ लोगों ने कहा–अरे दादाजी जरा विचार करो छोटा-सा बच्चा पैदल चल रहा और आप घोड़े पर बैठे हो तो अब वे दोनों घोड़े पर बैठकर आगे बढ़े परन्तु पुनः किसी ने कहा–क्या आपके पास दया नाम की कोई चीज नहीं है, जो एक घोड़े पर दोनों बैठे हो, अतः अब वे दोनों पैदल घोड़े को लेकर चलने लगे लेकिन एक व्यक्ति ने कहा–दुनिया में बहुत मूर्ख देखे हैं पर आप जैसे नहीं, जो घोड़े को साथ लिए हो और फिर भी पैदल चल रहे हो।
विवेक
जुआ सगे बाप का न हुआ। जुआ के कारण ही युधिष्ठिर आदि पाँच पाण्डवों को १२ वर्ष तक वनवास हुआ था, जिससे द्रौपदी आदि को एवं समस्त परिवार को दुःखी होना पड़ा था।
संयम
शराब पीने से प्राणी की स्मरण शक्ति क्षीण होती है, शराब से व्यक्ति की कामाग्नि अति तीव्र होती है, जिससे व्यक्ति स्वस्त्री से संतुष्ट न होकर परस्त्री एवं वेश्या सेवन करता है। शिकारी सदा भिखारीवत् होता है।
संयम
समीचीन मार्ग से स्खलन होना, विवेक का नष्ट होना, बुद्धि रूपी लता का उखाड़ा जाना, अपने शरीर का दमन, नीचत्व की प्राप्ति, सम्यग्ज्ञान का आवरण, अपने धन का हरण, पाप की वृद्धि ये सब दोष पर स्त्री सेवन से होते हैं, परस्त्री सेवन की बात ही क्या कहे दर्शन ही क्लेश दायक होता है।
ब्रह्मचर्य
मनुष्य तभी तक वास्तविक गुणों का घर है, बुद्धिमान, सज्जन, प्रिय, शूरवीर, चरित्रवान, कलंकरहित, स्वाभिमानी, कृतज्ञ, पंडित, चतुर, धर्मरत, शील गुण सहित और प्रतिष्ठा से युक्त रहता है जब तक निष्ठुर वज्रपात के समान 'देहि' याचना का वचन नहीं कहता है।
चरित्र
निर्धनता मनुष्य में चिंता उत्पन्न करती है, दूसरों से अपमान कराती है शत्रुता उत्पन्न करती है, मित्रों से घृणा का पात्र बनाती है और आत्मीय जनों से विरोध कराती है, निर्धन व्यक्ति की घर छोड़कर वन जाने की इच्छा होती है, उसे स्त्री से भी अपमान सहना पड़ता है, हृदय स्थित शोकाग्नि एक बार ही जला नहीं डालती अपितु संतप्त करती रहती है।
धन
अव्यवस्थित दिनचर्या सदैव हानिकारक होती है, इससे आप पराधीन हो जाते हैं और आपके गुणों को अवगुणों की चादर ढँक लेती है, फिर शुरू होता है समस्याओं का अंतहीन सिलसिला। अपनी आवश्यकताएँ कम करके आप वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं।
संयम
हिरणों के भय से क्या खेती नहीं की जाती? अजीर्ण के भय से क्या भोजन छोड़ दिया जाता है? खटमलों के भय से क्या बिस्तर छोड़ दिये जाते हैं? अर्थात् नहीं, तो उसी प्रकार विघ्नों के भय से सज्जन पुरुष संयम (कर्त्तव्य) पथ को नहीं छोड़ते हैं।
पुरुषार्थ
वर्तमान समय में घरों में और समाज में जो अशान्ति, कलह, संघर्ष, देखने में आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं।
परिवार
पुरुषार्थ बिना कोई जीव एक क्षण नहीं रहता, चाहे सीधा पुरुषार्थ करे या उल्टा क्योंकि पुरुषार्थ यानि वीर्य गुण है गुण का अभाव होने पर गुणी का अभाव हो जाता है।
पुरुषार्थ
पुरुषार्थ कर्माधीन नहीं क्योंकि वह आत्मा का गुण है, कर्म के उदय में वह गुण विकृत रूप परिणमता है और कर्म के अभाव में स्वभाव के अनुकूल परिणमन करता है।
पुरुषार्थ
कान से जल्दी आँख ग्रहण करती है और कान की बात तो भूल सकते हैं परन्तु आँखों की देखी बात भूलते नहीं है इसलिए अच्छे निमित्तों का देखना और बुरे निमित्तों को नहीं देखना महत्वपूर्ण है।
विवेक
जो लोग पुरुषार्थ का महत्व स्वीकार नहीं करते हैं, उन्हें सांसारिक कार्यों में भी पुरुषार्थ छोड़ देना चाहिए, यदि नहीं छोड़ते हैं, तब उन्हें मोक्षमार्ग में भी पुरुषार्थ करना चाहिए अन्यथा लोमड़ी जैसे खट्टे अंगूर हैं।
पुरुषार्थ
जो लोग भवितव्य पर विश्वास कर पुरुषार्थ करना छोड़ देते हैं, उन्हें भवितव्य पर विश्वास नहीं हैं क्योंकि भवितव्य में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों गर्भित हैं, दोनों का विश्वासी ही भवितव्यता का विश्वासी माना जाता है।
पुरुषार्थ
मानवीय गुणों और अवगुणों की ठीक-ठीक जाँच सदा उसके सत्कार्य से ही नहीं होती है, अपितु एक छोटा-सा कार्य, एक छोटी-सी बात, या एक छोटे-से परिहास से भी मानव के असली चरित्र पर काफी प्रकाश पड़ता है।
चरित्र
आचारहीन ज्ञान नष्ट हो जाता है और ज्ञानहीन आचार जैसे वन में अग्नि लगने पर पंगु उसे देखता हुआ और अंधा दौड़ता हुआ भी आग से बच नहीं पाता, जलकर नष्ट हो जाता है।
ज्ञान
सच्चा पुरुषार्थी वही है जो बार-बार असफल रहने पर भी अपने प्रयत्न में शिथिलता नहीं आने देता और असफलता के बाद नए उत्साह से सफलता के लिए उद्यम करने लगता है।
पुरुषार्थ
यदि तुम गुणों का विकास करना चाहते हो तो गुणानुराग का विकास करो, गुणी व्यक्ति को सामने रखो, उसके गुणों के बारे में सोचो, अनुमोदन करो, बाहर का यह कार्य भीतर एक शक्ति पैदा करेगा और तुम गुणी बन जाओगे।
चरित्र
प्रत्येक व्यक्ति के अभिप्राय को सुनो परन्तु सुनकर एकदम से बहक न जाओ उस पर विचार करो, जिससे आत्मा सहमत हो वही करो, बातें सुनने में जितनी कर्णप्रिय होती हैं; उनके अंदर उतना रहस्य नहीं होता, रहस्य वस्तु की प्राप्ति में है, दर्शन में नहीं, मिश्री का स्वाद चखने से आता है, देखने से नहीं।
विवेक
एक अच्छा इंसान बनें और प्रतिज्ञा करें कि छोटों के साथ नरमी से, बड़ों के साथ करुणा से, संघर्ष करने वालों के साथ हमदर्दी से और कमजोर व गलती करने वालों के साथ सहनशीलता से पेश आयें क्योंकि हम अपने जीवन में कभी न कभी इनमें से किसी न किसी स्थिति से गुजरते हैं।
चरित्र
अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए उस साध्य के सिद्ध होने तक दूसरी किसी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए दिन-रात सपने तक में उसी की धुन रहे तभी सफलता मिलती है। स्मरण रखो! सत्कर्मों से, समय से पहले व भाग्य से अधिक भी मिल सकता है।
पुरुषार्थ
जो सिर्फ बहाने बनाने में माहिर होते हैं, वे किसी और चीज में माहिर नहीं होते हैं। यदि परिस्थितियाँ अनुकूल हैं तो सीधे अपने ध्येय की ओर चलो, लेकिन यदि परिस्थितियाँ अनुकूल न हों तो उस मार्ग का अनुसरण करो, जिसमें सबसे कम बाधा आने की सम्भावना हो।
पुरुषार्थ
संसार की सारी वस्तुएँ ठोकर लगने से टूटती हैं, पर एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो ठोकर लगने से बनता है। ठोकरों से घबराओ मत, इनसे शिक्षा लो, बोध लो, ज्ञान लो, ठोकरें मनुष्य को अनुभवी बनाती हैं और ठोकर खाकर ही व्यक्ति ठाकुर बनता है।
पुरुषार्थ
तुम अपने जीवन का निरीक्षण, विश्लेषण कर देखो! यदि तुम्हारे जीवन में शान्ति बढ़ रही है, संतोष बढ़ रहा है, आनंद बढ़ रहा है तो तुम्हारा जीवन सही है, यदि अशान्ति बढ़ रही है, तनाव बढ़ रहा है और जीवन बोझिल हो रहा है तो गलत है, यह बात स्वयं सोचो, स्वयं विचारो किसी दूसरे से पूछने की जरूरत नहीं जीवन की दिशा बदलो, जीवन का मार्ग बदलो।
विवेक
अधिकार प्राप्त कर न्याय न भूलें, धन प्राप्त कर धर्म न भूलें, पति-पत्नी पाकर परमात्मा को न भूलें, सम्पत्ति पाकर संतों को न भूलें, साधन पाकर साधना को न भूलें, गुमान में आकर ग्रन्थों को न भूलें, पदार्थ को पाकर परमार्थ को न भूलें, सब कुछ पाकर सज्जनता–सदाचरण को न भूलें अन्यथा भविष्य बिगड़ जाएगा।
चरित्र
सरलता, विनयशीलता, दयालुता, सहिष्णुता इन्हीं चार स्तम्भों पर मनुष्यता का महल टिका है, जिस मनुष्य में इन चार गुणों में से किसी एक गुण की भी कमी आती है, तो समझ लो उसकी मनुष्यता तीन पाये की कुर्सी की तरह है।
चरित्र
मनुष्य में अगर मनुष्यता नहीं है तो मनुष्य पशु से भी नीचा है क्योंकि पशु तो अपने पूर्वकृत पापकर्मों का फल भोगकर मनुष्यता की तैयारी कर रहा है, पर मनुष्य नये पाप-कर्म करके नरकों की, पशुता की तैयारी कर रहा है।
कर्म
विश्वास कार्य सिद्धि का पिता (जनक) है, इससे योग्यता को बल मिलता है जिससे शक्ति दुगुनी हो जाती है, मानसिक शक्तियों को सहारा मिलता है, वे पुष्ट हो जाती हैं जिससे कार्य में सफलता मिलती है।
पुरुषार्थ
पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में हो माया, तीसरा सुख सुत आज्ञाकारी, चौथा सुख मृदुभाषी पतिव्रता नारी, पाँचवा सुख-सदन हो घर का, छठवाँ सुख कर्ज न हो पर का, सातवाँ सुख चले व्यापार, आठवाँ सुख सबको हो प्यार, नौवाँ सुख निराकुलता हो मन में, दसवाँ सुख न हो वैर-विरोध जीवन में, ग्यारहवाँ सुख मन लगे धर्म में, बारहवाँ सुख न फँसे कुकर्म में, तेरहवाँ सुख हो साधु समागम, चौदहवाँ सुख मर्मज्ञ जिनागम, पन्द्रहवाँ सुख जैन शील व्रतधारी, सोलहवाँ सुख हो अरिहंत पुजारी, ये सब पाय बने गृह त्यागी धन्य-धन्य वे नर अवतारी, इस भव साधु संत कहलावे, परभव सुरग मुक्ति पद पावे, नर भव सुकुल सफल जिनवाणी, बार-बार नहीं पावें प्राणी, करते 'प्रार्थना' धर्म कमावो, बार-बार नहीं नर तन पावो।
संतोष