Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Humility

विनम्रता

456 सूत्र · पृष्ठ 6 / 7

दूसरों की प्रशंसा व उन्नति न देख पाना ईर्ष्या व असहिष्णुता का द्योतक है।
विनम्रता
बाहुबली का जरा सा मान केवलज्ञान होने में बाधक बना रहा।
विनम्रता
भ्रष्ट हुये चार हजार मुनि पुनः मुनि बन गये पर अहङ्कारी मारीच पुनः मुनि नहीं बन सका।
विनम्रता
अहङ्कारी की सोच छिपकली की तरह होती है, छत पर चिपक कर सोचती है, 'मेरी बदोलत छत टिकी है'।
विनम्रता
मुर्गा कहता है मैं बाङ्ग देता हूँ, तब सुबह होती है, इसी प्रकार संसारी प्राणी को भ्रम होता है कि वह पर का कर्ता है।
विनम्रता
दही बड़ा- पहले मैं दही के चरणों में पड़ा तभी तो बना दहीबड़ा, बड़ा ने बहुत परीक्षायें दी हैं तभी बड़ा बना है, जो फूलता है वह पिटता है जैसे दाल रात भर फूलती है तो घुटाई होती है।
विनम्रता
रूप का मद सनत चक्रवर्ती ने किया था तो शरीर में कुष्ट रोग हो गया था।
विनम्रता
जिसने अपने को कुछ माना सो पिटा- एक राजभवन में शिष्यों सहित साधु का आगमन हुआ, गुरू जी ने समझाया कि आज यहाँ विश्राम करना है, कोई आये तो कुछ बोलना नहीं, गुरूजी ध्यान में लीन हो गये, उसी वक्त राजा की सवारी आयी, राजा ने शिष्यों को पूँछा-तुम कौन हो ? उत्तर आया-साधु हैं, राजा ने उनको बाहर कर दिया, अन्त में गुरू के पास गये तो वे मौन हो गये कुछ बोले नहीं, राजा ने उनको कुछ नहीं कहा और चला गया।
विनम्रता
भरत चक्रवर्ती की प्रशस्ति- दिग्विजय के बाद भरत चक्रवर्ती अपने प्रथम चक्रवर्ती होने की प्रशस्ति लिखने के लिए वृषभाचल पर्वत के पास जब गये, तो वहाँ उन्होंने देखा कि पूरा पर्वत...
विनम्रता
जीवन के विकास के लिये अहं का विसर्जन अनिवार्य है, यदि अहं करना है तो अपने स्वरूप का करो, तो अहं से अर्हं बन जाओगे, अहं के साथ कार जुड़ा तो दुःखी रहोगे एवं उत्तम मार्दव धर्म को पालने वाला व्यक्ति महान होता है।
विनम्रता
जो कोमल होता है वह स्थायी होता है जैसे जीभ, और जो कठोर होता है वह जल्दी नष्ट हो जाता है जैसे दाँत।
विनम्रता
लोक में उन्हीं का धन आदि पाना सार्थक है जिनके पास मार्दव गुण हैं।
विनम्रता
मद नष्ट होने से विनय, मिष्ट वचन, पूज्यों का सत्कार, दान, सम्मान आदिगुण प्राप्त होते हैं।
विनम्रता
धर्म सबसे पहले झुकने का पाठ सिखाता हैं, फल से लदे वृक्ष की तरह गुणवान व्यक्ति नम्र होता है।
विनम्रता
मान भङ्ग होने पर मूर्ख आत्म घात कर लेता है और ज्ञानी वैराग्य धारण कर लेता है।
विनम्रता
नम्रता का प्रभाव दूर तक जाता है और कुछ खर्च भी नहीं होता है।
विनम्रता
विनम्रता से सम्यग्दर्शन उज्ज्वल होता है व यश बढ़ता है और बैर का अभाव होता है।
विनम्रता
मार्दव भावना से युक्त शिष्य पर गुरुओं की कृपा रहती है, साधु भी उसे साधु मानते हैं, जिससे वह सम्यग्ज्ञान आदि का पात्र होता है, सम्यग्ज्ञान आदि का पात्र होने से स्वर्ग और मोक्ष रुपी फल की प्राप्ति होती है।
विनम्रता
अहङ्कार से अनेक कुबुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं और मार्दव से अनेक विद्यायें प्राप्त होती हैं।
विनम्रता
अभिमानी पिता से पुत्र, पुत्र से पिता, गुरू से शिष्य, शिष्य से गुरू, स्वामी से सेवक, सेवक से स्वामी दूर हो जाते हैं, एवं विनयवान, पुत्र, शिष्य और सेवक को देख कर पिता, गुरू और स्वामी प्रसन्न होते हैं, जिनके मस्तक पर गुरु का हाथ होता है वे धन्य होते हैं।
विनम्रता
कलिकाल में कामदेव का साम्राज्य रहता है, कब कहाँ किसका मन विकृत होकर ब्रह्मचर्य को दूषित कर दे इसका कोई ठिकाना नहीं है, अतः जाति कुल का अभिमान व्यर्थ है।
विनम्रता
ऊँट को अपनी ऊँचाई का भान पहाड़ के नीचे आने पर होता है, अहङ्कारी को अपने से बड़े के पास आने पर अपनी औकात का भान होता है।
विनम्रता
कोयल मेंढक- कोयल आम्र मञ्जरी का आस्वादन करके भी घमण्ड नहीं करती, मेंढक कीचड़ के पानी को पीकर भी टर्राने लगता है।
विनम्रता
सारी दुनिया को पानी पिलाने वाला भी प्यासा मर सकता है (जैसे श्री कृष्ण जी) फिर अहङ्कार किस बात का?
विनम्रता
विनय गुण- जैसे व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को छाती से लगाकर रखता है, उसी प्रकार विनीत पुरुष त्रियोग से आत्मा में विनय गुण को छाती से लगाकर रखता है, विनय को अपनी मूल सम्पत्ति समझकर गुरूजनों के प्रति आदर करता है।
विनम्रता
जिस मस्तक को पैसों में तो क्या फ्री में भी कोई अपने घर में नहीं रखना चाहता है, वह मस्तक अगर पूज्य जनों के चरणों में झुक जाए तो क्या कम होने वाला है।
विनम्रता
कुएँ में जब बर्तन झुकता है, तब पानी भरता है अन्यथा नहीं, अतः कुछ पाने के लिए झुकना आवश्यक है।
विनम्रता
छोटे-बड़े का भाव मान है और समानता का भाव मार्दव है।
विनम्रता
विनय के विमान में बैठोगे तो कल्याण होगा और अहङ्कार की कार में बैठोगे तो अधो गमन होगा।
विनम्रता
स्वयं के शरीर व इन्द्रियों को उनके प्रतिकूल परिणमा नहीं सकता, तो भी पर का कर्ता बनना चाहता है।
विनम्रता
मानी असफलता में क्रोध व सफलता में मान करता है, असफलता में दूसरों को दोष देता है, और सफलता में स्वयं श्रेय लेता तथा घमण्ड करता है।
विनम्रता
ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और रूप इन आठों चीजों से सम्पन्न व्यक्तियों को भी मान हो सकता है, एवं आठों से रहित को भी मान हो सकता है।
विनम्रता
उत्तम पुरूष बालक में, वृद्ध में, निर्धन में और जाति, कुल आदि से हीन में भी यथायोग्य, प्रियवचन, आदर, सत्कार, स्थान दानादि देने में कभी नहीं चूकते हैं।
विनम्रता
उत्तम पुरूष अहङ्कार पूर्ण वस्त्र आभरणादि नहीं पहनते दूसरों के अपमान का कारण लेन-देन विवाह आदि व्यवहार भी नहीं करते हैं।
विनम्रता
उत्तम पुरुष अहङ्कार युक्त होकर चलना, बोलना, बैठना, झाँकना आदि कार्य नहीं करते हैं।
विनम्रता
माईक वाले ने कहा हम माईक न लगाते तो सभा न होती, पर उसे ध्यान नहीं कि मेरे अलावा परोक्ष में कितने लोगो का हाथ है, जैसे बिजली, पॉवर हाउस एवं जहाँ पर बिजली बनती है इत्यादि, इसी प्रकार वह अन्य कार्यों के बारे में भी नहीं सोचता है।
विनम्रता
दो हाथ, दो पैर, सिर, सीना, पीठ, पुट्ठा, इन आठों अङ्गों को पाने की सार्थकता मृदुता से हो सकती है, अन्याय से नहीं।
विनम्रता
कठोर वृक्ष नदी की बाढ़ में उखड़ जाते हैं, किन्तु कोमल बेंत झुक जाते हैं और पुनः लहराने लगते हैं, इसीप्रकार अहङ्कारी नष्ट हो जाते हैं और विनम्र व्यक्ति उन्नति करते हैं।
विनम्रता
छहों द्रव्य परस्पर उपकार करते हैं किन्तु अहङ्कारी अपने को पर का कर्ता मानता है।
विनम्रता
गामा पहलवान एक हाथ से भरी बस रोक देता था, पर अन्त समय में चेहरे की मक्खी भी उड़ाने में असमर्थ था।
विनम्रता
जब देव मरकर एकेंद्रिय और चक्रवर्ती मरकर सप्तम नरक का नारकी हो सकता है, तब किसका गर्व किया जाए।
विनम्रता
ज्ञान, दर्शन, चारित्र और उपचार के भेद से विनय के चार भेद हैं।
विनम्रता
जहाँ नम्रता से कार्य निकल आये, वहाँ उग्रता नहीं दिखानी चाहिए।
विनम्रता
अहङ्कार का अर्थ- योग्यता से अधिक प्रशंसा चाहना है। अभिमान का अर्थ- योग्यता के अभाव में प्रशंसा चाहना है। स्वाभिमान का अर्थ- जितनी योग्यता उतनी प्रशंसा चाहना है। निरभिमान का अर्थ- अपमान होने पर भी विकल्प नहीं करना है।
विनम्रता
भाव विशुद्ध हुये विना कैसा त्याग विराग। मान करो मत त्याग का, करो मान का त्याग।
विनम्रता
नानक नन्हे बने रहो, जैसे नन्ही दूब। बड़े झाड़ कट जात हैं, बनी रहत है दूब।।
विनम्रता
लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर, चींटीं ले शक्कर चले हाथी के शिर धूर। लघुता से प्रभूता मिले, प्रभूता से प्रभु दूर, जो प्रभु होना चाहते, लघुता धार जरूर।।
विनम्रता
जो मानता स्वयं को सबसे बड़ा है। वह धर्म से बहुत दूर अभी खड़ा है।।
विनम्रता
जब तलक दम था, झुके न आसमाँ से हम। जब दम निकल गया, तो जमीं ने दबा दिया।
विनम्रता
पत्थर अहम् का क्या करें गलता नहीं है, सब दिये जलते मगर दिल का दिया जलता नहीं है। खोजते-खोजते ढ़ल जाती है जीवन की शाम, सबका पता मिलता मगर खुद का पता मिलता नहीं है।।
विनम्रता
जो गुरू का भक्त हो, संसार से भयभीत हो, विनम्र हो, धार्मिक हो, अच्छी बुद्धि वाला हो, शान्त मन वाला हो, आलस्य रहित हो और सभ्य हो वह शिष्य माना जाता है।
विनम्रता
जब मैं थोड़ा जानकार हुआ तो हाथी की तरह मद से अन्धा हो गया और अपने आप को सर्वज्ञ समझने लगा, किन्तु जब मैंने ज्ञानी जनों की थोड़ी-थोड़ी सङ्गति की तो लगा कि मैं मूर्ख हूँ और तब मेरा अहङ्कार रूपी ज्वर शीघ्र ही उतर गया।
विनम्रता
ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और शरीर को माध्यम बनाकर अहङ्कार करने को जिनेन्द्र भगवान मद कहते हैं।
विनम्रता
फलवान वृक्ष नम्र होते हैं, गुणवान मनुष्य नम्र होते हैं, सूखे वृक्ष और मूर्ख कभी नहीं झुकते हैं।
विनम्रता
ज्ञान मद- बनारस से पढ़कर आया युवक नाव पर सवार होकर स्वगृह की ओर जाते हुये नाविक से पूँछने लगा 'आपने इंग्लिश पढ़ी है'? नाविक ने कहा 'नहीं', युवक ने कहा 'तब तुम्हारी पच्चीस प्रतिशत जिन्दगी बेकार' है, युवक ने पुनः पूँछा 'आपने संस्कृत पढ़ी है?' नाविक ने कहा 'नहीं', युवक बोला 'तब तो तुम्हारी पचास प्रतिशत जिन्दगी बेकार' है, नाव आगे बढ़ी तूफान आया, नाविक ने पूँछा 'आप तैरना जानते हो?', युवक ने कहा 'नहीं', नाविक बोला 'तब तो आपकी सौ प्रतिशत जिन्दगी बेकार है', इसलिये किसी भी विद्या का अहङ्कार नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
अहङ्कार रुपी लङ्गर नही खोला- भूले भटके शराबी रात भर नाव खेते रहे किन्तु सुबह देखा तो वहीं थे, नाविक ने कहा नाव का लङ्गर नहीं खोला, अतः आगे नहीं बढ़े, इसी तरह मानव ने अहङ्कार रूपी लङ्गर नहीं खोला, इसलिए संसार में ही भटक रहा है।
विनम्रता
मन्दिर बनाने का मान नहीं- हस्तिनापुर में एक सेठ ने मन्दिर बनवाया, जब मन्दिर पूरा बन गया एवं कुछ काम और शेष था, तब सेठजी ने समाज की एक बैठक बुलाई और समाज से कहा कि अब इस मन्दिर का काम पूरी समाज को पूर्ण करना है, आगे मेरी शक्ति नहीं है, पूरा मन्दिर बनवाने के बाद विनाअहम् के मन्दिर समाज को सौंप दिया उस मन्दिर में सेठजी का कहीं पर नाम भी नहीं है, यह मान कषाय के मर्दन करने का तरीका है।
विनम्रता
रुपमद- लक्ष्मीमती नामक एक कन्या रूप गुण का मानों भण्डार ही थी उसने मुनिराज के मलिन शरीर को देखकर भक्ति तो नहीं की किन्तु निन्दा करने लगी, इतना ही नहीं रूप के घमण्ड वश मुनिराज के शरीर पर थूँक भी दिया। इस घोर पाप के फल से उसके शरीर में सात दिन के बाद उदुम्बर कुष्ट हो गया, उसके घृणित शरीर में कीड़े पड़ गये, आर्तध्यान से मरण कर तिर्यञ्चयोनी को प्राप्त हुयी। कई भवों के बाद वह दरिद्रा नाम की एक कन्या हुयी, पाप के उदय से उसके शरीर से बदबू आती थी, उसको कोई अपने पास रखने को तैयार नहीं था, तब नगर के बाहर एक नदी के पास छोड़ दिया, वहाँ से मुनिराज का विहार हुआ उनके दर्शन करके अपने दुःखों के अन्त होने का उपाय पूँछा, महाराज ने धर्मोपदेश दिया पूर्व भवों के दुष्कृत का वर्णन किया, जिसे सुनकर उसे पश्चात्ताप हुआ, एवं अहिंसादि व्रतों के पालन करने का नियम लिया, जिसके फल से अगले भव में श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मणी हुई।
विनम्रता
जुआँरी, पुजारी, कमाऊ, अंधा चार पूत- एक सेठ के चार लड़के थे, उनमें बड़ा लड़का कमाऊ पूत था, दूसरा ज्वारी, तीसरा पुजारी और चौथा अंधा था, बड़े लड़के की पत्नि ने पति को भड़काया आप कमाते हो सब खाते हैं, हम लोग सभी अलग हो जाते हैं। यह बात पिताजी से कही, पिताजी ने कहा बेटा अलग होने के पहले हम लोग तीर्थ यात्रा कर लेते हैं, सब मिलकर तीर्थ को जाते हैं, पहुँचकर पिताजी ने क्रम-क्रम से बच्चों को दस-दस रुपये देकर रसोई की सामग्री लेने भेजा, बड़ा लड़का व्यापार करके दस के पन्द्रह कर लेता है, और सामग्री ले आता है, जुआरी जुआ खेल कर भाग्य से दस के बीस कर लेता है, और सामग्री ले आता है, तीसरा बेटा दस रूपए का दीपक लेता है और भगवान् की आरती करके कहता है आपको ही हमारी व्यवस्था बनाना है, तो वहाँ का रक्षक देव सोचता है धर्म के प्रति इतनी आस्था है यदि इसकी व्यवस्था नहीं बनायेंगे तो लोगो की धर्म के प्रति आस्था नहीं रहेगी, और वह देव गाड़ी भर सामान भेज देता है, सब बच्चे अपने-अपने पुरूषार्थ से रसोई का सामान लाते हैं, सबके भाग्य की परीक्षा आज होती है, तो बड़े लड़के का अहङ्कार चूर हो जाता है, कि सबसे बड़ा अभागा तो मैं ही हूँ।
विनम्रता
विद्या गुरु को ऊपर बैठाना- एक बार एक भील की स्त्री को दोहला हुआ कि मुझे आम खाने को मिल जाय, लेकिन उस समय आम का मौसम नहीं था, फिर भी तीव्र इच्छा हुयी भील से अपनी भावना व्यक्त की, भील ने सारे जङ्गल को खोज डाला लेकिन कहीं पर भी आम नहीं मिला, भील को मालूम हुआ, कि राजा श्रेणिक के बगीचे में इस समय आम उपलब्ध हैं। वह अन्तर्धान नामक विद्या के माध्यम से बगीचे से आम ले आया, रोज आम लाता लेकिन पहरेदार पकड़ नहीं पाते, एक दिन भील पकड़ा गया, राजा के सामने उपस्थित किया, राजा उसकी विद्या पर प्रसन्न हुआ, और राजा ने कहा कि तू अपनी विद्या हमें सिखा दे तो मैं तुझे छोड़ दूँगा। भील तैयार हो गया। बहुत देर तक विद्या सिखाता रहा लेकिन राजा सफल नहीं हुआ, तभी अभय कुमार निकले उन्होंने कहा, राजन! गुरू को ऊपर विठाओ और आप नीचे बैठों तब विद्या सिद्ध होगी।
विनम्रता
जिनेन्द्रवर्णी जी आचार्यश्री विद्यासागर जी के दर्शन करने के लिए रामटेक आये और पीछे बैठ गये, आचार्यश्री ने पहले कभी उनको देखा नहीं था, सभा के बाद उनका परिचय कराया, तब वर्णीजी आचार्यश्री के चरणों में लोट गये, आचार्यश्री ने कहा थोड़ा आप बोलो तब वर्णीजी ने कहा ''मैं छोटा सा कीड़ा आपके सामने कैसे बोलूँ'' ये उनकी विनम्रता थी।
विनम्रता
जिनेन्द्र वर्णी विनय की मूर्ति- जिनेन्द्रवर्णीजी आचार्यश्री के पास जब सल्लेखना लेने के लिए ईसरी सन् 1983 में आये, उस समय आचार्यश्री स्वाध्याय करा रहे थे, किसी विषय का अर्थ अस्पष्ट था, तब क्षमासागरजी ने वर्णी जी से कहा कि आपके पास इसका समाधान है?, वर्णीजी ने कहा! हाँ, क्षमा सागर जी बोले! फिर आप इतनी देर से मौन क्यों हैं? तब वर्णी जी बोले कि इतने बड़े आचार्य के सामने मैं नगण्य कैसे बोलता।
विनम्रता
जैसे को तैसा- एक राजा लङ्गड़ा था, और अहङ्कारी भी था, एक बार राज दरबार में सूरदास जी भजन सुनाने आये, राजा ने पूँछा तुम्हारा नाम क्या है? उसने उत्तर दिया- दौलत! राजा ने व्यङ्ग किया- क्या दौलत भी अन्धी होती है? सूरदास जी ने कहा यदि अन्धी नहीं होती तो लङ्गड़े के पास क्यों आती, राजा का अहङ्कार चूर-चूर हो गया, अतः किसी को अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए।
विनम्रता
जो वचनों से न कह कर चेष्टा से अपने गुणों का बखान करता है वह गुणवानों में भी श्रेष्ठ माना जाता है।
विनम्रता
पर की निन्दा सरल है, कठिन स्वयं की जान। जो अपनी निन्दा करे, जग में वही महान।।
विनम्रता
विद्वान् को अर्थपति, खजाञ्ची, राजा, अपने से अधिक विद्वान्, अधिक तपस्वी, बहुसङ्ख्या में उपस्थित मूर्ख, शत्रु तथा गुरुओं को उत्तर नहीं देना चाहिए अर्थात् उनकी डाँट को चुपचाप सहन कर लेना चाहिए।
विनम्रता
विनय-'विलयं नयति कर्म मलं इति विनयः' जो कर्म मल का नाश करती है उसे विनय कहते हैं।
विनम्रता
विनय ऐसी तलवार है, कि अपने माथे पर चलाता है और शत्रु की गर्दन कटती है।
विनम्रता
विनय भी आभ्यन्तर तप है, विनयी शिष्य की गुरू भी प्रशंसा करते हैं।
विनम्रता
नींव का पत्थर अदृश्य रहकर दृश्य को कायम रखता है, कभी बोलता नहीं, कर्तव्य निभाता है, उसका अभिशाप है कि नींव के पत्थर को न माल्यार्पण, न शॉल सम्मान, केवल निःस्वार्थ स्वान्त सुख है।
विनम्रता
अनाथपने का बोध- वन में घूमते हुये श्रेणिक ने मुनिराज को शिलातल पर विराजे हुये देखकर कहा, आपका कोई संरक्षक नहीं है, अनाथ हो तो मेरे राज में चलो? मुनिराज ने कहा राजन्! एक बार मैं बीमार पड़गया था, मेरा दुःख कोई बटा नहीं सका, अतः स्वयं का नाथ बनने आया हूँ, तब राजा को अपने अनाथपने का बोध हुआ था और अहङ्कार चूर हो गया था।
विनम्रता
प्रशंसा की इच्छा से कोई भी कार्य शुरू करना अपने-आप को पतित करने की कला है।
विनम्रता
आचार्य शिवसागर जी ने स्वाध्याय किया, पण्डित पन्नालाल जी शास्त्र विराजमान करने गये तो आचार्यश्रीजी पीछे से आये और कहा! रुको, उन्होंने मार्जन किया, फिर शास्त्र जी विराजमान किया और कहा! प्रतिष्ठापन समिति हमारी है भैया।
विनम्रता
हम दूसरों को उपदेश देने में चतुर हैं, स्वयं करने में असमर्थ हैं, केवल वेष बना लिया और पर को उपदेश देकर महान बनने का प्रयत्न करते हैं, यह सब मोह की महिमा है।
विनम्रता
गुरु से हूँ-हूँ तू-तू करके बात करना और विद्वान या साधु को विवाद करके नीचा दिखने वाला श्मशान में वृक्ष होता है, जिस पर कौए और गिद्ध बैठते हैं।
विनम्रता