Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Self-control

संयम

447 सूत्र · पृष्ठ 4 / 6

भोजन की अपेक्षा कषाय और वासना का उपवास कठिन है।
संयम
कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच में शान्त रहें तो समाधान मिल जायेगा।
संयम
जो विकारी होते हैं वे भिखारी होते हैं और जो निर्विकारी होते हैं वे भिक्षु होते हैं।
संयम
पर के निर्णय पर चलना पराधीनता है।
संयम
व्रतों में प्रशम गुण प्रधान है।
संयम
जो निज को वश में कर लेता है वो परवश नहीं होता है।
संयम
जो अपने को वश में कर लेता है दुनिया उसके वश में हो जाती है।
संयम
आपके सामने चींटी भी पानी में गिर जाये तो आप अँजुली बनाकर निकालते हैं, फिर आप अपने को वासना के गड्ढे में क्यों गिराते हैं, आपकी दया कहाँ सो गयी है?
संयम
विशुद्ध परिणामी नियम से संयम धारण करता है।
संयम
दूसरों की बातें सुनकर अपनी विशुद्धि को मत खोओ।
संयम
दूसरों को जानना बुद्धिमानी है स्वयं को जानना सच्ची बुद्धिमानी है। दूसरों पर राज करना ताकत है, स्वयं पर राज करना सच्ची ताकत हैं।
संयम
जो संसार पर राज्य करता है वह संसार में भटकता है और जो स्वयं पर राज्य करता है वह सिद्धालय में बसता है।
संयम
धैर्य ही सब प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है।
संयम
अधिक हँसना मूर्खता है।
संयम
योग, उपयोग, संयोग तीनों निर्मल होना चाहिए।
संयम
जनसंपर्क साधु का शत्रु है।
संयम
पराधीनता दुःख का स्वाधीनता सुख का कारण है।
संयम
परीषह, कषायादि के जीतने में इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने में मनुष्य की शूरवीरता है परन्तु कर्म सन्तति को बढ़ाने वाले काम के युद्ध में कोई शूरवीरता नहीं है।
संयम
संयम के साथ एक क्षण जीना श्रेष्ठ है, अमृत तुल्य है, परन्तु असंयम के साथ कोटि वर्ष भी जीना अच्छा नहीं है। संयमी निजभावों की प्रतिक्षण तौल करें।
संयम
अनुशासन मात्र अपने जीवन को नहीं अपितु परिवार, समाज, देश व सम्पूर्ण विश्व को उज्ज्वल करता है।
संयम
अनुशासन के बिना न तो परिवार चल सकता है, न संस्था, न राष्ट्र, वास्तव में अनुशासन ही संगठन की कुंजी है और प्रगति की सीढ़ी है।
संयम
दूसरों से झगड़ा करने की आदत एवं उद्दण्डपने की भावना को दूर करदो तो तुम्हें सर्वोत्तम आनन्द और प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।
संयम
आत्म शान्ति के लिए परिचय, उपकार, कषाय व विषयाभिलाषा छोड़ना होगी।
संयम
मनुष्य जब एक नियम तोड़ता है तो दूसरे नियम अपने आप टूट जाते हैं।
संयम
संसार में सबसे बड़े अधिकार सेवा और त्याग से मिलते हैं।
संयम
भले ही सब इन्द्रियों को वश में कर लिया हो परन्तु जब तक रसना को अपने वश में नहीं किया तब तक मनुष्य जितेन्द्रिय नहीं हो सकता, एक जिह्वा को जीत लिया तो सभी को जीत लिया।
संयम
जहाँ तप है वहाँ नियम से संयम है और जहाँ संयम है वहाँ नियम से तप है।
संयम
धैर्य धारण करना, क्षमा धारण करना, ध्यान करने में सदा तत्पर रहना और परीषह आने पर मार्ग से च्युत नहीं होना ये व्रतों की भावनाएँ हैं।
संयम
जिस उत्साह से संयम लिया था, उस उत्साह से पालन नहीं किया, अतः समाधि में कठिनाई आ रही है या समाधि बिगड़ रही है।
संयम
साधक एकान्त में बनता भी है और चार संज्ञाओं से बिगड़ता भी है।
संयम
जो पुरुष समझबूझ कर अपनी इच्छाओं का दमन करता है उसे सभी सुखद वरदान प्राप्त होते हैं।
संयम
इन्द्रिय संयम सब व्रतों का मूल है, जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं उसका बाह्य व्रत सब निष्फल है तथा वह शान्ति भी नहीं पा सकता है।
संयम
अकेलेपन में जो लाभ है वह अनुभव से ही सिद्ध हो सकता है।
संयम
जो इन्द्रियों को वश नहीं करता वह अतीन्द्रिय नहीं बन पाता है।
संयम
जिह्वा को जीते बिना, कामादिक का जीतना असंभव है एवं दीक्षा लेना व्यर्थ है।
संयम
एकान्त में जीवन बनता भी बिगड़ता भी, सबके बीच रहते हुए भी एकान्त में रहना साधना है।
संयम
अनुकूलता-प्रतिकूलता विचलित करने नहीं अपितु अचल बनाने आती है।
संयम
निर्ग्रन्थ योगी को एकान्त स्थान अच्छा लगता है क्योंकि एकान्त में साधना अच्छी होती है।
संयम
साधक को हर समय सावधान रहना चाहिए, सावधान रहने का तात्पर्य किसी से कभी कुछ मत चाहना एवं बुरे कर्मों से बचना है।
संयम
जितना परिचय बढ़ेगा उतना विकल्प बढ़ेगा।
संयम
अपने जीवन को अपने में व्यस्त रखना सीख गये तो साधु बन गये।
संयम
साधु जीवन में जितना पुरुषार्थ अपरिचित रहकर साधना में नहीं करना पड़ता, उतना परिचित को छोड़ने में करना पड़ता है।
संयम
साधना का लक्ष्य है वासनाओं का नाश करना और सद्वृत्तियों का विकास करना/वासनाओं के नष्ट होते ही दिव्य भावों से हृदय परिपूर्ण हो जायेगा, हृदय में दिव्य भावों के प्रवेश करते ही समस्त दुर्बलताएँ भाग जायेंगी।
संयम
आँख सुधरने से मन सुधरता है और जीभ सुधरने से जीवन सुधरता है।
संयम
समता का कवच पहन लेने पर कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता जैसे रुई तलवार से भी नहीं कटती है।
संयम
जिसकी भाषा में संयम नहीं उसके भावों में संयम नहीं होता है।
संयम
स्वाध्याय अभ्यासी साधु पञ्चेन्द्रिय विजेता, संकल्प-विकल्प का त्यागी, त्रिगुप्ति युक्त, क्षण भर में अनन्त कर्मों का नाश करने वाला होता है, साधु जीवन में अन्य-अन्य कर्तव्यों के साथ स्वाध्याय का विशेष महत्त्व है।
संयम
सम्पत्ति होने पर नियम पालना, शक्ति होने पर भी क्षमा करना, युवावस्था में व्रत लेना और दरिद्र होने पर भी थोड़ा दान करना भी महालाभ के लिए होता है।
संयम
रण में विजय प्राप्त करने से नहीं इन्द्रियों के जीतने से योद्धा कहलाता है, अध्ययन से नहीं आचरण से पण्डित कहलाता है, बोलने से नहीं हित में लगाने से वक्ता कहलाता है, दान देने से नहीं सम्मानपूर्वक देने से दाता कहलाता है।
संयम
बुद्धिमान संयम के लिए श्रुत, धर्म के लिए संयम, मोक्ष के लिए धर्म, दान और भोग के लिए धन ग्रहण करते हैं।
संयम
पञ्चेंद्रिय के विषय शत्रु हैं तथा जो धर्म, दान, हितकारी तप एवं दीक्षा आदि के ग्रहण करने का निषेध करता है वह व्यक्ति भी शत्रु है।
संयम
जेल में, पिजड़े में तथा नरक में पराधीन होकर जो वेदना सही है, उसके सामने मुनि अवस्था के कष्ट कुछ भी नहीं हैं।
संयम
शान्त बनना सन्त बनने से भी कठिन है, शान्त मनुष्य वह हो सकता है, जो अपनी प्रशंसा नहीं चाहता है।
संयम
जैसे कीचड़ से सनी झाड़ू से घर साफ़ नहीं होता है, उसी प्रकार कषायों से सनी आत्मा को सुख नहीं मिलता है।
संयम
जो व्यक्ति गुस्से के समय गूंगा, निन्दा सुनने के समय बहरा, बुरे दृश्यों को देखने के समय अन्धा बन जाता है वह मुसीबतों से बच जाता है।
संयम
आँख, कान, नाक, हाथ, पैर दो दो हैं किन्तु इन सबका कार्य एक एक हैं और रसना एक है पर काम दो है खाना और बोलना अतः रसना इन्द्रिय में खाने और बोलने दोनों का संयम अत्यावश्यक है।
संयम
संयम लेकर निदान करना अर्थात् शिला पर सुख से बैठने के लिये कन्धे पर बड़ी शिला धारण कर ले जाना है।
संयम
काम-क्रोध-मद-लोभ की जो लों मन में खान। तो लों पण्डित मूर्खों भव्यो एक सामान।।
संयम
उद्योग, कलह, खुजली, जुआ, मद्यपान, परस्त्री, आहार, मैथुन और निद्रा, इनका जैसे-जैसे सेवन किया जाता है वैसे-वैसे ये बढ़ते जाते हैं।
संयम
मनोरञ्जन का उपयोग नमक की तरह थोडा करें मनोरञ्जन को भोजन न बनायें।
संयम
कषाय का कण मात्र भी यदि जीवित है तो आत्मा के अनन्त तेज 'जो कि स्वाधीन है' उसको नष्ट कर देता है।
संयम
जिद खराब होती है- सीता ने सोने का मृग पाने की जिद की, जिससे राम का वियोग एवं भयङ्कर युद्ध हुआ। रावण ने सीता को पाने का जिद की तो प्राणों की आहूति कर दी, पर सीता को वापस नहीं कर सका। पवनञ्जय ने अञ्जना को देखने की जिद की जिससे बाइस वर्ष द्वेष रखना पड़ा।
संयम
जिस विष का प्रभाव मन्द हो गया है उस विष की तरह थोड़े भी विकार के कारण को अपनाने से कल्याण नहीं होता है।
संयम
राग-द्वेष के त्याग को साम्यभाव कहते हैं। अतः मैं जीवन में राग और मरण में द्वेष का त्याग करता हूँ, लाभ में राग अलाभ में द्वेष का त्याग, इष्ट संयोग में राग और इष्ट वियोग में द्वेष का त्याग, उपकारक मित्र में राग और अपकारक शत्रु में द्वेष का त्याग, सुख में राग दुःख में द्वेष का त्याग करता हूँ, क्योंकि साम्य भाव समस्त सदाचार का शिरोमणि है।
संयम
राक्षसी आचरण से आध्यात्मिक साधना नहीं होती है, उसके लिये संयम चाहिये।
संयम
स्वयं पर अनुशासन करो, समस्या आने पर समाधान की खोज करो, तनाव वाली स्थिति से दूर रहो।
संयम
जैसे कमरे की सफाई दिन में तीन बार करते हैं, वैसे ही पश्चात्ताप से आत्मा की सफाई भी करना चाहिए।
संयम
दीवाल बनाते हैं तो ऊपर की ओर जाते हैं, तोड़ते हैं तो नीचे की ओर आते है, इसी प्रकार संयम लेते हैं तो ऊपर के गुणस्थान में जाते है, संयम तोड़ते हैं तो नीचे के गुणस्थान में आते हैं।
संयम
भीड़ में गाड़ी के ब्रेक पर पैर और हार्न पर हाथ रखकर धीरे-धीरे गाड़ी निकाल ली जाती है, उसी प्रकार संसार से निकलने के लिये पञ्चेन्द्रियों के विषयों पर ब्रेक और धर्म का हार्न बजाते हुए मञ्जिल प्राप्त करना चाहिए।
संयम
शक्ति होने पर भी कष्ट व कड़वी बातें सहन करें, युवावस्था में व्रत संयम को निभायें।
संयम
बुराई मिटाने के लिए शस्त्र नहीं सङ्कल्प की आवश्यकता है।
संयम
सहनशील व्यक्ति प्रतिकूलताओं में घबराता नहीं है।
संयम
जब छोटा सा शस्त्र महान विध्वंस कर सकता है तो फिर छोटा सा नियम निर्वाण क्यों नहीं कर सकता है?
संयम
'अनुशासन' कानून और व्यवस्था की सफलता का आधार है।
संयम
आकिञ्चन्य और तपस्या से साधु में साधुता आती है।
संयम