Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Humility

विनम्रता

456 सूत्र · पृष्ठ 5 / 7

सेठ ने दो विद्वानों को प्रवचनार्थ बुलाया और अलग-अलग एक-दूसरे का परिचय पूछा, एक ने कहा वह पक्का बैल है, दूसरे ने कहा वह पक्का गधा है, सेठजी ने भोजन के समय दोनों को घास-भूसा का भोजन परोस दिया, विद्वानों के पूँछने पर सेठजी ने कहा! आप लोगों ने जैसा परिचय दिया वैसा हमने भोजन परोस दिया, दोनों विद्वान् लज्जा से नतमस्तक हो गए और ईर्ष्या छोड़ दी।
विनम्रता
'हम पुण्यवान् हैं, जिन्हें मुनि आज्ञा देते हैं' ऐसा विचार कर बुद्धिमानों को मुनियों की आज्ञा का पालन करना चाहिए।
विनम्रता
योगियों के हित-अहित का विचार करने वाले पुरुष के मानसिक विनय होती है, उससे सिद्धि की प्राप्ति होती है।
विनम्रता
दिल जीतना है तो बड़ों का आशीर्वाद लेना और छोटों को प्यार देना सीख लें।
विनम्रता
सादगी से बढ़कर कोई श्रृङ्गार नहीं है और विनम्रता से बढ़कर कोई व्यवहार नहीं है।
विनम्रता
त्याग, विद्या तथा विवेक ये तीन गुण जिसके पास हैं, पर अहङ्कार नहीं है तो मेरा उसके लिए नमस्कार हो।
विनम्रता
निरन्तर वृद्धजनों (गुणवानों) की सेवा और अभिवादन करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल ये चार वस्तुएँ वृद्धि को प्राप्त होती हैं।
विनम्रता
विद्वान् के आगे अपने गुण नहीं कहना चाहिए क्योंकि वह स्वयं जानता है, और मूर्ख के आगे भी अपने गुण नहीं कहना चाहिए, क्योंकि वह विद्वानों के द्वारा कहे हुए गुणों को समझता ही नहीं है।
विनम्रता
कर्म करने में अहङ्कार की भावना का त्याग- कर्तव्य समझकर उपकार करें, बदले में अपेक्षा न रखें।
विनम्रता
अहम् त्यागिये- आपके विना भी संसार चल सकता है, संसार रूपी इस महान विद्यालय में कुछ प्रशिक्षण पाने के लिए आपका एक अस्थायी पड़ाव है, कोई महान कार्य करके आप मूल रूप से स्वयं अपनी सहायता कर रहे हैं, संसार की नहीं।
विनम्रता
समय या परिस्थिति के अनुसार इन वाक्यों का प्रयोग करने में संकोच न करिये, कि 'मुझे खेद है', 'मुझसे गलती हो गयी', 'मुझे सहायता की आवश्यकता है' या 'मुझे मालूम नहीं', 'क्षमा करें' इत्यादि।
विनम्रता
व्यवहार और बातचीत में आत्मकेन्द्रित होने से बचिए- बातचीत में 'मुझे, मैं, मेरा' इत्यादि अहम् पूर्ण कथन नहीं होना चाहिए, जब असल में चेतन का विस्तार हो जाता है तो केवल अपने लिए कार्य करने और जीवित रहने का विचार बिल्कुल अर्थ हीन लगने लगता है।
विनम्रता
विनम्र बनें- सबसे अधिक महान व्यक्ति वह है जो सबका सेवक है, महान व्यक्ति जैसे-जैसे अधिक धन, सम्मान, शक्ति, प्रतिष्ठा पाते हैं, वैसे-वैसे अधिक विनम्र बनते जाते हैं, अहङ्कार करना अविकसित व अस्वस्थ मन की निशानी है, घमण्ड और अक्खड़पन से व्यक्ति निश्चय से पतन की ओर जाता है, वास्तविक महानता गुणों और विशेषताओं से आती है न कि पद या धन से, वही शासन करने योग्य है, जो मुकुटको विना इच्छा के पहनता है।
विनम्रता
अपने से बुजुर्ग आगन्तुक का स्वागत करते हुए खड़े हो जाइए।
विनम्रता
किसी के द्वारा दी गई सहायता के लिए उनके प्रति आभार तथा कृतज्ञता प्रकट कीजिए।
विनम्रता
जिसके पास निर्दोष विनय है, कल्पवृक्ष उसका सेवक है, चिन्तामणि रत्न उसके हाथ में है और यक्ष उसके पास रहता है।
विनम्रता
विनय मुक्ति का कारण है, विनय लक्ष्मी का कारण है, विनय प्रीति का कारण है और विनय बुद्धि का भी कारण है, विनय के विना विजय नहीं होती है।
विनम्रता
मोक्ष को प्राप्त कराती है वह विनय है, विनय से सब प्रकार के कल्याण नियम से प्राप्त होते हैं, 'विद्या ददाति विनयं' जब सामान्य विद्या विनय को देती है तो जिनवाणी के अध्ययन से तो विनय आना ही चाहिए, क्योंकि जिनवाणी में सद्गुणों का ही कथन है, मनुष्य पर्याय का सार जिन मुद्रा धारण करना है, जिनवाणी की शिक्षा सम्यक् विनय से समाधि आदि गुण प्राप्त होते हैं, विनयसम्पन्नता, विनयतप, मार्दव धर्मादि प्राप्त होते हैं।
विनम्रता
फल युक्त वृक्ष और कुलीन मनुष्य नम्र होते हैं परन्तु सूखी लकड़ी और मूर्ख कभी नम्र नहीं होते हैं।
विनम्रता
शिक्षाहीन साधु का बहुरूपिया के समान वेष धारण करना आत्म विडम्बना है और विनयहीन मनुष्य की शिक्षा भी दुर्जन की मित्रता के समान खोटा फल देने वाली है।
विनम्रता
जितेन्द्रियपना विनय का कारण है, विनय से गुणों की वृद्धि होती है, अधिक गुणवान पुरुष में जनसमूह अनुरक्त होता है और जनसमूह के अनुराग से सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।
विनम्रता
अपने प्रति कठोर बनें एवं दूसरों के दोषों तथा कमियों के प्रति उदार बनें।
विनम्रता
आँख की पुतली से यह शिक्षा मिलती है कि छोटों से बड़ा काम निकलता है इसलिए छोटों का ध्यान रखना चाहिए।
विनम्रता
दूसरों को सम्मान देना और झगड़े से दूर रहना ये आत्म रक्षा के अचूक मन्त्र हैं।
विनम्रता
अपनी गलती महसूस करें तो माफी मांगे अपनी सफाई पेश न करें।
विनम्रता
गलती स्वीकार करने से दूसरा व्यक्ति विनम्र हो जाता है।
विनम्रता
जन्म के समय ढाई किलो वजन होता है, चिता की राख भी ढाई किलो होती है, फिर ढाई दिन की उपलब्धि पर इतना अहङ्कार क्यों? त्याग में अपने से बड़े को देखिए और सजग होइये।
विनम्रता
अपनी विद्वत्ता पर अभिमान करना सबसे बड़ा अज्ञान है।
विनम्रता
बड़ा वही है जो अपने को सबसे छोटा मानता है, शूट-बूट और ठाट-बाट में बड़प्पन नहीं होता, जिसकी आत्मा पवित्र है वह बड़ा है। सच्ची बड़ाई उसी की है जिसकी शत्रु भी सराहना करते है।
विनम्रता
आदर देना भी जीवन देने के समान है, आदर में बनावटीपना नहीं होना चाहिये।
विनम्रता
यदि शत्रु सता रहा हो तो भी विनम्रता मत छोड़ो, क्योंकि धनुष झुकता है तो बाण दूर तक जाता है।
विनम्रता
सफलता का श्रेय औरों को दें और गलतियों की जिम्मेदारी स्वयं लें।
विनम्रता
पद, सत्ता या पुरस्कार की आकाङ्क्षा न कर उसके योग्य बनने का प्रयत्न करें।
विनम्रता
यश की चाह और अहं का पोषण दोनों एक साथ जीवित नहीं रह सकते हैं।
विनम्रता
महान् वही होता है जिसमें विनम्रता होती है। जीवन में प्रतिक्रिया नहीं, समीक्षा करना सीखें।
विनम्रता
साधु के पास हाथ बाँधकर नहीं, जोड़कर जाना चाहिए, हाथ जोड़कर जाने से श्रावक और
विनम्रता
विनय को विवेक का प्रकाश चाहिये, तत्काल उद्विग्न होना अविवेक है।
विनम्रता
कृतज्ञता मनुष्यता की जननी है और कल्याण का मार्ग निरीह वृत्ति है।
विनम्रता
नम्रता वह जादुई पिटारा है जिसके खुलते ही चित्त में चाहत व लोकप्रियता बढ़ने लगती है।
विनम्रता
अपनी कार्य कुशलता की डींग न हाके।
विनम्रता
क्या आप वस्त्र आभूषण दूसरों के दिखाने के लिए पहनते हैं?
विनम्रता
क्या कभी आपसे छोटे लोगों ने आपकी कोई गल्ती पकड़ी है?
विनम्रता
क्या आप मूर्खों की चापलूसी से प्रसन्न रहते हैं?
विनम्रता
क्या आप अपने से बड़े लोगों की विनय करते हैं?
विनम्रता
क्या आप दूसरों के प्रति कृतज्ञता रखते हैं?
विनम्रता
क्या आप अपने किए हुए अहसान को भूल जाते हैं?
विनम्रता
सत्पुरुष अपने असंख्य गुणों से भी सन्तुष्ट नहीं होते हैं पर दूसरों में स्थित अल्पगुणों से भी प्रसन्न रहते हैं, उनकी यह चेष्टा आश्चर्यकारी है।
विनम्रता
सज्जन पुरुष अपने गुण और दूसरों के दोष नहीं कहते हैं और किसी के कुछ माँगने पर मना नहीं करते हैं।
विनम्रता
बड़ों के सामने बड़े बनोगे तो विरोध होगा, छोटे बनकर के रहोगे तो आशीष मिलेगा।
विनम्रता
कथनी बिन करनी करे, ज्ञानीजन दिन रात। निजी बढ़ाई के विना, जैसे मुह में दाँत।।
विनम्रता
एक राजा जङ्गल में सैर करने गया, अचानक आँधी तूफ़ान आने से सभी सैनिक-साथी बिछुड़ गये, छाया पाने की इच्छा से राजा एक महात्मा की झोपड़ी में गया, महात्मा लेटा हुआ था, राजा को देखकर बैठ गया, सोचा बैठने से दो लोग बन जायेंगे, इतने में पानी में भीगता हुआ एक गधा भी आ गया, महात्मा बोले राजन्! हम लोग खड़े हो जाते हैं, जिससे ये गधा भी झोपड़ी के अन्दर आ जायगा, राजा ने कहा! क्या करते हो गधे को भी झोपड़ी के अन्दर? महात्मा ने कहा राजन्! ये साधु की झोपड़ी है यहाँ गधों से भी मनुष्यों जैसा व्यवहार किया जाता है, ये रईसों की कोठी नहीं है जहाँ मनुष्यों से भी गधों जैसा व्यवहार किया जाता है।
विनम्रता
सेठ छिदामीलाल जी से फिरोजाबाद में आयकर अधिकारी ने पूँछा सेठजी इतना पैसा इस मन्दिर में लगाया, इसके बदले में नई फैक्ट्री खुल जाती सेठजी ने उत्तर दिया यदि एक फैक्ट्री और लगाता, तो मुर्दाबाद के नारे लगते, मन्दिर बन गया तो सब धन्यबाद देते हैं, फिर मैं कौन सा मन्दिर बनाने वाला हूँ, मैंने तो इस फैक्ट्री के मजदूरों से प्राप्त पैसे को मन्दिर बनाने वाले शिल्पियों मजदूरों को बाँट दिया, मैं तो इधर का पैसा उधर वितरित करने वाला हूँ, यह निरभिमानता है।
विनम्रता
सेठ हरजस राय दिल्ली वालों ने विधान के बाद पूरी समाज को लड्डू बँटवाये, एक गरीब ने लड्डू नहीं लिये, मुनीम ने सेठ को खबर दी, कि गरीब ने कहा है कि हम सेठ को खिला नहीं सकते तो उनकी भेंट कैसे लेवें? सेठ जी दूसरे दिन बग्घी पर सवार होकर उसकी दुकान की ओर गये, वह हाथ ठेला पर चना-मूंगफली बेचता था, सेठ ने उसकी बरनी में से चना-मूंगफली निकाल कर खा लिये, पानी पिया और कहा भैया अब हमारी भेंट स्वीकार करो, हमने तुम्हारे यहाँ खा लिया, यह उदारता कहलाती है।
विनम्रता
साधु पुरूषों के प्रति शिष्टाचार का परित्याग कभी नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
रामचन्द्रजी ने आभार- जब रामचन्द्रजी दिग्विजय करके अयोध्या को वापस आये तब उन्होंने सब सहयोगियों के लिये कृतज्ञता ज्ञापित की, जब हनुमानजी का क्रम आया, तब रामचन्द्रजी ने कहा-हे हनुमन्त ! तुमने जो आज तक उपकार किया है उसके लिये मैं आभारी हूँ लेकिन मैं चाहता हूँ आपका उपकार न करूँ, इस वाक्य को सुनकर लोग आश्चर्य चकित हुये, किन्तु हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुये, तब लोगों ने हनुमान जी से पूँछा आप लोगों की भाषा हम लोगों के समझ में नहीं आयी कृपया कर समाधान करें, तब हनुमान जी ने कहा कि रामचन्द्र जी यह कह रहे हैं कि आपको कभी कष्ट ही न आये।
विनम्रता
मान कषाय को चार गति का कारण कहा है- पत्थर की तरह मान नरकगतिका कारण है, हड्डी की तरह मान तिर्यंचगति का कारण है, लकड़ी की तरह मान मनुष्यगति का कारण है और हरे वेंत की तरह मान देवगति का कारण है।
विनम्रता
बल का मान कियो रावण ने, सोने की लंका नशानी। तन का मान किया दुर्योधन ने, मिट्टी में मिल गई जवानी।। तप का मान कमठ ने कीना, नरक की राह दिखानी। ज्ञान का मान किया गौतम ने, झुकने पड़ो ऋषिज्ञानी।। दान का मान कियो बलि राजा, पीठ पड़ी नपवानी। काहु को मान रहो न पुजारी, काहे करे लघु प्राणी।।
विनम्रता
राजा की आज्ञा का भङ्ग करना, पूज्य पुरुषों का अपमान करना और स्त्रियों की पृथक् शैय्या करना विना शस्त्र का वध माना जाता है।
विनम्रता
क्रोधी क्रोध के निमित्त को हटाना चाहता है, पर मानी मान के निमित्तों को रखना चाहता है। क्रोधी कहता है गोली से उड़ा दो, पर मानी कहता है मारो मत, दबा के रखो।
विनम्रता
प्रतिकूलता में क्रोध और अनुकूलता में मान आता है।
विनम्रता
कर्तृत्व बुद्धि, भोक्तृत्वबुद्धि और स्वामित्वबुद्धि- अज्ञानी अपने को पर पदार्थ का कर्ता मानता है। जैसे कुत्ता गाड़ी के नीचे चलता है तो मानता है कि 'मैं गाड़ी चला रहा हूँ', पर उसे नहीं मालूम कि गाड़ी चलाने वाला कोई दूसरा है यही कर्तृत्व बुद्धि कहलाती है। इसी प्रकार पर पदार्थ का अपने को भोक्ता मानता है, मकान, दुकान आदि का अपने को स्वामी मानता है, जैसा की छः ढाला में कहा है 'मैं सुखी-दुःखी मैं रङ्क राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव' इत्यादि।
विनम्रता
जिनका शारीरिक स्वास्थ्य कमजोर होता है, उन्हे ठण्डी हवा से जुकाम और गरम हवा से लू लग जाती है। उसी प्रकार निन्दा की गर्म हवा से क्रोध की लू व प्रशंसा की ठण्डी हवा से मान का जुकाम हो जाता है।
विनम्रता
अकड़ मुर्दे की खास पहचान है, जो जितना अकड़ता है, यमराज उसे उतने ही जल्दी पकड़ता है।
विनम्रता
कभी मूँछ का तो कभी पूँछ का झगड़ा बना ही रहता है, अर्थात् कभी कहता है कि मेरी इज्जत का सवाल है, कभी कहता है मुझे पूँछा ही नहीं।
विनम्रता
फुटबाल में जब तक हवा रहती तब तक लोग लात मारते हैं, और जब हवा निकल जाती है तो हाथ में उठा लेते हैं, अतः अकड़ ही संसार भ्रमण का कारण है।
विनम्रता
मान मानी को लोगो की दृष्टि में अप्रिय बनाता है और अन्दर से मानी को अयोग्य बनाता है।
विनम्रता
मान मानव की मानवता नष्ट करके दानव बना देता है।
विनम्रता
दूसरों को नीचा दिखाना और अपने को ऊँचा दिखाना मानी का काम है।
विनम्रता
अभिमानी के निरपराधी होने पर भी अनेक बैरी होते हैं, निन्दा होती है, सब उसका पतन चाहते हैंतथा हृदय में कोमलता न आने का कारण अहङ्कार है।
विनम्रता
जिससे स्वार्थ सधता है उसको भगवान मानते हैं, जिससे स्वार्थ नहीं सधता है तो भाई भी शत्रु लगता है।
विनम्रता
पुण्योदय का अहङ्कार करने वाले अन्त में बड़े-बड़े कष्ट पाते हैं।
विनम्रता
अभिमान और दीनता दोनों में अकड़ है, मानी पीछे को और दीन आगे को झुकता है, सीधे दोनों नहीं होते हैं।
विनम्रता
मानी ऐसा चलता है जैसे वह चौड़ा हो और बाजार सकरा हो और दीन ऐसे चलता है जैसे भारी बोझ से दबा जा रहा हो।
विनम्रता
क्रोध कड़वा व मान मीठा जहर है दोनों प्राण नाशक है।
विनम्रता
मान संसार का बढ़ाने वाला और मार्दव संसार का घटाने वाला है, अभिमानी निर्दयी और विनम्र दयालु होता है, अभिमानी का व्रत तप स्वाध्याय सब निष्फल है।
विनम्रता