Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 6 / 41

हमें सुबह उठकर चेहरे पर मुस्कान रखनी है क्योंकि शीशे में स्वयं के मुरझाये चेहरे को देखने से अपशकुन हो जाता है। प्रतिदिन आधा घंटा योगासन, प्रार्थना, ध्यान करें, अपना घर, कार्यालय स्वच्छ, साफ रखें। अच्छा दिमाग और दिल ये दोनों विजय दिलाते हैं।
चरित्र
लड़कियाँ फैशन में, लड़के व्यसन में रहने से परिवार टेंशन में रहता है। सादा और पौष्टिक आहार लेवें, छोटी-छोटी बचत नियमित करते रहें क्योंकि खराब समय जीवन में कभी आने की सूचना नहीं देता है।
परिवार
सज्जन गुणहीनों पर भी दया करते है, पर के द्वारा किए हुए उपकार को नहीं भूलते हैं, अपनी कमजोरी दूसरों पर नहीं डालते हैं, दूसरों के दोषों को प्रकट नहीं करते हैं, गुणवान को देखकर प्रमुदित होते हैं, दूसरों के अल्पगुण की भी अनल्प प्रशंसा करते हैं, दूसरों के वैभव से ईर्ष्या नहीं करते हैं, दूसरों के दुःख में दुःखी-सुख में सुखी होते हैं, स्व प्रशंसा नहीं करते हैं, दूसरे के द्वारा प्रशंसा किए जाने पर नम्रीभूत होते हैं, विषमताओं के आने पर निजशील, न्यायनीति और धर्म का परित्याग नहीं करते हैं, पर के द्वारा कटु व्यवहार किए जाने पर भी मधुर उत्तर देते हैं, दूसरों के दोष नहीं गुण ग्रहण करते हैं विसंवाद नहीं करते हैं।
चरित्र
सबसे कठिन बंधन स्नेह का है, परतन्त्रता भी मात्र इतनी है कि पर से स्नेह है, अपने को स्वतन्त्र, स्वतः सिद्ध, अविनाशी, अखण्ड, सत् जानकर बन्धन से दूर रहो और प्रसन्न रहो।
अनासक्ति
परिचय बढ़ाना शान्ति का मार्ग नहीं है अतः किसी से विशेष परिचय मत पूछो और न अधिक समय तक एक स्थान पर रहो, परिस्थिति वश यदि एक स्थान पर रहने का प्रसंग आवे तो अपने ध्यान, अध्ययन, व्रताचरण से विशेष प्रयोजन रखो हाँ! सार्वजनिक शास्त्र प्रवचन एक बार करते रहें, जिससे स्व दृष्टि निर्मल हो और अन्य को भी लाभ हो सके।
अनासक्ति
यदि तुम्हें शान्ति पसंद है तो तुम अपना ऐसा व्यवहार रखो कि जिस व्यवहार के निमित्त से दूसरों को अशान्ति न पैदा हो क्योंकि तुम्हारे व्यवहार से दूसरों के अशांत होने पर तुमको शान्ति न होगी। कितने ही टूटी टाँग वाले हैं, तुम तो चलते-फिरते हो, कितने ही अंधे हैं तुम्हें तो कुछ दिखता भी है, कितने ही दारिद्रय या अजीर्ण से खा नहीं पाते हैं, तुम तो खाते भी रहते हो, फिर भी शान्ति नहीं रखते?
संतोष
कौन-सा पर पदार्थ मेरा हित करेगा? मेरा हित तो निर्विकल्प अवस्था में है, बाह्य पदार्थ का ध्यान तो विकल्प का हेतु है व रहेगा।
ध्यान
रागी जीव ने शरीर के राग में न जाने कितनों को शरीर रहित कर दिया, एक पर्याय को सजाने में कितनों की पर्यायों को नष्ट कर दिया। सही चेहरा तो चारित्र से चमकता है किन्तु आपने परजीवों की हिंसक सामग्री से चमकाना चाहा है। चर्म सुन्दर नहीं सुन्दर तो आत्मा का धर्म है।
अनासक्ति
जो धोखेबाज न हो, स्थिर रहने वाला हो, बुद्धिमान हो, संतोषी हो, चुगली से रहित हो, भर्त्सना करने पर उत्तर न देता हो तथा प्रशस्त वचन बोलता हो, स्वामी के शत्रु से शत्रुभाव, मित्र से मित्रभाव रखता हो सत्पुरुष ऐसा सेवक चाहते हैं।
चरित्र
एक डण्डा मारकर बताया कि एक बज गया, पूछने वाला खुश हुआ। उससे पूछा क्यों हँस रहे? उसने कहा—एक घंटे पहले पूछता तो ये १२ डण्डे मारता, जो हर हाल में राजी है, उसे कोई दुःखी नहीं कर सकता है।
संतोष
गलतियाँ हों पर एक गलती दुबारा न हो, गलतियाँ उन्हीं से होती हैं, जो कुछ करने की कोशिश करते हैं, गिरते भी वही हैं जो चलते हैं, गलती से सबक लो, गलती से गिरो भी तो बॉल की तरह उछलो न कि मिट्टी के लौंदे की तरह गिरकर चिपको, यही उन्नति का राज है।
पुरुषार्थ
इतने नरम भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको खा जाये, इतने गरम भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको छू न सके, इतने सरल भी मत हो जाओ कि दुनिया आपको मूर्ख बना दे, इतने ज्यादा अकड़ों भी मत कि दुनिया आपसे मिल न सके, इतने गम्भीर भी मत बनो कि दुनिया आपसे ऊब जाये, इतने छिछोरे भी मत बनो की दुनिया आपकी गिनती न करे इतने मँहगे भी मत बनो कि दुनिया आपको बुला न सके, इतने सस्ते भी मत बनो कि दुनिया आपको ना चाहे।
चरित्र
अज्ञानी की श्वासें तेज और ज्ञानी की श्वासें मंद-मंद चलती हैं, स्वरूप का चिन्तन करने वाले योगी की श्वास मंद-मंद चलती है किन्तु भोगी की श्वासें तेज चलती हैं, जो जितना उथला व्यक्ति होता है वह उतना ही हाँफता है।
ध्यान
प्रभु से मत कहो समस्या विकट है, समस्या से कह दो कि मेरा प्रभु मेरे निकट है। यदि किसी समस्या को सुलझाया जा सकता है तो फिर चिन्ता करने की क्या जरूरत है और यदि नहीं सुलझाया जा सकता तो फिर चिन्ता करने से क्या फायदा है?
भक्ति
सदाचार की रक्षा यत्न से करना चाहिए, धन तो आता है और जाता है, धन क्षीण हो जाने पर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता किन्तु जो सदाचार से भ्रष्ट हो गया, उसे नष्ट ही समझना चाहिए।
चरित्र
रोग होने पर पथ्य सेवन, स्वामी के सामने सत्य बोलना, दुष्ट के साथ न्याय करना, शत्रु को क्षमा करना, ज्ञान होने पर ध्यान करना, धन होने पर दान करना और स्त्री के साथ कोमल व्यवहार करना औषध है।
चरित्र
कुलीन पुरुष को करोड़ों रुपये मिलें तब भी वह अपने नाम को कलंकित नहीं होने देता है। प्रतिष्ठित कुल में उत्पन्न हुए मनुष्य के दोष पर चन्द्रमा के कलंक की तरह विशेष रूप से सबकी दृष्टि पड़ती है।
चरित्र
श्रावक अभिषेक के समय प्रभु के और आहार दान के समय गुरु के अति निकट होता है, तब दो बासों के घर्षण के समान भक्ति व चारित्र की ज्योति प्रकट होती है।
भक्ति
यदि धन नष्ट हुआ तो कुछ नहीं हुआ, यदि स्वास्थ्य नष्ट हुआ तो कुछ नष्ट हुआ, यदि...
चरित्र
जलते हुए घर में से आदमी जिस वस्तु को निकाल लेता है, वही उसके काम की होती है न कि वह जो वहाँ जल जाती है इसी प्रकार यह संसार जरा-मरण से जल रहा है इसमें से दान देकर निकाल लो, जो दिया जाता है वह सुरक्षित होता है।
दान
जिस प्रकार ईंधन सहित अग्नि में वृद्धि होती है उसी प्रकार चिंता युक्त मनुष्य के संसार की वृद्धि होती है क्योंकि चिंता से कर्म बंध होता है। ‘‘दरिद्र को सदा अनेक प्रकार की चिंता होती हैं। जो होने वाला है वह होता है, जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता है इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले को चिंता की बाधा नहीं सताती है।’’
मन
चिन्ता के दुष्परिणाम–१. मन का उदास रहना, २. बुद्धि का भ्रष्ट होना, ३. मस्तिष्क का भारीपन होना, ४. चेहरे का मुरझाना, ५. शरीर की शक्ति का क्षीण होना, ६. क्रोधी स्वभाव का होना, ७. बालों का सफेद होना, ८. समय से पूर्व वृद्धत्व का आगमन होना है।
मन
हमें जो मिलता है, उससे हमारी जिन्दगी चलती है, जो देते हैं उससे जिन्दगी बनती है। दान देने से पहले अपने कमजोर भाई को सहारा दो क्योंकि भगवान् से ज्यादा आपके भाई को आवश्यकता है। स्वयं जाकर दिया गया दान उत्तम, अपने यहाँ बुलाकर दिया गया दान मध्यम और माँगने पर दिया गया दान अधम व सेवा के बदले दान देना निष्फल है।
दान
एक व्यक्ति जिसके पूर्वज बहुत ही सम्पत्ति छोड़ गये थे और वर्तमान में भी अच्छा व्यवसाय है, निरोग है, पढ़ा-लिखा है लेकिन प्रतिसमय खाते-पीते, सोते-जागते भय बना रहता है क्योंकि उसने पूर्व में अभयदान नहीं दिया।
दान
एक व्यक्ति के पास बहुत पैसा है, लक्ष्मी सम्भाले नहीं सम्भल रही, किसी प्रकार का भय भी नहीं है, वह विद्वान् है लेकिन हमेशा रोगी ही बना रहता है, मूँग की दाल भी नहीं पचती क्योंकि उसने पूर्व में औषधिदान नहीं दिया था।
दान
दुष्ट पुरुषों का बल है ‘हिंसा’, राजाओं का बल है दण्ड देना, स्त्रियों का बल है सेवा अथवा रोना, सत्पुरुषों का बल है धन, असफल व्यक्तियों का बल है धैर्य, गुणवानों का बल है क्षमा, संतों का बल है साधना।
चरित्र
इस असार एवं दुःख पूर्ण संसार में अनन्त अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल व्यतीत हो गए, उन समस्त कालों में यही मन्त्रराज महत्त्वपूर्ण रहा है अर्थात् अतीत काल में जिन भव्य प्राणियों ने मुक्ति पाई है, विदेहादिक से वर्तमान काल में पा रहे हैं, पाँच भरत और पाँच ऐरावत क्षेत्र से भविष्यत् काल में मुक्ति पायेंगे, यह सब मन्त्रराज का ही प्रभाव जानना चाहिए।
णमोकार
जो व्यक्ति स्वभाव से धैर्यवान है, वह महान् विपत्ति के समय भी अधीर नहीं होता, संकट के समय धैर्य धारण करना मानो आधी लड़ाई जीत लेना है, अपने धैर्य के बिना और कोई संकट से मनुष्य का उद्धार नहीं कर सकता, सज्जनों का धन तो धैर्य ही है जिसके पास धैर्य है, वह जो भी इच्छा करता है उसे प्राप्त कर सकता है।
पुरुषार्थ
जलते हुए घर में से आदमी जिस वस्तु को निकाल लेता है, वही उसके काम की होती है न कि वह जो वहाँ जल जाती है इसी प्रकार यह संसार जरा-मरण से जल रहा है इसमें से दान देकर निकाल लो, जो दिया जाता है वह सुरक्षित होता है।
दान
जिस प्रकार ईंधन सहित अग्नि में वृद्धि होती है उसी प्रकार चिंता युक्त मनुष्य के संसार की वृद्धि होती है क्योंकि चिंता से कर्म बंध होता है। ''दरिद्र को सदा अनेक प्रकार की चिंता होती हैं। जो होने वाला है वह होता है, जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता है इस प्रकार की निश्चित बुद्धि वाले को चिंता की बाधा नहीं सताती है।''
मन