Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

प्रायः समस्त प्रकार की उपाधि का मूल यह शरीर है, यह ही संसार में भटकाने वाला है, सभी को सबसे अधिक ममत्व अपने शरीर से होता है, साधु बनकर शरीर का गुलाम बनने वाले जीव के लिए नरक व पशु ये ही दो गतियाँ हैं।

The root of nearly every kind of affliction is this body; it alone makes one wander in the world. Everyone feels the greatest attachment for their own body. For the being who becomes a monk yet remains a slave to the body, only two destinies remain — hell and the animal realm.

— आराध्य सूत्र · #1521

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति