Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Knowledge & Wisdom

ज्ञान

800 सूत्र · पृष्ठ 8 / 11

रामचन्द्र जी बाल्यावस्था में पानी में चन्द्रमा को देखकर उसे पकड़ कर खेलना चाहते थे, नहीं पकड़ पाने पर रोने लगे, पूँछा क्यों रोते हो? मन्त्री ने कहा चन्द्रमा चाहिये, राजा ने कहा! ले आओ चन्द्रमा को, मन्त्री ने दर्पण रख दिया, उसमें बिम्ब पड़ा देखकर, रामचन्द्रजी प्रसन्न हो गये, दर्पण छाती से चिपका कर खेलने लगे, इसी प्रकार ज्ञानज्योति को पाकर ज्ञानी प्रसन्न होता है।
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जो शिक्षित है, वही आँखों वाले होते हैं और अशिक्षित के माथे पर तो दो गढ़े होते हैं।
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जीव जिससे रत्नत्रय की रक्षा करता है,शारीरिक सुख से अत्यन्त विरक्त होता है,पाप को रोकता है और विशुद्धि को बढ़ाता है,सर्वज्ञदेव ने उसे ही ज्ञान माना है।
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स्वाध्याय से भव्य जीवों का 'ज्ञान'सूर्य की किरणों के समान प्रकाशमान होता है,'चारित्र'चन्द्रमा के समान उज्ज्वल होता है और 'मन' अपने वश में रहता है।
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ज्ञानी और मूर्खों में यही विशेषता मानी गयी है कि ज्ञानीजन नष्ट,मृत और बीती बातों का शोक नहीं करते हैं, अज्ञानी किया करते हैं।
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विद्वानों ने शास्त्र का उत्कृष्ट फल ''संसार से भय'' कहा है, अत: जो शास्त्र से धन की इच्छा करते हैं,वे अमृत से विष की इच्छा करते हैं।
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अन्य दर्शन में जो शुभ वाक्य दिखाई देते हैं वे जैन वाक्य हैं,क्योंकि जो मोती अन्यत्र दिखाई देते हैं उनकी उत्पत्ति समुद्र में ही होती है।
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जिसने व्याकरण नहीं पढ़ा है वह ज्ञान नेत्र से हीन, जन्मान्धवत् है,जो न्यायशास्त्र से रहित है वह तर्कशास्त्र के कहने में असमर्थ है अत: मूकवत् है, जो साहित्य से रहित है वह साहित्य सदन में प्रवेश पाने में पद विहीन है अत: वह पङ्गू है और जो शब्दकोष से रहित है वह निर्धन है।
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शास्त्ररूपी समुद्र से निकाल कर गणधरादि सत्पुरुष रूप मेघों ने जिसकी वर्षा की है,ऐसे चारों अनुयोग रूप जल को भव्य जीव रूपी चातक प्रीति के लिए बार-बार पियें। 'इन्द्रियों के निरोधपूर्वक' किया गया स्वाध्याय परम तप है।
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विद्वान् पुरुष भले ही कुरूप हो तथा वस्त्र-अलङ्कार और वेष से हीन हो, तो भी सज्जनों की सभा में सुशोभित होता है।
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शस्त्रविद्या और शास्त्रविद्या ये दोनों विद्याएँ ज्ञान के लिए हैं परन्तु पहली शस्त्रविद्या वृद्धावस्था में हास्य कराती है और दूसरी शास्त्रविद्या सदा आदर को प्राप्त कराती है।
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ज्ञानार्जन के बाद आत्महित में दृष्टि न गयी तो धनार्जन के समान ज्ञानार्जन कहलायेगा।
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ग्यारह अङ्ग, नौ पूर्व का ज्ञान भव्य मिथ्यादृष्टि को हो सकता है, ग्यारह अङ्ग का ज्ञान अभव्य को भी हो सकता है।
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ज्ञान की साधना करने वाला व्यक्ति संत बने या न बने श्रावक तो बन ही जाता है।
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नीति और ज्ञान कभी बासे नहीं होते हैं, ये उपयोग के विना पङ्गु है।
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जहाँ स्याद्वाद है वहाँ कोई विवाद नहीं, जहाँ एकान्तवाद है वहाँ विवाद है।
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मेहँदी से लाल रङ्ग बांटने पर निकलता है, उसी प्रकार अभ्यास करने पर आत्मा से ज्ञान निकलता है।
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शिक्षा ऐसी हो कि जिससे मनुष्यों में मनुष्यता का विकास हो।
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शास्त्रानुसार अपनी बुद्धि करना, बुद्धि के अनुसार शास्त्र नहीं करना, पढ़ो, समझो, आचरण में लाओ, फिर उपदेश दो।
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जिसके परिणाम जितनेअधिक विशुद्ध होंगे उतना अधिक उस जीवको श्रुत का क्षयोपशम होगा।
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जैसे बम्बई घूमकर आए व्यक्ति को सब कुछ झलकता है, दर्पण में हाथी जैसे विशाल प्राणी भी झलकते हैं, आँख की पुतली मसूर बराबर होकर भी मेरु को विषय बना लेती है, उसी प्रकार ज्ञान रूपी दर्पण में सब कुछ झलकता है।
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दो प्रकार का ज्ञान-मुख का ज्ञान- 'शरीर अलग है आत्मा अलग है' पाठ कर लेते हैं। ह्रदय का ज्ञान- सुकुमाल स्वामी ने 'शरीर अलग है आत्मा अलग है' ऐसा चिन्तन करते हुए सियालनी को भगाया नहीं और सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग गए।
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विद्यालय एक मन्दिर है, सरस्वती वहाँ की देवी है, शिक्षक पुजारी है, विद्यार्थी भक्त हैं, अत: विद्यालय शुद्ध और व्यसन मुक्त होकर जाना चाहिए, चप्पल पहनकर गुटका खाकर विद्यालय में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
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एक सज्जन अत्यन्त गरीब थे, एक दिन बाजार से गुजर रहे थे, कोई व्यक्ति अत्यन्त उपयोगी दो पुस्तकें बेच रहा था, उसके पास पैसे नहीं थे, उधार देने को वह तैयार नहीं हुआ, अत: अपना कुर्ता गिरबी रख कर वे पुस्तकें खरीद लाये, चार छह दिन बाद जब पैसे आये तब कुर्ता बापस ले आये, क्या हम में ऐसी ज्ञान की ललक है? उन्होंने कुर्ता को नहीं, ज्ञान को कीमती समझा, हम धन रखने के लिए तिजोरियाँ खरीदते हैं, कार के लिये गैरिज बनवाते हैं, ड्राइवर रखते हैं, क्या कभी तत्त्व ज्ञान की पुस्तकें खरीदतें हैं व शास्त्रों के लिए अलमारी खरीदते हैं?
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श्रुतकेवली के बाद जो आचार्य हुये हैं वे अरातीय आचार्य कहलाते हैं।
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शिक्षक के योग्य शिक्षा- व्यवस्थित वैज्ञानिक विधि और उस विषय सम्बन्धी कार्य कुशलता शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षक को आवश्यक है।
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तत्त्वज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न करना, उसका ज्ञान कराना और सदाचार मय जीवन होना जैसे- पञ्चतन्त्र में एक राजा के पाँच सौ मूर्ख लड़के थे, राजा ने घोषणा करा दी कि जो मेरे बेटों को विद्वान बनायेगा, उसे आधा राज्य और कन्या दी जायेगी 'विष्णुशर्मा' ने बच्चों को 'काव्य शास्त्र विनोदेन' इस कहानी के वाक्य से पढ़ाना शुरू किया, उसी प्रकार शिक्षक कहानी से पढ़ाना शुरू करे।
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शिक्षक जिस विषय को पढ़ाता है, उस पर पूरी मास्टरी होना चाहिये, कुञ्जी में देखकर पढ़ाने से विद्यार्थी गुरू नहीं बन सकते, कुञ्जी देखने की अपेक्षा दो घण्टे पहले अच्छी तैयारी कर लो, वहाँ देखोगे तो आँख छिपाना पड़ेगी चोरी और मायाचारी का दोष लगेगा।
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एक राजा की चोरी हो गयी, मन्त्री को एक सेठ पर द्वेष के कारण शक था, मन्त्री ने कहा इसने चोरी की होगी, निर्णय हुआ कि चोर के हाथ में अग्नि का गोला दिया जाय जो जलेगा वह चोर कहलायेगा, सेठ के सामने बड़ी विपत्ति आ गयी, अग्नि में तो सब जलेंगे चाहे चोर हो या साहूकार, किसी ने सलाह दी तुम हाथ में काठ रखलेना वह कुछ कहे तो कहना तुम हाथ से दो तो मैं हाथ में लूँगा, तुम सण्डासी से दोगे तो मैं काठ पर लूँगा, इसी तरह शिक्षक जैसा पढ़ायेगा विद्यार्थी वैसा ही बनेगा, क्योंकि विद्यार्थी शिक्षक का आचरण सीखता है।
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समझना ज्ञान है समझाना कला है।
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बोर्ड पर कक्षा, विषय, दिनाँक लिखें, शिक्षक की दृष्टि छात्र पर रहे, इससे विद्यार्थी की श्रद्धा बढ़ेगी, आपकी पक्की मास्टरी होगी।
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पीछे वाले विद्यार्थी से ये न कहें कि 'सुनाई पढ़ रहा है या नहीं', उससे सरल प्रश्न पूँछलें।
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कौओं जैसी चेष्टा, बगुले जैसी एकाग्रता, कुत्ते जैसी निद्रा, अल्पाहार, गृहत्याग ये विद्यार्थी के पाँच लक्षण हैं।
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दीप प्रज्वलन का प्रयोजन अज्ञान का नाश हो, ज्ञान का प्रकाश हो।
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शास्त्र भेंट का प्रयोजन गुरु शिष्य को ज्ञान दान देकर अपने जैसा बनाए।
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ज्ञान की आग में जलकर व्यक्ति सूरज बने या न बने, पर दीपक तो बन ही जाता है।
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पाँच तत्त्व शिक्षा में बाधक- अहङ्कार, क्रोध, अरुचि, रोग, आलस्य।
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अर्थात्-जो तत्त्वज्ञान से रहित हैं उनको हमेशा दु:ख ही प्राप्त होता है।
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यदि एक साल की योजना बनाना चाहते हो तो उर्वरा भूमि में बीजों की बुवाई करो, यदि दस साल की योजना बनाना चाहते हो तो पेड़ लगाओ, और सौ साल की योजना बनाना चाहते हो तो एक पीढ़ी को संस्कारित करो, एक पाठशाला खोलना अर्थात् एक जेल बन्द कर देना है।
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शिक्षक में ये छ: चीजें होना आवश्यक हैं- उच्चाचरण हो, शिष्य पर प्रेम हो, उसकी उन्नति का भाव हो, निर्लोभ हो, कर्तव्य परायण हो, (डॉ- पं.पन्नालाल जी साहित्याचार्य सागर वालों ने बावन वर्ष मोराजी में सर्विस की लेकिन छुट्टी एक भी नहीं ली वे सहिष्णु थे)।
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चिकित्सक बिगड़ता है तो एक मरीज बिगड़ता है, वकील बिगड़ता है तो एक केस बिगड़ता है, एक इञ्जीनियर बिगड़ता है तो एक बिल्डिंग बिगड़ती है और एक टीचर बिगड़ता है तो हजारों विद्यार्थी बिगड़ जाते हैं।
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अहङ्कार, क्रोध, आलस, भूख शिक्षा में बाधक तत्त्व हैं।
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नेत्र, आरोग्य, आदि के अनेक शिविर लगते हैं, इन शिविरों में शरीर के एक-एक अङ्ग का कल्याण होता है, लेकिन सम्यग्ज्ञान शिक्षण शिविर में पूर्ण आत्मा का कल्याण होता है।
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व्यसन तो बहुत से हैं किन्तु उनमें दो ही व्यसन महत्त्वपूर्ण है, एक तो विद्या अध्ययन का व्यसन और दूसरा प्रभु के चरणों की सेवा का व्यसन।
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राजपुत्रों से विनय, ज्ञानियों से शिक्षाप्रद वाक्य, ज्वाँरियों से झूठ, स्त्रियों से मायाचारी की शिक्षा मिलती है।
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अभ्यास के विना विद्या विष है, अजीर्ण में भोजनविष है, दरिद्र को सभाविष है एवं वृद्ध को तरुणी विष के समान होती हैं।
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मात्र पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले, शास्त्र का चिन्तन करने वाले तथा आसक्ति पूर्वक कार्य करने वाले सब मूर्ख हैं, जो क्रियावान् है अर्थात् पठित एवं चिन्तित योग्य कार्य को करता है, वही पण्डित है।
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जो सत्य, तप, ज्ञान, अहिंसा तथा ज्ञानियों की विनय और ब्रह्मचर्य को धारण करता है वह विद्वान् है, न कि केवल जो पढ़ता है वह विद्वान् है।
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निर्मलज्ञान से सुशोभित जो मनुष्य जैनधर्म का ज्ञान कराते हैं, वे समस्त पृथिवीतल पर अनायास ही जीवसमूह की रक्षा करते हैं।
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धूर्त मनुष्य ज्ञान का तिरस्कार व सरल मनुष्य ज्ञान की प्रशंसा और ज्ञानी लोग ज्ञान का उपयोग करते हैं।
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अच्छी पुस्तकों के रहने पर मित्रों की कमी नहीं खटकती है। पोशाक बहुमूल्य तो हो, पर भड़कीली न हो।
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मैं नरक में भी अच्छी पुस्तकों का स्वागत करूँगा, इनमें वह शक्ति है कि ये जहाँ होगी वहाँ स्वर्ग बन जायेगा, विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र हैं। 'सबसे बड़ा पाप अङ्गूठा छाप'।
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पुराने कपड़े पहन कर नयी पुस्तक खरीदिये, जहाँ अच्छी पुस्तकें हैं वहाँ से लोभ, मोह, भ्रम, भय को भगाना कठिन नहीं है, अधिक पढ़ने से मन शैतान नहीं पवित्र होता है।
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लोक में ज्ञानी पुरुष स्वयं तरते हैं और जहाज के समान दूसरों को भी तारते हैं।
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जो विद्वान् दूसरों को सम्बोधित करते हैं, यथार्थ में वे ही सब को जानने वाले हैं, अन्य लोग जो घट में रखे हुए दीपक के समान किसी के काम नहीं आते हैं, वे मूर्ख हैं।
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मन्द या तीव्र गति से शास्त्र न पढ़े। ज्ञानाभ्यास में रुचि नहीं होती है तो कषाय और आरम्भ में प्रवृति होती है।
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हर विषय में न उलझें- एक विषय के ही विशेषज्ञ बनें, सांसारिक विषयों के ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, किसी भी व्यक्ति द्वारा हर चीज का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है, इसलिए केवल एक विषय के विशेषज्ञ बनिए और उसी से संसार की सेवा कीजिए, दूसरे क्षेत्रों में आम व्यवहार के लिए सामान्य ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, हमारा लक्ष्य आत्मज्ञान पाना है, संसार चलाना नहीं।
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प्रत्येक व्यक्ति से शिक्षा लें- संसार में ऐसा कोई नहीं जिसे सब कुछ आता हो, अतः प्रत्येक व्यक्ति से कुछ अनुभव लीजिए।
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सतत अध्ययन की प्रवृति अपनाएं, सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ाएँ।
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सर्वोत्तम स्मृति से महत्त्वपूर्ण है धुँधली सी लिखावट- अपनी स्मृति का भरोसा न करें महत्त्वपूर्ण बातें अवश्य लिखें।
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मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किसी तथ्य को दोबारा पढ़ने पर, उसे याद रखने या याद करने में लगभग पैंतालीस प्रतिशत कम समय लगता है।
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पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यवहारिक अभ्यास द्वारा सीखा हुआ ज्ञान मस्तिष्क में अधिक देर रहता है, और आप सफलता को शीघ्र एवं सुनिश्चित करते हैं।
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हर परिस्थिति से शिक्षा लें- हर क्षण और परिस्थिति नयी होती है, हम उससे नया अनुभव ले सकते हैं।
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आचरणीय सूत्र- 1.प्रत्येक शब्द को हृदयङ्गम करें, 2.वाञ्छित विषय में गहन रुचि विकसित करें, 3.जो भी पढ़ें उसका मन से हानि-लाभ का विचार अवश्य करें, 4.पाठ को ध्यान से सुनें, 5.प्रत्येक संशय को कागज पर लिखें और पाठ पूरा होने पर उसका स्पष्टीकरण प्राप्त करें, 6.सामान्य शब्दों का ही अधिकाधिक प्रयोग करें, तथा शब्दों को ही अपना मार्गदर्शक बनाएं।
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विद्या के साथ मर जाना अच्छा है, परन्तु अयोग्य को विद्या नहीं देनी चाहिए, विद्या लेकर मूर्ख शिष्य शत्रु बन जाता है।
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गाय, भैंस तथा दासी-दास आदि जीवधन, कोई धन नहीं है, सुवर्ण आधा धन है, अनाज महाधन है, 'विद्या, ब्रह्मचर्य और मित्र' ये तीन धन से भी बढ़कर हैं।
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विद्वत्ता युवकों को संयमी बना देती है, विद्वत्ता बुढ़ापे का आराम है, विद्वत्ता निर्धनता में धन का काम देती है एवं विद्वत्ता धनवानों को आभूषण का काम देती है।
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जो मनुष्य प्रायश्चित्त, आयुर्वेद, ज्योतिष और धर्म की बात शास्त्र पढ़े विना कहता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।
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जो व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किये विना पदार्थों का विवेचन करना चाहता है, वह चन्द्रमा का चुम्बन करना चाहता है, सूर्य को ग्रहण करना चाहता है, चन्द्र और ताराओं से सहित आकाश को आच्छादित करना चाहता है और भुजाओं से अपार गहरे समुद्र को तैरना चाहता है।
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गलतियाँ हमें सीखने का अवसर देती हैं, उनसे सीखना बहुत जरूरी है, गलती को दुहराना सबसे बड़ी गलती है।
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स्वाध्याय के लाभ- तर्कणा, ब्रह्मचर्य, बुद्धि का उत्कर्ष, परमागम की परम्परा पुष्ट होती है, मन, इन्द्रियाँ और आहारादि संज्ञाओं का निरोध होता है, क्रोधादि कषायों का भेदन होता है, दिनों-दिन तप में वृद्धि होती है, संवेग भाव बढ़ता है, परिणाम प्रशस्त होते हैं, समस्त दोष दूर होते हैं, अन्य वादियों का भय नहीं रहता, जिनशासन की प्रभावना करने में समर्थ होता है।
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चोरी से नहीं सेवा वृत्ति से विद्या मिलती है।
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गुरू का शासन कठोर होता है, किन्तु गुरू स्वयं कठोर नहीं होते हैं।
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अविनय से पढ़ी विद्या और बेईमानी से कमाया धन अधिक समय नहीं टिकता है।
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इतिहास पढ़ने से मनुष्य बुद्धिमान बनता है तथा महान व्यक्ति किसी का अपमान नहीं करता है।
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