Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 11 / 41

जब गंध अधिक बढ़ती है, तब बाग उजड़ जाते हैं। जब आवाज अधिक बढ़ती है, तब राग बिगड़ जाते हैं ॥ क्योंकि हर चीज की एक सीमा होती है बन्धुओं! जब स्वार्थ अधिक बढ़ता है, तब व्यवहार बिगड़ जाते हैं ॥
संयम
जो व्यक्ति नास्ता लिए बिना लम्बे मार्ग पर चल देता है वह चलता हुआ भूख-प्यास से पीड़ित होकर दुःखी होता है, इसी प्रकार जो व्यक्ति धर्म किए बिना परभव में जाता है वह व्याधि रोग से पीड़ित एवं दुःखी होता है।
धर्म
तौलने से अनाज की रक्षा होती है, फेरने से पान की रक्षा होती है, बारम्बार देखभाल करने से गौओं की रक्षा होती है, मैले वस्त्रों से स्त्रियों की रक्षा होती है, संयम से आत्मा की रक्षा होती है, बाड़ी से खेत की रक्षा होती है और अच्छे संस्कारों से परिवार की रक्षा होती है।
संयम
राजनीति कहती है–हाथ आए दुश्मन को छोड़ना और अपनी हार खरीदना एक ही चीज के दो नाम हैं। यदि जनता की पहुँच नेता तक हो और नेता हित, मित, प्रिय वचन बोलता हो तो वह नेता नेताओं का शिरोमणि बन जाता है।
चरित्र
धार्मिक कर्तव्यों का अनुष्ठान, उत्साहपूर्वक धनोपार्जन, प्रसन्नतापूर्वक कामपुरुषार्थ में प्रवृत्ति, शरीर शुद्धि तथा दुष्टजनों के स्पर्श से उत्पन्न हुए दोषों को दूर करने के लिए स्नान किया जाता है।
धर्म
स्नान तन को, ध्यान मन को, दान धन को, योग जीवन को, प्रार्थना आत्मा को, व्रत स्वास्थ्य को, क्षमा रिश्तों को और परोपकार किस्मत को शुद्ध करता है।
धर्म
कायर पुरुष शस्त्रधारी होने पर भी वैरी का घात नहीं कर सकता, उसी प्रकार विषय-कषायी व्यक्ति बहुत ज्ञान होने पर भी दुर्गति के दुःख नष्ट नहीं कर सकता है।
संयम
कोई काम शुरू करने से पहले स्वयं से तीन प्रश्न करें–मैं ये काम क्यों कर रहा हूँ, इसके परिणाम क्या होंगे और क्या मैं सफल होऊँगा? जब गहराई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोष जनक उत्तर मिल जायें तभी आगे बढ़ें।
विवेक
काम, अर्थ और यश में किया गया यत्न निष्फल भी हो सकता है पर धर्म कार्य के प्रारम्भ का संकल्प निष्फल नहीं होता क्योंकि मन में भाव आते ही पुण्य बंध प्रारम्भ हो जाता है।
धर्म
यदि गुणी व्यक्ति लज्जाशील हो तो दुष्ट कहते हैं कि यह मूर्ख है, व्रतादि में रूचि रखता तो दंभी है, शुद्धता के लिए ढोंग, शूर हो तो निर्दय, प्रिय भाषी हो तो दीन, तेजस्वी हो तो गर्व युक्त, वक्ता हो तो बकवासी, स्थिर हो तो शक्तिहीन इस प्रकार गुणी व्यक्तियों का वह कौन सा गुण है जिसमें दुष्ट कुछ दोष नहीं निकालते हैं।
Misc.
राजा दुर्मन्त्र से नष्ट हो जाता है, साधु परिग्रह से, पुत्र अधिक लालन से, व्रती अध्ययन न करने से, कुल कुपुत्र से, शील दुष्टों के संसर्ग से, मित्रता प्रेम के अभाव से, समृद्धि अनीति से, स्नेह प्रवास में रहने से, स्त्री गर्व से, कृषि छोड़ देने से तथा धन प्रमाद से नष्ट हो जाता है।
Misc.
वही मनुष्य नेता बनने योग्य होता है, जो अपने सहायकों की मूर्खता की, अपने अनुगामियों के विश्वास घात की, मानव जाति की कृतघ्नता की और जनता की गुण-ग्रहण हीनता की, कभी शिकायत नहीं करता है।
चरित्र
यदि मनुष्य के पास क्षमा है तो कवच की क्या आवश्यकता? यदि क्रोध है तो शत्रुओं की क्या आवश्यकता? यदि मित्र हैं तो दिव्य औषधियों की क्या आवश्यकता? यदि दुर्जन है तो सर्पों की क्या आवश्यकता? यदि निर्दोष विद्या है तो धन की क्या आवश्यकता? यदि लज्जा है तो आभूषण की क्या आवश्यकता? यदि काव्य शक्ति है तो राज्य की क्या आवश्यकता? यदि लोभ है तो और अवगुणों की क्या आवश्यकता? यदि चुगलखोरी है तो अन्य पापों की क्या आवश्यकता? यदि सत्य है तो तपस्या की क्या आवश्यकता? यदि मन शुद्ध हैं तो तीर्थों की क्या आवश्यकता? यदि सज्जनता है तो और गुणों की क्या आवश्यकता? यदि यश है तो आभूषणों की क्या आवश्यकता? यदि अपयश है तो मृत्यु की क्या आवश्यकता? यदि दया है तो रिश्तेदार की क्या आवश्यकता? यदि संतोष है तो स्वर्ग की क्या आवश्यकता? दुःख है तो नरक की क्या आवश्यकता?
चरित्र
शास्त्र को जानने वाला भी जो पुरुष लोक व्यवहार में पटु नहीं होता वह मूर्ख के समान है। जिस घर में मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहाँ अन्न का संचित भंडार है तथा जिस घर में स्त्री पुरुष में कलह नहीं होता, उस घर में लक्ष्मी अपने आप सर्वदा विद्यमान रहती है।
परिवार
अत्यन्त लोभी का अर्थ और अधिक आसक्ति रखने वालों का काम ये दोनों ही धर्म को हानि पहुँचाते हैं, जो मनुष्य काम से धर्म और अर्थ को, अर्थ से धर्म और काम को तथा धर्म से अर्थ और काम को हानि न पहुँचा कर धर्म, अर्थ और काम तीनों का यथोचित रूप से सेवन करता है, वह अत्यन्त सुख प्राप्त करता है।
धर्म
जिस व्यक्ति में अभय, मृदुता, सत्य, सरलता, करुणा, धैर्य, अनासक्ति, स्वावलम्बन, स्वशासन, सहिष्णुता, कर्तव्यनिष्ठा, व्यक्तिगत संग्रह का संयम और प्रामाणिकता होती है, वह नीतिमान कहलाता है।
चरित्र
एक ओर एक व्यक्ति हो और दूसरी ओर एक समूह हो तो समूह को छोड़कर एक व्यक्ति का ग्रहण करने की इच्छा न करें परन्तु जो एक मनुष्य बहुत मनुष्यों की अपेक्षा गुणों में श्रेष्ठ है और इन दोनों में से एक को ही ग्रहण करना पड़े तो ऐसी स्थिति में कल्याण चाहने वाले पुरुष को उस एक के लिए समूह को त्याग देना चाहिए।
विवेक
सैकड़ों दलीलें एक तरफ और एक तरफ सुभाषित जो प्रतिद्वन्दी को निरुत्तर कर देता है, उसके जवाब में सामने वाले की जुबान नहीं खुलती, उसका पक्ष कितना भी प्रबल हो पर सुभाषितों में कुछ ऐसा जादू होता है कि मानो वह एक फूँक से दलीलों को उड़ा देता है।
वाणी
जब मनुष्य पदासीन होता है तब बहुत से अपरिचित उसके सहायक तथा सभी उसके अधीन हो जाते हैं, पदच्युत एवं धन रहित होने पर स्वजन भी शत्रु हो जाते हैं, अतः पाप से डरना चाहिए।
कर्म
सीमित खर्च को बुद्धिमत्ता की पुत्री, संयम की बहन और स्वतंत्रता की माता कहा जा सकता है। खर्चीला व्यक्ति शीघ्र ही निर्धन हो जाता है और निर्धनता परावलम्बन के लिए बाध्य करती है तथा भ्रष्टाचार को निमंत्रित करती है अतः जो भी आपके पास है उससे कम व्यय करो।
संतोष
जिस आपदा में अच्छी क्रिया से किसी प्रकार आत्मा की रक्षा न हो सके उसमें निषिद्ध कर्म भी करना चाहिए क्योंकि जब सड़क पर वर्षा से कीचड़ हो जाती है तब पंडित लोग भी कभी-कभी कुमार्ग से जाते हैं, उनका कुमार्ग में जाने का लक्ष्य नहीं होता बल्कि सड़क के कीचड़ से बचने का लक्ष्य होता है।
विवेक
स्त्रियों के अंगों के समान जब अपने गुण छिपाये जाते हैं, तो वे स्पृहणीय तथा दुर्लभ हो जाते हैं। बड़े गुणों और सत्कर्मों के करने वाले लोग संसार में सर्वदा सुलभ हुआ करते हैं किन्तु उनके ज्ञाता दुर्लभ हैं।
विनम्रता
मनुष्यों को गुणों की प्राप्ति में प्रयत्नशील होना चाहिए क्योंकि गुणी व्यक्तियों के लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है, गुणों की अधिकता से ही चन्द्रमा शिव जी के मस्तक पर विराजमान है, जहाँ दूसरे लोग पहुँच भी नहीं सकते हैं।
चरित्र
लक्ष्य भ्रष्ट जीवन केवल दयनीय ही नहीं होता, वह समाज के लिए हानिकारक भी होता है। जो मन को नहीं मार सकता है, जिसे झुकना और छोटा बनना नहीं आता है, जिसे दूसरों की सुविधा और दूसरों को निभाने की दृष्टि से झुकना और राह छोड़ना नहीं आता है वह जिन्दगी में कभी कुछ नहीं कमा पाता है उसे जिन्दगी में संतोष भी नहीं मिलता है।
विनम्रता
जहाँ-कहीं भी जो कुछ खाकर, जैसा-तैसा वस्त्र पहन कर जहाँ-कहीं भी रहकर जो आत्म संतुष्ट रहता है, निर्जन स्थान में रहता है और दूसरों के संसर्ग को त्यागता है अर्थात् हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहने वाला सुखी होता है।
संतोष
सफल और असफल होने वालों के बीच कोई अंतर नहीं होता, केवल यह अंतर होता है कि एक केवल शारीरिक परिश्रम करता है और दूसरा कार्य को बुद्धि और ध्यान को एकाग्र करके करता है।
पुरुषार्थ
जहाँ गुरु निन्दा चल रही हो वहाँ कान ढक लेना चाहिए या अन्यत्र चले जाना चाहिए क्योंकि जो दूसरों के द्वारा की गई गुरु अथवा स्वामी की निन्दा को सुनता है तथा सुनकर कुपित नहीं होता वह पुरुष कृतघ्न कहलाता है।
भक्ति
यहाँ पर प्रायः नीच कुल में उत्पन्न हुए लोग कुलीन की, सौभाग्य हीन स्त्री पति की, कंजूस दानी की, अपवित्र पवित्रों की, निर्धन धनवानों की, कुरूप सुन्दर शरीर वालों की, पापी धर्मात्मा की, मूर्ख शास्त्रों के ज्ञाता-विद्वानों की और मिथ्यादृष्टि संतों की निन्दा करते हैं। गुरु का उपहास करने से व्यक्ति मरने पर गधा, निन्दा करने से कुत्ता उनकी सम्पत्ति का भोग करने से कृमि और ईर्ष्या करने से कीड़ा होता है।
वाणी
लोगों की विचित्रता देखो–परमात्मा की पूजा के लिए बहाने बनाते हैं कि समय नहीं है और कुर्सी के राग में कम्बल पैसों को बाँटने घर-घर घूमते हैं, लौकिक पद की लोलुपता में पैसा बाँट कर समय बर्बाद कर रहे हैं और परम पद के लिए समय नहीं है।
भक्ति
सिंह के साथ वन में रहना, हाथ में बिच्छू को लेना, कान में कनखजूरे को डालना, साँप के मुख में अँगुली डालना, विष पीना अच्छा है किन्तु धर्म व धर्मात्मा की निन्दा करना व दुष्ट के संग रहना अच्छा नहीं है, कारण कि इनकी संगति से एक ही भव बिगड़ता है किन्तु सन्त निन्दा से तो अनन्तों जन्म बिगड़ जाते हैं।
वाणी