Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 43

पुरुष हो, पुरुषार्थ करो

162 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

गहरी नींद सुखजनक एवं अनिद्रा आलस्य व अशक्ति की सूचक होती है।
स्वास्थ्य
अव्यवस्थित दिनचर्या सदैव हानिकारक होती है, इससे आप पराधीन हो जाते हैं और आपके गुणों को अवगुणों की चादर ढँक लेती है, फिर शुरू होता है समस्याओं का अंतहीन सिलसिला। अपनी आवश्यकताएँ कम करके आप वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं।
संयम
एक क्षण भी स्वाध्याय, सत्समागम और ध्यान छोड़ना आपत्ति में पड़ना है अतः उन सब उपायों से अपने आपके आचरण को शुद्ध रखो।
ध्यान
ब्रह्मचर्य, विद्याभ्यास और विनय विद्यार्थी की उन्नति का मूल है, यही सच्चा जीवन बनाने की त्रिपुटी है।
ब्रह्मचर्य
सत्संग व निरन्तर ज्ञानोपयोग के बिना कल्याण पथ पर अविचल चलना अत्यन्त दुष्कर है।
संगति
घड़ी घंटा की टक्कर मनुष्यों के आगे यही कहती है कि हितकारी धर्म का संचय कर लो क्योंकि गयी हुई घड़ी वापस नहीं आती है।
समय
घड़ी, घड़ी-घड़ी सचेत करती है कि समय को सार्थक करो।
समय
अपनी स्त्री, भोजन और धन इन्हीं तीनों में संतोष करना चाहिए, विद्या पढ़ना, जाप करना-कराना और दान देने में संतोष नहीं करना चाहिए।
संतोष
हिरणों के भय से क्या खेती नहीं की जाती? अजीर्ण के भय से क्या भोजन छोड़ दिया जाता है? खटमलों के भय से क्या बिस्तर छोड़ दिये जाते हैं? अर्थात् नहीं, तो उसी प्रकार विघ्नों के भय से सज्जन पुरुष संयम (कर्त्तव्य) पथ को नहीं छोड़ते हैं।
पुरुषार्थ
भविष्य की कल्पना छोड़ो, अतीत की चिंता छोड़ो, वर्तमान में जीना सीखो।
समय
हर साल एक बुरी आदत को जड़ से खोदकर फेंका जाए तो कुछ ही साल में एक बुरे से बुरा आदमी भी भला इंसान बन सकता है।
चरित्र
आदमी पहले नेक और ईमानदार बने फिर बाद में धर्मात्मा कहलाने का हकदार बने।
चरित्र
संत आदेश-उपदेश नहीं सिर्फ सन्देश देते हैं, आदेश अहंकारी देता है, उपदेश अरहंत देते हैं और सन्देश संत देते हैं।
विनम्रता
वर्तमान समय में घरों में और समाज में जो अशान्ति, कलह, संघर्ष, देखने में आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं।
परिवार
पुत्र के प्रति पिता का कर्त्तव्य यही है कि उसे सभा में प्रथम पंक्ति में बैठने योग्य बना दें।
परिवार
शीघ्र करने योग्य कार्य को विलंब से किए जाने पर उसका महत्त्व (फल) नष्ट हो जाता है।
पुरुषार्थ
काम करने से जीवन को शक्ति मिलती है और संयम से जीवन को सुन्दरता प्राप्त होती है।
पुरुषार्थ
काम करने से पूर्व सोचना बुद्धिमत्ता है, काम करते समय सोचना सतर्कता है, काम कर चुकने के बाद सोचना मूर्खता है।
विवेक
साठ साल के व्यक्ति को और आठ साल के बच्चे को घर छोड़ देना चाहिए, बच्चे को शिक्षा के लिए और व्यक्ति को दीक्षा के लिए।
धर्म
करना चाहते हो तो सेवा करो, जानना चाहते हो तो अपने आप को जानो और मानना चाहते हो तो प्रभु को मानो तीनों का परिणाम एक ही होगा।
भक्ति
शरीर को श्रमी, मन को संयमी, बुद्धि को विवेकशील, हृदय को अनुरागी (प्रेमी) और अपने आपको अहंकार शून्य बनाकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति बनो।
चरित्र
पुरुषार्थ हीन भाग्य अथवा भाग्यहीन पुरुषार्थ इन दो ही कारणों से मनुष्य का उद्योग निष्फल होता है। अतः पुण्य कमाओ साथ में पुरुषार्थ करो।
पुरुषार्थ
जो पुरुषार्थ को छोड़कर भाग्य भरोसे बैठते हैं वे अपने ही शत्रु हैं और धर्म अर्थ काम व मोक्ष का नाश करते हैं।
पुरुषार्थ
जो श्रेष्ठ बनने का पुरुषार्थ करता है वह स्वमेव ज्येष्ठ बन जाता है।
पुरुषार्थ
भाग्य पर नहीं पुरुषार्थ और चारित्र पर निर्भर रहो।
पुरुषार्थ
कार्य की सिद्धि समय पर किए गये सम्यक् पुरुषार्थ से होती है।
पुरुषार्थ
वही जीवित है जिसका मस्तिष्क ठंडा, रक्त गरम, हृदय कोमल और पुरुषार्थ प्रखर है।
चरित्र
हमें किसी खास समय का इन्तजार नहीं करना चाहिए बल्कि हर समय को खास बनाने की पूरी कोशिश करना चाहिए।
समय
भोजन मिलता भाग्य से है पर पेट भरता पुरुषार्थ से ही है।
पुरुषार्थ
भगवान् की पूजा ही न करें अपितु भगवान् बनने का पुरुषार्थ भी करें।
पुरुषार्थ
त्याग वेष की ओर तुम्हारा प्रयास शान्ति के लिए था। इस समय कहाँ हो? विचार करो और सर्व पुरुषार्थ से अपने उद्देश्य पर पहुँचो।
पुरुषार्थ
जिसमें आत्मा का हित हो वह पुरुषार्थ है, लौकिक कार्यों का प्रयोग यथार्थ पुरुषार्थ नहीं है। ''सदाचार से आगे बढ़ना पुरुषार्थ है।''
पुरुषार्थ
पुरुषार्थ बिना कोई जीव एक क्षण नहीं रहता, चाहे सीधा पुरुषार्थ करे या उल्टा क्योंकि पुरुषार्थ यानि वीर्य गुण है गुण का अभाव होने पर गुणी का अभाव हो जाता है।
पुरुषार्थ
पुरुषार्थ कर्माधीन नहीं क्योंकि वह आत्मा का गुण है, कर्म के उदय में वह गुण विकृत रूप परिणमता है और कर्म के अभाव में स्वभाव के अनुकूल परिणमन करता है।
पुरुषार्थ
लोग कहते हैं कि कुछ न करना प्रमाद है, कार्य करते रहना पुरुषार्थ है, तत्व कहता है कार्य करना प्रमाद है त्रियोग से कुछ न करना पुरुषार्थ है।
ध्यान
पुरुषार्थ हीन भाग्य भरोसे चलने वाले व्यक्ति का विनाश अवश्यंभावी है।
पुरुषार्थ
पुरुषार्थ की युक्ति से मिलती बंधनों से मुक्ति।
पुरुषार्थ
भाग्य भी मनुष्य के पुरुषार्थ से बदलता है, अतः पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।
पुरुषार्थ
कामयाबी के दरवाजे उन्हीं के लिए खुलते हैं जो सम्यक् पुरुषार्थ करते हैं।
समृद्धि
जो बेवक्त पर काम करते हैं वह नियम से असफल होते हैं।
समय
व्यर्थ में समय बर्बाद मत करो यदि किसी प्रश्न का उत्तर एक शब्द में होता है तो एक शब्द बोलकर बात खत्म कर दो।
वाणी
पर के दोष कहने में मौन हो जाना चाहिए।
वाणी
बुद्धिमान को ऋण, घाव, अग्नि और शत्रु की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि ये समय पाकर असाध्य हो जाते हैं।
विवेक
सम्यग्दृष्टि के पास समता का कवच होता है।
धर्म
जैसे कामधेनु, कल्पवृक्ष, चिन्तामणि रत्न, रसायन और पारसमणि को पाने वाला मनुष्य यथेच्छ सुख भोगता है उसी प्रकार सम्यक्त्व को पाने वाला जानो।
धर्म
कान से जल्दी आँख ग्रहण करती है और कान की बात तो भूल सकते हैं परन्तु आँखों की देखी बात भूलते नहीं है इसलिए अच्छे निमित्तों का देखना और बुरे निमित्तों को नहीं देखना महत्वपूर्ण है।
विवेक
मुमुक्षु विषयों की अभिलाषा को दावानल से भी अधिक कष्टप्रद मानता है।
अनासक्ति
यदि आप में किसी को प्रभावित करने की क्षमता नहीं है तो अप्रभावित भी नहीं करना चाहिए।
चरित्र
जिसने अपमान से जीना नहीं सीखा, वो सम्मान को कभी पचा नहीं पायेगा और वह जगत् सम्मानी भी नहीं बन पायेगा।
विनम्रता
यदि ज्ञानवान चारित्रवान का और चारित्रवान ज्ञानवान का अपमान करें तो दोनों को ही सम्यक्त्व रहित समझना चाहिए।
विनम्रता
'विकल्प' बहुत हैं बिखरने के लिए 'संकल्प' एक ही काफी है सँवरने के लिए।
मन
जो लोग पुरुषार्थ का महत्व स्वीकार नहीं करते हैं, उन्हें सांसारिक कार्यों में भी पुरुषार्थ छोड़ देना चाहिए, यदि नहीं छोड़ते हैं, तब उन्हें मोक्षमार्ग में भी पुरुषार्थ करना चाहिए अन्यथा लोमड़ी जैसे खट्टे अंगूर हैं।
पुरुषार्थ
जो लोग भवितव्य पर विश्वास कर पुरुषार्थ करना छोड़ देते हैं, उन्हें भवितव्य पर विश्वास नहीं हैं क्योंकि भवितव्य में भाग्य और पुरुषार्थ दोनों गर्भित हैं, दोनों का विश्वासी ही भवितव्यता का विश्वासी माना जाता है।
पुरुषार्थ
जहाँ पूज्यजनों का निरादर हो और अपूज्यजनों का आदर हो वहाँ दुर्भिक्ष, मरण और भय ये तीनों उपद्रव होते हैं।
चरित्र
मानवीय गुणों और अवगुणों की ठीक-ठीक जाँच सदा उसके सत्कार्य से ही नहीं होती है, अपितु एक छोटा-सा कार्य, एक छोटी-सी बात, या एक छोटे-से परिहास से भी मानव के असली चरित्र पर काफी प्रकाश पड़ता है।
चरित्र
जीवन सभी जीते हैं किन्तु जीने के दौरान होने वाले अनुभवों का इत्र बहुत अल्प लोग ही निकाल पाते हैं।
ज्ञान
यदि कोई वस्तु प्राप्त करनी है तो अपने को उसके योग्य बनाना चाहिए।
पुरुषार्थ
जो अपने वर्तमान को सार्थक करता है, उसका भविष्य भी सार्थक होता है।
समय
राम के योग्य काम किए बिना राम नाम लेना पूर्ण सार्थक नहीं है।
भक्ति
जो देता है वह छीन भी सकता है इसलिए प्रतिपल सावधान रहें।
विवेक