आत्मा नदी संयमतोयपूर्णा, सत्यावहाः शील तटाः दयोर्मिः। तत्रावगाहं कुरू पाण्डुपुत्र!, न वारिणा शुद्ध्यति चान्तरात्मा।।
महाभारत के उपरान्त, पाण्डवों ने स्नान करके शुद्ध होने की भावना व्यक्त की, तब श्री कृष्णजी उपदेश देते हैं, कि आत्मा नदी हो, संयम का जल हो, सत्य का प्रवाह हो, ब्रह्मचर्य का तट हों, दया की लहरें हों, ऐसी नदी में हे पाण्डु पुत्रों! अवगाहन करो तो अन्तर आत्मा शुद्ध होगी, जल के स्नान से आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है।
After the Mahabharata the Pandavas wished to purify themselves by bathing; then Sri Krishna taught: let the soul be the river, self-restraint its water, truth its current, celibacy its banks, compassion its waves—O sons of Pandu, bathe in such a river and the inner soul will be purified, for the soul cannot be cleansed by bathing in water.
— आराध्य सूत्र · #51
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