Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 10 / 41

साथ में यात्रा करने वाला साथी ही प्रवासी के मित्र हैं, पत्नी गृह-वासी का मित्र है, वैद्य रोगी का मित्र है और दान मरते हुए मनुष्य का मित्र है।
संगति
सन्तों ने कहा है कि अच्छे मित्र का यही लक्षण है कि वह पाप से रोकता है, हितकारी कार्यों में लगाता है, उसकी गुप्त बात अन्य से छिपाता है, उसके गुणों को प्रकट करता है, विपत्ति काल में उसका साथ नहीं छोड़ता और समय आने पर धन देता है। उसी प्रकार मित्र को प्रिय व्यवहार करना चाहिए, जिस प्रकार हाथ शरीर का हित करते हैं, पलकें आँखों को प्रिय लगे वैसा करती हैं।
संगति
वे ही वंदनीय हैं, वे ही पुण्यात्मा हैं और उन्हीं का इस संसार में जन्म लेना प्रशंसनीय है जो अपना काम छोड़कर अपने मित्रों का कार्य सिद्ध करते हैं।
संगति
विवाद करना, लेन-देन करना, माँगना, मित्र के घर की स्त्रियों से मिलना-जुलना, हर काम में स्वयं आगे रहना; इन सबसे मित्रता टूट जाती है।
संगति
किसी के साथ अत्यन्त प्रेम न करो और प्रेम का सर्वथा अभाव भी न होने दो क्योंकि ये दोनों ही महान् दोष हैं, अतः मध्यम स्थिति पर ही दृष्टि करो।
संगति
तुम जिन कठिनाइयों में फँसे हुए हो, उनको जो लोग दूर कर सकते हैं और आने वाली बुराइयों से जो लोग तुम्हें बचा सकते हैं, तुम उत्साहपूर्वक उनके साथ मित्रता करने की चेष्टा करो। जिस आदमी को ऐसे लोगों की मित्रता का गौरव प्राप्त है जो उसे डाँट फटकार सकते हैं तो उसे हानि पहुँचाने वाला कौन है?
संगति
उस आदमी का हाथ देखो जिसके कपड़े हवा में उड़ गये हैं, कितनी तेजी के साथ फिर से अपने अंग को ढकने के लिए फुर्ती करता है? यही सच्चे मित्र का आदर्श है, जो विपत्ति में पड़े हुए मित्र की सहायता के लिए दौड़कर आता है।
संगति
जिस मनुष्य को तुम अपना मित्र बनाना चाहते हो, उसके कुल का उसके गुण-दोषों का, कौन-कौन लोग उसके साथी हैं और किन-किनके साथ उसका सम्बन्ध है, इन बातों का अच्छी तरह से विचार कर लो और इसके पश्चात् यदि वह योग्य है तो मित्र बना लो।
संगति
यह तो सुनिश्चित है कि बोलने के काल में बोलने वाला स्वलक्ष्य का श्रद्धानी चाहे बना रहे, परन्तु स्वलक्ष्योपयोगी नहीं रहता अतः अधिक मौन रहो, मौन मुमुक्षु का सर्वोपरि कार्य है।
ध्यान
मौन के फल से इस जन्म में सुखी परभव में नर मोक्ष पाता है नारी पुरुषत्व पाती है। यदि वृद्धों को सुखपूर्वक जीना है अथवा शान्तिपूर्वक मरना है तो मौन रहना चाहिए। मौन और एकान्त आत्मा के सर्वोत्तम मित्र हैं।
वाणी
वे मूर्ख हैं जो शठता से धर्म उपार्जन, कपट से मित्र प्राप्ति, दूसरों को पीड़ा पहुँचाकर स्थायी धन संग्रह, आलसी बने रहकर विद्या तथा क्रूर व्यवहार से जो स्त्री को वश में करना चाहते हैं।
ज्ञान
मूर्ख व्यक्ति परस्पर बातचीत करने वाले दूसरे लोगों की भली बुरी बातें सुनकर उनसे बुरी बातों को ही ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही जैसे सुअर अन्य अच्छी खाद्य वस्तुओं को छोड़कर विष्ठा को ही अपना भोजन बनाता है।
संगति
विद्वत्ता, विद्या और विद्वान् की कद्र विद्वान् ही करते हैं, मूर्खों के बीच विद्वान् की दशा वैसी ही होती है जैसे अंधों के बीच किसी सुन्दरी की और नास्तिकों के बीच में धर्म ग्रन्थ की होती है।
ज्ञान
मूर्खों की संगति में रहने वाला मनुष्य चिरकाल तक शोक निमग्न रहता है, मूर्खों की संगति शत्रुओं की तरह सदा ही दुःखदायक होती है और धीर पुरुषों का सहवास अपने बंधु-बांधवों के समागम के समान सुखदाई होता है।
संगति
अनपढ़ व्यक्ति चाहे जितना बुद्धिमान हो, विज्ञजन उसकी सलाह को कोई महत्त्व नहीं देते हैं। अज्ञानी आदमी स्वयं अपने सिर पर जैसी आपत्तियाँ लाता है, वैसी आपत्ति शत्रु भी नहीं पहुँचा सकते हैं।
ज्ञान
मक्खियाँ घाव चाहती हैं, राजा धन चाहता है, नीच कलह चाहते हैं, पत्नि प्रेम चाहती है, पति काम चाहता है, माता-पिता सेवा चाहते हैं, स्त्रियाँ प्रशंसा चाहती हैं, संतान स्नेह चाहती है, मित्र प्रेम चाहते हैं, श्रावक सम्पत्ति चाहते हैं और साधु शान्ति चाहते हैं।
Misc.
प्रत्येक मनुष्य प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर अग्रसर होता है जैसे राग के बाद विराग, लोभ के बाद शौच, संग्रह के बाद त्याग, काम के बाद निष्काम, श्रम के बाद विश्राम, भोग के बाद योग।
अनासक्ति
जरा (बुढ़ापा) रूप को, आशा धैर्य को, मृत्यु प्राण को, क्रोध कान्ति (श्री) को, काम लज्जा को नष्ट कर देता है किन्तु अभिमान अकेला ही सब गुणों को एक साथ नष्ट कर देता है।
विनम्रता
जो आमदनी से अधिक खर्च करता है, शक्ति रहित होकर कलह करता है, रोगी होकर सब कुछ खाता है, पुत्र रहित होकर धन संग्रह करता है, खोटी संगति करता है वह मनुष्य शीघ्र नष्ट होता है।
धन
स्त्री विषयक आसक्ति, जुआ, शिकार, मद्यपान, वचन की कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धन का दुरुपयोग करना; ये सात दुःखदायी कार्य लोगों को सदा के लिए त्याग देने चाहिए क्योंकि इनसे प्रतापी राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं।
संयम
जो किसी दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रु के साथ बुद्धिपूर्वक व्यवहार करता है, बलवानों के साथ युद्ध पसन्द नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है वही वीर है।
चरित्र
जो क्रोध या उतावली के साथ धर्म, अर्थ तथा काम का आरंभ नहीं करता, पूछने पर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रों के साथ झगड़ा नहीं करता, आदर न पाने पर क्रुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खोता, दूसरों के दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, बढ़ चढ़कर नहीं बोलता, विवाद नहीं करता तथा दुःखों को समता से सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है।
चरित्र
जो मनुष्य शत्रु से मिले हुए मित्र को, कुल्टा स्त्री को, कुल को ध्वस्त करने वाले पुत्र को, मूर्ख मंत्री को, उतावली करने वाले राजा को, प्रमादी वैद्य को, रागी देव को, विषयी गुरु को और दया रहित धर्म को मोह वश नहीं छोड़ता वह कल्याण के द्वारा छोड़ दिया जाता है अर्थात् उसका कल्याण नहीं होता है।
विवेक
प्रेम से बढ़कर दूसरा बन्धन नहीं, विषय से बढ़कर दूसरा विष नहीं, क्रोध से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं, विवेक से बढ़कर दूसरा मित्र नहीं, जन्म से बढ़कर दूसरा दुःख नहीं, सन्तोष से बढ़कर सुख नहीं, लोभ से बढ़कर पाप नहीं, सेवा से बढ़कर पुण्य नहीं और दया-अहिंसा से बढ़कर धर्म नहीं है।
अहिंसा
लोभी मनुष्य को धन से, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उसके इच्छानुकूल कार्य से, पंडित को भोजन से या यथार्थता से, शूद्र को शक्ति से, क्षत्रिय को सम्मान से, बच्चों को प्रेम-स्नेह से, स्त्री को उसकी प्रशंसा करके वश में करना चाहिए।
विवेक
मीठे वचन से-मित्रता, विनय से-पात्रता, दान से-यश, अभ्यास से-विद्या, उदारता से-प्रभुता, सदाचार से विश्वास, शृंगार से-अनुराग, उद्यम से-लक्ष्मी, न्याय से-राज्य, क्षमा से-तप और लोभ से पाप बढ़ता है।
चरित्र
बहुत खाने वाले, सब लोगों से वैर रखने वाले, अधिक मायावी, क्रूर, देश काल का ज्ञान न रखने वाले और निन्दित वेष धारण करने वाले मनुष्य को कभी अपने घर में न ठहरने दें।
संगति
क्रोधाग्नि, कामाग्नि, जठराग्नि और दावाग्नि को जीतने वाला ही आनंद को प्राप्त करता है। सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता के भाव, गुणों में दोष न देखना, क्षमा, धैर्य और मित्रों का अपमान न करना तथा संयमपूर्वक रहना ये सब गुण आयु को बढ़ाने वाले हैं।
संयम
ईर्ष्या अपनी हीनता के बोध से जन्म लेती है और वह उस हीनता को दूर नहीं करती, सिर्फ दबाती है। ईर्ष्या रखने वाले मनुष्य को इतना दुःख अपनी असफलता पर नहीं होता जितना दुःख दूसरे की सफलता देखकर होता है।
क्षमा
बड़ों के कहने का नहीं, व्यवहार का असर पड़ता है। माँ की शिक्षाओं का नहीं, दुलार का असर पड़ता है ॥ तुमने तो चाबी उल्टी पकड़ ली है, ताला कैसे खुले। आदमी पर फटकार का नहीं, प्यार का असर पड़ता है ॥
परिवार