Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 10 / 11

अज्ञान- किसी ने कहा तुम्हारी पत्नि विधवा हो गयी, वह रोने लगा, तीसरे ने सुना तो कहा आप जीवित हैं तो आपकी पत्नी विधवा कैसे हुई? इसी तरह जब तक मेरे पन तेरे पन की बुद्धि है, तब तक अज्ञान है।
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भ्रान्ति टूटी- किसी व्यक्ति ने स्वप्न में देखा, मकान में आग लग गयी, दरवाजे, परदे आदि जलने लगे हैं, उस व्यक्ति के मकान को बुझाने के लिये कितने बाल्टी पानी की आवश्यकता है? अर्थात् एक बूँद की भी नहीं, मात्र उसे जगाने की आवश्यकता है, उसके जागते ही आग अपने आप बुझ जायेगी, वस्तुतः आग लगी ही कहाँ थी, भ्रान्ति टूटने की आवश्यकता थी उसी प्रकार, ये जगत भी एक सपना है, मात्र सजग होने की आवश्यकता है।
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शरीर के चिकित्सक बहुत हैं पर आत्मा की चिकित्सा करने वाले दुर्लभ हैं।
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ज्ञानी हँसता है- मिट्टी का खिलौना फूटने पर बच्चा रोता है, माँ-बाप हँसते हैं, उसी प्रकार सांसारिक वस्तु की हानि होने पर अज्ञानी रोता है, और ज्ञानी पाप का उदय समझकर कर्म निर्जरा के लिए हँसता है।
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आत्मा आँखों से दिखाई नहीं देती, अनुभव से जानी जाती है, जैसे हवा दिखाई नहीं देती, पर अनुभव से जानी जाती है।
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जिस प्रकार दही को बिलोवने वाली ग्वालिनी मथानी की रस्सी को एक हाथ से खींचती है, दूसरे से ढीला कर देती है और दोनों की क्रिया से दही से मक्खन बनाने की सिद्धि करती है, उसी प्रकार जिनवाणी रूप ग्वालिनी सम्यग्दर्शन से तत्त्वस्वरूप को अपनी ओर खींचती है, सम्यग्ज्ञान से पदार्थ के भाव को ग्रहण करती है और दर्शन ज्ञान की आचरण रूप क्रिया से अर्थात् सम्यक्चारित्र से परमात्म पद प्राप्ति की सिद्धि करती है, द्रव्यार्थिक व पर्यायार्थिक दोनों नयों से वस्तुस्वरुप की सिद्धि करती है।
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द्रव्यार्थिक नय एक्सरे की तरह है, पर्यायार्थिक नय कैमरे की तरह है।
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नय सम्यग्ज्ञान के अंश हैं, मिथ्याज्ञान में मिथ्या नय होते हैं।
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मैं रोटी खाता हूँ, मैं उपदेश करता हूँ आदि सब कथन उपचरित असद्भूत व्यवहारनय का है।
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जो तत्त्वार्थ सूत्र का पाठ करता है उसे एक उपवास का फल मिलता है और जो अर्थ का विचार करता है उसे अनन्त उपवास का फल मिलता है।
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जो बिन ज्ञान क्रिया अवगाहे, जो बिन क्रिया मोक्ष फल चाहे। जो बिन मोक्ष कहे मैं सुखिया, सो अजान मूढ़न में मुखिया।।
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जिसमें अक्षर अल्प हों और अर्थ बहुत हो उसे सूत्र कहते हैं।
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तत्त्वार्थसूत्र में चकार की संख्या- पहले अध्याय में 2, आगे के अध्यायों में क्रमश: 11, 7, 10, 9, 6, 3, 5, 4, 3 कुल 60 चकार आये हैं।
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तत् शब्द की संख्या क्रमश: 6, 3, 7, 2, 2, 4, 4, 2, 3, 1 कुल 34 तत् शब्द आये हैं।
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सूत्रों की संख्या क्रमश: 33, 53, 39, 42, 42, 27, 39, 26, 47, 9 कुल 357 सूत्र आये हैं।
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छोटे सूत्रों की संख्या क्रमश: 4, 14, 3, 7, 9, 2, 6, 5, 10, 1, कुल 61 छोटे सूत्र आये हैं।
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बड़े सूत्रों की संख्या क्रमश: 2, 4, 8, 2, 1, 3, 6, 3, 3, 2 कुल 34 बड़े सूत्र आए हैं।
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श्वेताम्बर तत्त्वार्थसूत्र में क्रमश: 35, 52, 18, 53, 44, 26, 38, 26, 49, 7 कुल 344 मानते हैं, तीसरे अध्याय में 1 से 11 वे सूत्र तक और 33 से 39 वे सूत्र तक कुल 18 सूत्र मानते हैं।
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जीव द्रव्य का ज्ञान-जीव को प्रदेशों की संख्या की मुख्यता से अस्तिकाय में ग्रहण किया है, उत्पाद व्यय ध्रौव्य की मुख्यता से द्रव्यों में ग्रहण किया है, ज्ञायक भाव की मुख्यता से तत्त्व में ग्रहण किया है एवं काल की मुख्यता से पदार्थों में ग्रहण किया है।
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अपना परिचय- नाम क्या है- जीव द्रव्य, कहाँ रहते हो- असंख्यात प्रदेश में, उम्र- अनाद्यनन्त, भाव- जानना देखना।
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नय की अपेक्षा हलुआ में आटा, घी, शक्कर, बादाम आदि हैं, किन्तु प्रमाणकी अपेक्षा एक शब्द में हलुआ कहा जाता है।
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रसना से हलुआ चखा तो सिर्फ रस का ज्ञान हुआ, उसे नय कहते हैं।
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प्रमाण को षड्दर्शन वाले मानते हैं, लेकिन नय को मात्र जैन सिद्धान्त ही स्वीकार करता है।
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प्रमाण और नय विशेष के विषय हैं जैसे-पाँच ज्ञान हैं वे प्रमाण हैं, प्रमाण से महासत्ता और अवान्तरसत्ता, दोनों भिन्न हैं, महासत्ता दर्शन का विषय है, अवान्तरसत्ता प्रमाण और नय का विषय है।
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सत् आदि आठ अनुयोगों में प्रथम-प्रथम के ग्रहण करने पर द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव बनते हैं, जैसे सत् से द्रव्य, क्षेत्र से क्षेत्र, काल से काल, भाव से भाव, निक्षेप में भी द्रव्यादि बनते हैं, जैसे विद्यार्थी का नाम द्रव्य, उसका निवास क्षेत्र, उसकी उम्र काल, उसकी योग्यता भाव निक्षेप है।
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सभा है-सत्, कितने लोग हैं-संख्या, कहाँ पर हैं-क्षेत्र, कहाँ से आये, कहाँ जायेंगे-स्पर्शन, कितने बजे तक सभा होगी-काल, इसके बाद सभा कब होगी-अन्तर, क्षायोपशमिक आदि-भाव, स्त्री अधिक पुरुष कम इत्यादि-अल्पबहुत्व।
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असंज्ञीजीव के अवग्रह, ईहा आदि ज्ञान होते हैं।
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अर्थस्य से यहाँ तक अर्थावग्रह का वर्णन हुआ।
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गणधरदेव को मन:पर्यय ज्ञान होने से आहारक पुतला नहीं निकलता है।
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''तदनन्तभागेमन:पर्ययस्य'' इस सूत्र के विषय में दो मत हैं, एक मत के अनुसार सर्वावधि ज्ञान परमाणु को जानता है, इस मत के अनुसार मन:पर्ययज्ञान परमाणु के अनन्तवे भाग को जानता है, दूसरे मत के अनुसार सर्वावधिज्ञान कार्मण द्रव्य को जानता है, इस मत के अनुसार मन:पर्ययज्ञान कार्मण द्रव्य के अनन्तवे भाग को जानता है।
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विदेह आदि क्षेत्रों में जो अवधिज्ञान साथ जाये उसे क्षेत्रानुगामी अवधिज्ञान कहते हैं।
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मन:पर्ययज्ञानी मन में स्थित पदार्थ को जानते हैं, यदि मुट्टी में हैं तो नहीं जानेगे, लेकिन मुट्टी की वस्तु मन में हो तो जान लेंगे।
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अनुमान मतिज्ञान का भेद है और निमित्तज्ञान श्रुतज्ञान का भेद है, नारद और पर्वत जङ्गल में जा रहे थे, एक ने कहा यहाँ हाथी गया है, पैरों के चिन्हों से जाना, आगे जाकर कहता है, हथिनी गई है, वह एक आँख से कानी है, उस पर रानी बैठी है, वह गर्भवती है, उसको पुत्र होगा, ये सब अनुमान से जाना, बड़े पैर से हाथी का ज्ञान, लघुशङ्का से हथिनी का ज्ञान, एक तरफ की डालियाँ खाने से कानी हथिनी का ज्ञान, उतरते समय वजन पड़ा, इसलिए गर्भवती का ज्ञान, दाईं ओर से उतरी इसलिए लड़के का ज्ञान हुआ।
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प्यासे दो मित्र पानी की खोज में थे, देखा यहाँ से ठण्डी हवा आ रही है, पक्षी उड़ रहे हैं, हरे भरे वृक्ष हैं, महिलाएँ पानी ला रही हैं, अन्त में तालाब पर पहुँच गए, ये अनुमान ज्ञान है।
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हीयमान अवधिज्ञान जैसे भुज्यमान आयु सदा घटती जाती है, वर्धमान अवधिज्ञान जैसे तृष्णा बढ़ती जाती है, अवस्थित ज्ञान जैसे शरीर का तिल आदि, अनवस्थित ज्ञान जैसे चन्द्रमा की कलाएं इत्यादि।
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किसी जीव में चार ज्ञान होने पर भी उपयोग एक का ही होगा जैसे एक पेन में पाँच रिफिल हैं लेकिन एक समय में एक का ही उपयोग होगा।
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ब्राह्मण से तत्त्वार्थसूत्र जी के पहले अध्याय के 'एकादीनि भाज्यानि युगपदे कस्मिन्नाचतुर्भ्य:' सूत्र का अर्थ पूँछा तो इस प्रकार का अर्थ किया-'एक को लेकर सबको मारो और चारों दिशाओं में जहाँ रास्ता मिले भाग जाओ', इसलिये 'सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र' अर्थात् सूत्रों में नहीं दिखाई देने वाले पद की आगे-पीछे से अनुवृत्ति कर लेना चाहिए।
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तत्त्वार्थसूत्र में कहीं भी 'दग्धाक्षर' झगड़े वाला 'झ' का प्रयोग नहीं हुआ है।
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अङ्गबाह्य- आरातीय आचार्यों के द्वारा जो रचना हुयी, अर्थात् आज के श्रुत को अङ्गबाह्य कहते हैं।
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अङ्गप्रविष्ट- गणधर या अङ्ग श्रुत के धारियों के द्वारा जो रचा गया है, उसे अङ्गप्रविष्ट कहते हैं।
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कुन्दकुद स्वामी ने सर्व विशुद्ध अधिकार लिखा, सर्वाधिकारों को सुरक्षित (पेटेंट) नहीं लिखा है।
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उपशमसम्यक्त्व, सूक्ष्मसाम्परायसंयम, आहारककाययोग, आहारकमिश्रकाययोग, वैक्रियिकमिश्रकाययोग, लब्ध्यपर्याप्तक- मनुष्य, सासादनसम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ये आठ सान्तर मार्गणाएँ हैं।
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उपयोग के माध्यम से मिली चीज का भी अनुभव कर सकते हैं, जैसे दाल में नमक, रोटी में घी आदि उसी प्रकार शरीर में आत्मा का अनुभव कर सकते हैं।
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'उपयोग' दो जगह आया है, 'उपयोगो लक्षणम्', 'लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् एक में ज्ञान दर्शन लेना, दूसरी जगह क्षयोपशम लेना है, लब्धि के निमित्त से जो परिणमन होता है उसे उपयोग कहते हैं।
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गति मार्गणा- औदयिक भाव के 'गतिकषाय.... ' इत्यादि सूत्र से।
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इन्द्रिय मार्गणा-'पञ्चेन्द्रियाणि, द्विविधानि' सूत्र से।
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काय मार्गणा- 'संसारिणस्त्रसस्थावरा:' सूत्र से।
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योग मार्गणा- 'विग्रहगतौ कर्मयोग:' सूत्र से।
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वेद मार्गणा- 'गतिकषायलिङ्ग....50-51-52 आदि सूत्र से।
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कषाय मार्गणा-'गतिकषायलिङ्ग...' सूत्र से।
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ज्ञान मार्गणा- 'ज्ञानाज्ञानदर्शन...' इत्यादि 4-5-7 वें सूत्र से।
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संयम मार्गणा- '5 वे 6' वें सूत्र से।
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दर्शन मार्गणा- 'ज्ञानाज्ञानदर्शन....' आदि चौथेसूत्र से।
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लेश्या मार्गणा- '6' वें सूत्र में औदायिक भाव से।
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भव्य मार्गणा- 'जीवभव्याभाव्यत्वानि च' सूत्र से।
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सम्यक्त्व मार्गणा-'1-6-7' वें सूत्र से।
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जीवकाण्ड की बीस प्ररूपणाएँ तत्त्वार्थसूत्र के दूसरे अध्याय में इस प्रकार से निकलती हैं जैसे-
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संज्ञी मार्गणा- ' समनस्कामनस्का: '11 वें सूत्र से।
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आहार मार्गणा- 'एकं द्वौ त्री न्वानाहारका:' सूत्र से।
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गुणस्थान प्ररूपणा- '1-5-6-7' वे सूत्र से।
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जीव समास प्ररूपणा-'पृथिव्यप्ते..,द्वीन्द्रियादय..' आदि सूत्र से।
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प्राण प्ररूपणा- 'पञ्चेन्द्रियाणि' सूत्र से।
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संज्ञा प्ररूपणा- 'एकं द्वौ त्रीन्वानाहारक:' सूत्र से।
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पर्याप्ति प्ररूपणा- 'पञ्चेन्द्रियाणि' सूत्र से।
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उपयोग प्ररूपणा- 'उपयोगोलक्षणं' सूत्र से।
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जैसे पुराणों में कथा चालू होती है, उसी प्रकार दूसरे अध्याय के बारहवें सूत्र से संसारी जीव की कथा चालू होती है।
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आभ्यन्तर निवृत्ति में आत्मा के प्रदेश जो इन्द्रियाकार हुये हैं, वे प्रदेश स्थिर रहते हैं।
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अजीव विशेषण से जीव छूट गया, काय विशेषण से काल द्रव्य छूट गया, अचेतन द्रव्य पाँच, कायवान द्रव्य पाँच, बहु प्रदेशी द्रव्य पाँच, अजीव तथा कायवान चार द्रव्य हैं।
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सत्यनारायण के छह पुत्र- ज्ञानचन्द्र, रूपचन्द्र, धर्मचन्द्र, अधर्मचन्द्र, गगनचन्द्र और कालचन्द्र छहों को पिता ने बुलाकर काम सौंपा। ज्ञानचन्द्र! तुम्हें जानने-देखने का काम है। रूपचन्द्र! तुम्हे रूप प्रदर्शन करना है। धर्मचन्द्र! जीव-पुद्गल तुम्हारे दोनों बड़े भैया हैं, उनको चलने में सहायता देना। अधर्मचन्द्र! जीव-पुद्गल चलकर आयें तो विश्राम देना। गगनचन्द्र! आवास मन्त्री है, सबको आवास देना। काल! सबको परिवर्तन करने में सहयोग देना। ज्ञानचन्द्र सबसे बड़े थे अतः मनमानी करने लगे, ज्ञायक स्वभाव से उल्टा राग-द्वेष करने लगे, इससे संसार में दुःख भोगने लगे, दुःखों से बचने के लिए अपने ज्ञायक स्वभाव में आना आवश्यक है।
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छह द्रव्य- ग्रन्थ का पढ़ने वाला जीवद्रव्य, ग्रन्थ अजीवद्रव्य, ग्रन्थ को इधर-उधर ले जाना धर्मद्रव्य, ग्रन्थ विराजमान करना अधर्मद्रव्य, ग्रन्थ का आकार आकाशद्रव्य, ग्रन्थ का जो भी परिणमन होता है वह कालद्रव्य की सहायता से होता है।
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जो देख रहा है वह जीव है और जो दिख रहा है वह पुद्गल है।
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अणवः स्कन्धाश्च सूत्र में समास क्यों नहीं किया? क्योंकि यहाँ भेद रूप कथन किया है। इस सूत्र से पहले जो दो सूत्र कहे हैं, 'स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तःपुद्गलाः', 'शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च' के साथ अलग सम्बन्ध बताने के लिये किया है, अणु स्पर्श रस गन्ध वर्ण वाले हैं, किन्तु स्कन्ध शब्द बन्ध एवं स्पर्शादि वाले हैं।
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द्रव्य क्षेत्र काल भाव- 1.द्रव्य-प्लेटफॉर्म का टिकिट/ट्रेन का टिकिट, 2.क्षेत्र-छोटी लाइन/बड़ी लाइनका टिकिट, 3.काल-आज का टिकिट कल नहीं चलेगा, 4.भाव-थर्डक्लास का टिकिट फर्स्टक्लास में नहीं चलता है।
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तप से हीन ज्ञान मान्य है और ज्ञान से हीन तप पूज्य है, जिसके ज्ञान और तप दोनों होते हैं वह देव होता है और जो दोनों से रहित है वह केवल मनुष्य की संख्या पूरी करने वाला है।
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अन्य दर्शनकार आत्मा को वट के बीज बराबर मानते हैं, जैन दर्शन मानता है कि जितना शरीर होता है उतनी आत्मा होती है, चाहे चींटी का शरीर हो या हाथी का।
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