Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 9 / 11

दुनियाँ में दो ही ताकतें हैं, कलम की और तलवार की, अन्त में तलवार कलम से हार जाती है।
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एक पाठशाला खोलना अर्थात् एक जेलखाना एवं एक अस्पताल बन्द करना है।
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नयी चीज सीखने की जिसने आशा छोड़ दी है, वह बूढ़ा है, बुढ़ापा देखता है और सोचता है, जवानी देखती है और करने को तैयार होती है।
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बुद्धिमान विवेक से, साधारण मनुष्य अनुभव से, आज्ञानी आवश्यकता से और पशु स्वभाव से सीखते हैं।
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शिक्षक मोमबत्ती की तरह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाशित करता है।
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चञ्चल मन से आठ घण्टे पढ़ने की अपेक्षा एकाग्र मन से दो घण्टे पढ़ना सार्थक है।
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चन्द्रमा रात में, सूर्य दिन में, पर साधु चैबीस घण्टे ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं।
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विद्या की प्राप्ति पुस्तक के अध्ययन से होती है किन्तु विवेक सत्सङ्गति से आता है।
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ज्ञानी पन्थ नहीं किन्तु पथ देते हैं, ताकि आप उर्ध्वगति कर सको।
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प्रवचन समय पास करने का नहीं, समयसार बनने का उपक्रम है।
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स्व व्यवसाय को भली-भाँति जानें- अल्पज्ञान भयङ्कर शत्रु है, पूर्ण जानकारी के अभाव में किसी भी कार्य में सफलता की प्राप्ति में प्रायः सन्देह रहता है।
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सीखिए भूत की भूलों से- अनेक और बड़ी गलतियाँ किये विना कोई भी व्यक्ति महान नहीं बनता है, पिछली गलतियों से सीखकर भविष्य में अपने कार्य में सही सुधार करना ही बुद्धिमान व्यक्ति का विवेक पूर्ण कदम है।
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जो इतिहास से अनजान हैं उन्हें परिवर्तन अखरता है।
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मनुष्य को विद्या के समान आँख, सत्य के समान तप, राग के समान दुःख, त्याग के समान सुख अन्य कोई नहीं हैं।
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जो विना पूँछे किसी को सलाह नहीं देता है, दूसरों की अच्छी सलाह को मान लेता है, सोच विचार कर कार्य शुरू करता है, हाथ में लिये कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता है, पहले तौलता है बाद में बोलता है 'वही बुद्धिमान है'।
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अज्ञानी को और सब का पता है पर खुद का पता नहीं है।
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दिखने वाले पुद्गल को ओझल कर देखने वाले आत्मा को देखो।
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व्यक्ति का परिचय वस्त्रों से नहीं, गुणों से होता है वैसे ही आत्मा का परिचय कर्म नोकर्म से नहीं, चैतन्य स्वरूप से होता है।
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जो भी पढ़े पूरे मनोयोग से, धीरे-धीरे मनन पूर्वक प्रत्येक शब्द को आत्मसात करते हुये पढ़ें।
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वाञ्छित विषय में गहन रुचि रखें, जो भी पढ़े उसकी मानसिक समीक्षा अवश्य करें।
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क्या आप प्रतिदिन कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते हैं?
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क्या आप मूर्खों से भी शिक्षा ग्रहण कर लेते हैं?
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ऐसा कोई अक्षर नहीं है जो मन्त्र बनने की क्षमता नहीं रखता हो, ऐसी किसी वृक्ष की जड़ नहीं है जो किसी न किसी रोग के काम न आती हो, ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो अयोग्य हो लेकिन इन तीनों का संयोजन करने वाला दुर्लभ होता है।
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वह माता शत्रु है, पिता बैरी है जिसने अपने बालक को नहीं पढ़ाया क्योंकि जैसे हँसों के मध्य बगुला सुशोभित नहीं होता है वैसे ही अशिक्षित पुत्र सभा में सुशोभित नहीं होता है।
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संतान और शिष्य को लाड़ करने से उनमें बहुत दोष उत्पन्न हो जाते हैं और प्रताड़ित करने से उनमें बहुत गुण उत्पन्न होते हैं इसलिए पुत्र और शिष्य को यथासम्भव प्रताड़ित करना चाहिए लाड़ नहीं।
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शिक्षा जीवन निर्वाह की कला सिखाती है, संस्कार जीवन निर्माण की कला सिखाते हैं।
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पेड़, पशु और मनुष्य में अन्तर- पेड़ के पास न तो गति है और न ही दिशा, पशु के पास गति तो है लेकिन दिशा नहीं, पर मनुष्य के पास गति भी है और दिशा भी, अतः मनुष्य सम्पूर्ण है, पशु कभी उसी जीवन में इंसान नहीं बन सकता, पर इंसान कभी भी उसी जीवन में पशु बन सकता है, मनुष्य में प्रभु और पशु दोनों बनने की सम्भावना है, मनुष्य एक सीढ़ी है, एक ही सीढ़ी ऊपर चढ़ने के भी काम आती है और नीचे उतरने के भी काम आती है।
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बुद्धि, लज्जा, हिम्मत, तन्दुरुस्ती का निवास कहाँ- एक यात्री को यात्रा में क्रमशः चार स्त्रियाँ मिलीं, सबसे पहले खूबसूरत स्त्री मिली, यात्री ने पूछा! तुम कौन हो और कहाँ रहती हो? स्त्री ने जबाव दिया मैं बुद्धि हूँ और मनुष्य के दिमाग में रहती हूँ। दूसरी ने कहा मेरा नाम लज्जा है, और मैं मनुष्य की आँखों में रहती हूँ, शालीनता और सद्व्यवहार मेरा स्वभाव है। तीसरी स्त्री ने कहा मेरा नाम हिम्मत है, और मैं मनुष्य के हृदय में रहती हूँ। चौथी स्त्री ने कहा मेरा नाम तन्दुरुस्ती है और मैं मनुष्य के पेट में रहती हूँ। वह व्यक्ति बढ़ा और उसे चार पुरूष मिले, पहले पुरूष ने कहा मेरा नाम क्रोध है और मैं मनुष्य के दिमाग में रहता हूँ। यात्री ने कहा वहाँ बुद्धि रहती है तुम कैसे रह सकते हो? क्रोध ने कहा जब तक मैं नहीं आता हूँ तभी तक बुद्धि रहती है, और मेरे आते ही बुद्धि वहाँ से भाग खड़ी होती है। दूसरे पुरूष ने कहा मेरा नाम लोभ है और मैं पुरूष की आखों में रहता हूँ, यात्री ने कहा वहाँ लज्जा रहती है, लोभ ने कहा कुछ धन सम्पत्ति रखकर देखिये कि लज्जा किस प्रकार लोभी की आँखों से भागती है। तीसरे पुरूष ने कहा मेरा नाम भय है, और मैं लोगों के हृदय में रहता हूँ, यात्री ने कहा वहाँ हिम्मत रहती है तुम कैसे रह सकते हो? भय ने कहा लोग अन्तःकरण की आवाज नहीं सुनते और गलत कार्य करते रहते हैं और भयभीत भी रहते हैं, परिणाम स्वरूप हिम्मत वहाँ से चली जाती है, चौथे पुरूष ने कहा मेरा नाम रोग है और मैं मनुष्य के पेट में रहता हूँ। यात्री ने टोका लेकिन वहाँ तन्दुरुस्ती रहती है, पुरूष ने कहा बिल्कुल गलत, जब तक लोग सात्विक, सुपाच्य आहार की जगह गरिष्ठ भोजन, मांस, मदिरा, तम्बाकू आदि का सेवन करते रहेंगें और नियमित जीवन नहीं जियेंगे तब तक तन्दुरुस्ती वहाँ रह ही नहीं सकती, वहाँ फिर मैं ही रह सकता हूँ, यात्री स्त्री-पुरूषों के रूप में मिले सत्य के प्रकाश में आगे बढ़ गया।
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बालक से सरलता, जवान से जोश, बूढ़े से उदासी लेने योग्य हैं।
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पहले बाल परीक्षा फिर वैसी शिक्षा- पूर्व में बच्चे पाँच वर्ष के हो जाते थे, तव उनके सामने तलवार, माला, तराजू, आदि रख देते थे, उससे कहते उठाओ तुम्हें क्या पसन्द है, यदि तलवार उठाई तो सैनिक बनेगा, माला उठाई तो माला जपेगा, तराजू उठाई तो व्यापारी बनेगा, वैसी ही शिक्षा उसको देते थे।
ज्ञान
सोने के मृग का जन्म लेना असम्भव है, फिर भी रामचन्द्र जी स्वर्ण मृग से प्रभावित हो गए, सो ठीक है क्योंकि विपत्ति के काल में बुद्धिमानों की बुद्धि भी नष्ट हो जाती है।
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जो अरिहन्त को द्रव्य-गुण-पर्याय से जानता है, वह आत्मा को जानता है और उसका मोह अवश्य नाश को प्राप्त होता है।
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केवलज्ञान उत्पत्ति स्थान- वृषभनाथ भगवान् को पूर्वताल नगर के सकटामुख वन में, नेमिनाथ भगवान् को गिरनार पर्वत पर, पार्श्वनाथ भगवान को आश्रम के समीप, महावीर भगवान को ऋजुकूला नदी के तट पर शेष तीर्थंङ्करों को अपने-अपने नगर के उद्यान में केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था।
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वृषभनाथ, श्रेयाँसनाथ, मल्लिनाथ, नेमिनाथ और पार्श्वनाथ भगवान् को पूर्वाण्ह काल में शेष को अपराण्ह काल में केवलोत्पत्ति हुयी थी।
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ऐसो वेद न देखो पांड़े, आसं पास कपासा। खोद विनोद करो मत पांड़े, अर्ध-अर्ध स्वाहा॥
ज्ञान
सम्यग्दर्शन वास्तव में सूक्ष्म है, वह केवलज्ञान अथवा अवधि और मनःपर्ययज्ञान का विषय है, न कि मति-श्रुत ज्ञान का विषय है और न देशावधिज्ञान का इन ज्ञानों से उसकी उपलब्धि नहीं होती है।
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प्रथमानुयोग से प्रशम, करणानुयोग से संवेग, चरणानुयोग से अनुकम्पा, द्रव्यानुयोग से आस्तिक्य गुण प्रकट होता है, अर्थात् चारों अनुयोगों के अध्ययन से ये चार गुण प्रकट होते हैं।
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नित्य स्वाध्याय सम्यग्दर्शन का प्रबल कारण है।
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तीन प्रकार के पदार्थ- सूक्ष्म परमाणु, कालाणु, धर्मादि द्रव्य ये इन्द्रियों से नहीं जाने जाते अतः सूक्ष्म हैं।
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व्यक्ति चरित्र से भ्रष्ट भले ही हो जाये, पर ज्ञान पूज्य होता है, जैसे आचार्य माघनन्दी जी चरित्र से भ्रष्ट हो गये थे, फिर भी मुनि महाराज उनसे समाधान करने उनके घर गये थे, इस निमित्त से उनका स्थितिकरण हो गया था, सोना गन्दे स्थान पर पड़ा हो तो भी मूल्यवान होता है।
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पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ पण्डित भया न कोय। ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय।।
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शब्द ज्ञान टण्की के पानी एवं आत्म ज्ञान कुंए के जल के स्रोत के समान है, जिसका अन्त नहीं होता है।
ज्ञान
समझाने में है नहीं, है समझे में सार। समझाने वाले कई, पड़े बीच मझधार।।
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विद्या विनय को देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है और धर्म से सुख होता है।
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'ज्ञान' मद और दर्प (अक्खड़पन) को हरने वाला है और जो ज्ञान का ही मद करता है, उसके लिए कल्याण का दूसरा साधन और क्या हो सकता है? क्योंकि अमृत ही जब विष हो जाए तब चिकित्सा किससे हो सकती है?
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खुदा से खुद की पहचान- एक व्यसनी को पत्नि शिक्षा देती है कि तुम व्यसन छोड़ो भगवान् से नाता जोड़ो। एक बार वह बाहर जा रहा था, तब पत्नि ने एक भगवान् की मूर्ति दी और कहा अपने को जानों, वह रोज पूजा करता द्रव्य चढ़ाता था, चूहा द्रव्य को खा जाता था तो वह चूहे की पूजा करने लगा, एक दिन बिल्ली चूहे पर झपटी तो वह बिल्ली की पूजा करने लगा, एक दिन कुत्ता बिल्ली पर झपटा तो वह कुत्ते की पूजा करने लगा, एक दिन पत्नी ने कुत्ते को लाठी मारी तो वह पत्नी की पूजा करने लगा एक दिन उसे गुस्सा आया तो उसने पत्नी को मारा तो उसे लगा कि अरे श्रेष्ठ तो मैं ही हूँ, तब से उसे अपने आत्म तत्व की श्रेष्ठता मालूम हुई।
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जिस प्रकार पाषाण में सोना, दूध में घी, तिल में तैल है उसी प्रकार शरीर में आत्मा है।
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आहार, निद्रा, भय, मैथुन, मनुष्य और पशु में समान होते हैं, किन्तु मनुष्य में ज्ञान विशेष होता है इसलिए ज्ञान से हीन मनुष्य को पशु के समान कहा है।
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एक निगोदिया जीव के शरीर में द्रव्य प्रमाण की अपेक्षा सिद्धों से अनन्तगुणे और सम्पूर्ण भूतकाल के जितने समय होंगे उतने जीव होते हैं।
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संयम के साथ थोड़ा भी ज्ञान मूल्यवान है पर संयमी विद्याध्ययन करें।
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नास्तिक मानता है कि जब तक जीवन है तब तक सुख से जियो अगर धन न हो तो कर्ज लेकर घी पियो क्योंकि शरीर के जल जाने पर पुनः कहाँ से मिलेगा।
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ज्यों मतिहीन विवेक विना नर, पाय मतङ्ग ईंधन ढ़ोवे, कञ्चन भाजन धूल भरे सठ, मूढ़ सुधारस सों पग धोवे। वाहत काग उड़ावन कारण, डार महामणि मूरख रोवे, त्यों यह दुर्लभ देह बनारसी, पाय अज्ञान अकारण खोवे।।
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मनुज जन्म दुर्लभ यह, होय न दूजी बार। पक्का फल जो गिर गया, फेर न लागे डाल।।
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नट के समान दुरात्मा मनुष्य को बहुत अध्ययन करने से क्या लाभ है, अध्ययन करना और शास्त्र का सुनना तो उसी का सार्थक है जो चारित्र का पालन करता है।
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इन्द्रिय जन्य ज्ञान व सुख आत्मानुभव में बाधक है अतः हेय है।
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शास्त्र का पार नहीं है, आयु थोड़ी है एवं हम सब दुर्बुद्धि हैं, इसलिए वह सीख लेना चाहियें जिससे जन्म-मरण का क्षय हो जाए।
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सोना-चाँदी की मिली हुई अवस्था की तरह शरीर और आत्मा की अवस्था है।
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नरकाया को सुरपति तरसे- भगवान् के दीक्षा कल्याणक के समय पालकी उठाने में जब मनुष्यों को पहले अवसर मिलता है तो इन्द्र कहता है, कि हमारी पूरी इन्द्रपुरी कोई ले ले और कुछ समय के लिए नर पर्याय दे दे, उस समय उसे इन्द्रपुरी से भी मनुष्य पर्याय का मूल्य अधिक लगता है।
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सूत सहित सुई गुमने पर शीघ्र मिल जाती है, उसी प्रकार सूत्र अर्थात् आगम (ज्ञान) सहित आत्मा चार गति चौरासी लाख योनियों में भटकती नहीं है।
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स्व-पर का कथन और चार अनुयोग का अभ्यास करना-कराना व धर्म ध्यान सहित काल व्यतीत करना तप है।
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'स्वाध्यायः परमं तपः'- स्वाध्याय परम तप है। 'तपसा निर्जरा च' - तप से संवर के साथ निर्जरा भी होती है।
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स्वाध्याय-''ताश का विश्वास मोक्षमार्ग का''-पन्द्रह मिनट के स्वाध्याय ने जीवन बदल दिया। एक जुआरी ने साधु के दर्शन से दो नियम लिए, पहला देव दर्शन, दूसरा पन्द्रह मिनट का स्वाध्याय और पाँच मिनट का चिन्तन, एक दिन वह मन्दिर देरी से गया, भगवान् के दर्शन खिड़की से हो गये, लेकिन स्वाध्याय को शास्त्र जी नहीं मिला, जेब से ताश के पत्ते निकाल कर चिन्तन शुरू किया। पहला पत्ता इक्का पर विचार करता है- निश्चय से मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, दर्शन-ज्ञान मय हूँ, सदा अरूपी हूँ, परमाणु मात्र भी अन्य द्रव्य मेरा कुछ नहीं है। 2 नं. के पत्ते पर विचार- जिस प्रकार दो छोर वाली रस्सी से मथानी मटकी में भ्रमण करती है उसी प्रकार राग-द्वेष रुपी दो छोरों के माध्यम से यह जीव संसार रुपी मटकी में भ्रमण करता है। 3 नं. पर विचार- मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीन संसार के कारण हैं एवं सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीन मोक्ष के कारण हैं। 4 नं. पर विचार चार कषाय से चार गति में भ्रमण होता है। पाँच पापों से पञ्च परावर्तन होता है। छह लेश्याओं में तीन शुभ और तीन अशुभ होती हैं। सप्त व्यसनों के सेवन से सातों नरकों में भ्रमण होता है। अष्ट मद एवं अष्ट शंकादि दोष त्यागे नहीं तथा अष्ट मूलगुण धारण नहीं किये। नौ पथार्थों को जाना नहीं। दस धर्म धारण नहीं किये। ग्यारह प्रतिमा पाली नहीं। बारह तपों को तपा नहीं। ''इस प्रकार बारह भावनाओं का चिन्तन करने से वैराग्य हो गया'', तब तेरह प्रकार का चारित्र पालन करेंगेऔर मोक्ष प्राप्त करेंगे। सीधे क्रम से चिन्तन करता है कि आदमी अकेला आया है, अकेला ही जायेगा, पुनः शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा, यदि रत्नत्रय को धारण किया है, चार अनुयोगों का अध्ययन किया है, पाँच महाव्रतों को धारण किया हैं, छः आवश्यकों का पालन किया है, सात तत्त्वों का चिन्तन किया है, आठ कर्मों से छूटेंगे, नव देवताओं में नम्बर आ जायेगा, दस धर्मों का उदय होगा, अब मन का गुलाम नहीं बनना पड़ेगा, इन्द्रियाँ बेगम नहीं बनेगी, आत्मा बादशाह होगी।
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जो शरीर से भिन्न अविनाशी आत्मा को नहीं जनता है और घोर तपस्या करता है, तो भी उसे मोक्ष नहीं मिलता है।
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बारह प्रकार के तपों में स्वाध्याय के समान कल्याणकारी तप न है और न होगा।
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ज्ञान दान-शास्त्रदान से शास्त्ररूपी सागर का पारगामी, अज्ञान अन्धकार को भेदने वाला तथा रागादि की सन्तति को मिटाने वाला होता है।
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कोण्डेश ग्वाला ने शास्त्रका दान दिया जिससे वह महान आचार्य कुन्दकुन्द महाराज बना।
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जो अहङ्कारी अधम पुरुष मोह के कारण विनम्र एवं बुद्धिमान श्रोता के रहते हुए निषिद्ध मन्दबुद्धि श्रोता को व्याख्यान करता है, उसका रत्नत्रय रुपी जहाज भग्न हो जाता है और बोधि से रहित होकर संसार समुद्र में डूब जाता है।
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आदिनाथ जी ने विद्यादान नारी को दिया, जिससे कि ये सन्तान को शिक्षित कर सके, औरबेटों को तलवार सिखाई और छःखण्ड का अधिपति बनाया।
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शरीर के दुर्गुण और आत्मा की महिमा का चिन्तन करें, वो नहीं रहे अर्थात् वो कोई और था, ऐसा भेद विज्ञान जीवित अवस्था में होना चाहिए।
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शिल्पी ने मूर्ति नहीं बनाई, आवरण हटाया है, मूर्ति तो पत्थर में पहले से ही थी, उसी प्रकार आत्मा के ऊपर का आवरण हटते ही भगवान् आत्मा प्रकट हो जाती है।
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यदि दुनिया की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति चाहते हो, तो बाहर भटकने की जरूरत नहीं वह तुम्हारे भीतर है।
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ज्ञान-दर्शन ही मात्र मेरा है अन्य कुछ भी नहीं ऐसा अनुभव करना आकिञ्चन्य धर्म है।
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मैं हूँ कौन कहाँ से आया, किस दर पर है जाना। इस दुनिया में क्या है मेरा, साथ किसे ले जाना।। क्या खोया क्या पाया अब तक, क्या मुझको है पाना। कैसा है मम रूप सलोना, कब शिवपुर है जाना।।
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यहाँ कुछ नहीं हैं, वहाँ कुछ नहीं हैं, जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ भी कुछ नहीं हैं, विचार करके पाता हूँ कि आत्मज्ञान से बढ़कर और कुछ भी नहीं हैं।
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ज्ञानी और अज्ञानी का लक्षण- जो पुरुष अपने से अन्य पर द्रव्य, सचित्त स्त्री पुत्रादिक, अचित्त धन धान्यादिक अथवा मिश्र ग्राम नगरादिक हैं उन्हें यह समझता है कि मैं यह हूँ, यह द्रव्य मुझ स्वरुप है, मैं इसका हूँ, यह मेरा है, यह मेरा पहले था, इसका मैं भी पहले था, यह मेरा भविष्य में होगा, मैं भी इसका भविष्य में होऊँगा, ऐसा झूठा आत्म विकल्प करता है वह मूढ़ है, मोही है, अज्ञानी है, और जो पुरुष परमार्थ वस्तुस्वरुप को जानता हुआ वैसा झूठा विकल्प नहीं करता वह मूढ़ नहीं ज्ञानी है।
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