यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः सम्भवं, तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मनः। यदा किञ्चित् किञ्चित् बुधजन सकाशादवगतं, तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगतः।।
जब मैं थोड़ा जानकार हुआ तो हाथी की तरह मद से अन्धा हो गया और अपने आप को सर्वज्ञ समझने लगा, किन्तु जब मैंने ज्ञानी जनों की थोड़ी-थोड़ी सङ्गति की तो लगा कि मैं मूर्ख हूँ और तब मेरा अहङ्कार रूपी ज्वर शीघ्र ही उतर गया।
When I knew a little, I became blind with pride like an elephant and thought myself all-knowing; but when I kept even a little company with the wise, I realized I was a fool, and then the fever of my ego quickly subsided.
— आराध्य सूत्र · #55
–