Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 25

कहो वही बात जो सच्ची हो, अच्छी हो, उपयोगी हो।

114 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

जिस उपाय के द्वारा चित्स्वरूप आत्मा से वेग पूर्वक शीघ्र ही सङ्क्लेश दूर हो जाता है, और चित्स्वरूप में विशुद्धि आती है, मोक्षाभिलाषी जीव को वही उपाय करना चाहिए।
ध्यान
जीवन में तेरह गुण- आत्मसंयम, मौनभाव, नियमितता, दृढसङ्कल्प, मितव्ययता, उद्यमता, लगन, न्याय, परिमित वचन, स्वच्छता, शान्ति, पवित्रता एवं विनम्रता ये 13 गुण जीवन में विकास के हेतु हैं।
चरित्र
उदारता, दयालुता, नम्रता, स्नेह युक्त और परोपकार करने वालों को कुछ भी असम्भव नहीं है।
चरित्र
लोक व्यवहार के लिये छः बातें- 1.किसी को डांटना नहीं, 2.दबाना नहीं, 3.अलोचना नहीं करना, 4.गुणों की हार्दिक प्रशंसा करना, 5.किसी की ज्यादा निगरानी नहीं करना, 6.गुणवानों के प्रति नम्रता रखना।
चरित्र
महाकष्ट के चार कारण- 1.किसी वस्तु पर अधिकार रखना, 2.गर्भधारण करना, 3.कर्जदार होना, 4.कुत्ते की रति क्रिया प्रारम्भ में सुखकर अन्त में दुःखकर होती है।
अनासक्ति
परीक्षा- आपत्ति में मित्र की, युद्ध के समय शूरवीर की, सङ्कट के समय कुटुम्बी जनों की, निर्धन अवस्था में पत्नि की परीक्षा होती है।
संगति
पुत्र पर कर्जा छोड़ने वाला पिता शत्रु है, व्यभिचारिणी माता-पुत्र की शत्रु है, रूपवान स्त्री-पति की शत्रु है, मूर्ख पुत्र-पिता का शत्रु हैं।
परिवार
मनुष्य को विद्या के समान आँख, सत्य के समान तप, राग के समान दुःख, त्याग के समान सुख अन्य कोई नहीं हैं।
ज्ञान
अधिक दुःख- लोक में निर्धन दुःखी उससे ज्यादा कर्जदार इन दोनों से ज्यादा रोगी इससे ज्यादा जिसकी स्त्री दुष्ट है वह दुःखी है।
Misc.
स्वर्गगामी- गरीबों को दान देने वाला, शक्ति होने पर भी क्षमा करने वाला, युवावस्था में तप करने वाला, ज्ञानी होने पर भी मौन रहने वाला, सुख सम्पन्न होने पर भी वैराग्य धारण करने वाला एवं दयावान ये स्वर्गगामी होते हैं।
दान
आभूषण- हाथ का आभूषण दान, कण्ठ का आभूषण सत्य, कान का आभूषण शास्त्र श्रवण, मीठे वचनों पूर्वक दान, गर्व रहित ज्ञान, क्षमा युक्त वीरता आभूषण है।
चरित्र
सौ में एक शूरवीर, हजार में एक ज्ञानी, दस हजार में एक वक्ता, लाखों में एक दानी होता है।
दान
तीन बातें- चैतन्य स्वभाव की प्रतीति करो, प्रेम पूर्ण व्यवहार करो, आलस कभी मत करो।
चरित्र
सात बातें दुःखदायी- अधिक बोलना, व्यर्थ भटकना, अधिक शयन, अधिक भोजन, अधिक शृङ्गार, हीन भावना औरअहङ्कार दुःखदायी है।
चरित्र
यशस्वी के आठ गुण- शान्त स्वभाव, उत्साह, सत्यनिष्ठा, धैर्य, सहनशक्ति, नम्रता, समता, साहस।
चरित्र
तीन शुद्धि- स्नान से देह की, दान से धन की और ध्यान से मन की शुद्धि होती है।
ध्यान
तीन सफलता- धन की सफलता दान में, शक्ति की सफलता सेवा में, विद्या की सफलता विवेक में है।
दान
सफलता के दस सूत्र- 1.जीवन भर सीखते रहें, 2.थोड़ा कार्य करें किन्तु श्रेष्ठ करें, 3.स्वयं एवं दूसरों के प्रति ईमानदार रहें, 4.अपने शरीर और स्वास्थ्य का ध्यान रखें, 5.सन्तोषी बने, 6.दूसरों को सम्मान देना सीखें, 7.जितनी बड़ी चादर उतने पैर फैलायें(आय से व्यय कम करें), 8.सुने अधिक बोले कम, 9.वचन को पूरा करें, 10.भविष्य की चिन्ता छोड़ें, भूत को भूल जाएँ, वर्तमान में जीना सीखें।
समृद्धि
चार काम न करों- बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो, और बुरा मत सोचो।
चरित्र
प्रेम और घृणा करने वाले दोनों अन्धे होते हैं।
अनासक्ति
खुशियाँ समेटो नहीं बाँटो, खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं।
दान
पहले लोग दरवाजे पर लिखते थे- 'शुभ लाभ', 'बाद में लक्ष्मी जी सहाय करें' फिर 'वेलकम' अब 'कुत्ते से सावधान रहें' लिखने लगे हैं, अर्थात् हृदय की विशालता एवं विशुद्धि कम होती जा रही है।
चरित्र
पाँच मकार-मन्दिर, मूर्ति, माला, मन्त्र, महात्मा इन पाँच पर भारतीय संस्कृति टिकी है।
भक्ति
अच्छे कार्य को कभी टालो मत, न उदासीनता से करो, कार्य को बोझ मत समझों, उसमें रूचि लो, हमेशा आँखें खुली और मुँह बन्द रखो।
पुरुषार्थ
छः बोल- 1.कम बोलों, 2.धीरे बोलो, 3.मीठा बोलो, 4.आदर से बोलों, 5.समझ के बोलों, 6.किसी के बीच में न बोलों।
वाणी
धर्म के आठ मार्ग- 1.पूजन करना, 2.आगम अध्ययन, 3.दान, 4.तप, 5.सत्य बोलना, 6.क्षमा, 7.निर्लोभता, 8.सन्तोष।
धर्म
सीधे चलने पर गॉड(भगवान) बनते हैं उलटे चलने पर डॉग(कुत्ता) बनते हैं, निर्णय आपका है।
चरित्र
पाँच बातें- 1.कभी किसी का दिल दुःखाने वाली बात मत कहो, 2.जो भी तुम्हारा भला करे उसकी बात मानो, 3.अधिक योग्य बने विना बड़ों की बराबरी का दावा मत करो, 4.जहाँ ज्ञान की दो बातें मिलें, ध्यान से सुनो, 5.जब किसी से द्वेष हो तब सोचो ये अपना ही तो है क्योंकि अपने से कभी घृणा और द्वेष नहीं होता है।
क्षमा
चार चीजें छोटी नहीं- 1.घाव, 2.कर्जा, 3.कषाय, 4.अग्नि इनको कभी छोटा न समझें।
Misc.
पाँच भकार- 1.भाषा, 2.भेष, 3.भ्रातृ प्रेम, 4.भाव, 5.भोजन ये सब भारतीय संस्कृति के अनुरूप सात्विक होने चाहिए।
चरित्र
तीन शक्ति- 1.उत्साहशक्ति, 2.मन्त्रशक्ति, 3.प्रभुत्व शक्ति सदा अपने पास रखें।
पुरुषार्थ
वैराग्य के पाँच सूत्र- 1.जीव यम के दाँतों के बीच रहकर भी जीने की इच्छा करता है, 2.संसारी प्राणी मोह उदय के कारण संसार से निकलने का उपाय नहीं करता है, 3.सारा संसार अज्ञान रुपी अन्धकार में जी रहा है, 4.पदार्थों के देखते ही राग या द्वेष रुपी जहर चढ़ता है, 5.पैर रखते ही पाप होना शुरू हो जाता है।
अनासक्ति
स्वास्थ्य, शान्ति एवं दीर्घायु के शिक्षा सूत्र- 1.खाओं कम चबाओ ज्यादा, 2.बोलो कम, विचारो ज्यादा, 3.बैठो कम, चलो ज्यादा, 4.लेना कम, देना ज्यादा, 5.पहनों कम, खुले वदन रहो ज्यादा, 6.उपदेश कम आचरण ज्यादा, 7.आज्ञा कम, सेवा ज्यादा, 8.खेद कम, प्रसन्न ज्यादा, 9.सोओं कम, जागो ज्यादा।
स्वास्थ्य
छः बातों से मूर्खता जानी जाती है- 1.अकारण क्रोध करना, 2.विना प्रयोजन वार्तालाप करना, 3.विना आधार पूँछताछ करना, 4.अपरिचित व्यक्ति का विश्वास करना, 5.शत्रु को मित्र समझना, 6.लोक विरुद्ध काम करना।
विवेक
छः बातों पर अमल करना- 1.समता बढ़ाना, 2.कषाय घटाना, 3.निज-पर का विवेक करना, 4.आत्म ध्यान करना, 5.मैथुन से डरना, 6.उत्साह से भरना।
संयम
सात बातें अच्छी नहीं लगती- 1.कञ्जूस को दान देने वाला, 2.लोभी को याचना करने वाला, 3.चोर को उजाला, 4.मूर्ख को उपदेश देने वाला, 5.कर्जदार को साहूकार, 6.रूपवान को बुढ़ापा, 7.व्याभिचारिणी को पति अच्छा नहीं लगता है।
Misc.
तीन चीजें- समय, मृत्यु और ग्राहक ये किसी की प्रतीक्षा नहीं करते हैं।
समय
सभी चीजें अनुभव करके नहीं छोड़ी जातीं, जैसे जहर खाकर नहीं छोड़ा जाता है।
विवेक
बैल का दाँत, गाय का दूध, घोड़े की चाल व्यक्ति का व्यवहार एवं कन्या का रूप बिकता है।
चरित्र
साधु के पास हाथ बाँधकर नहीं, जोड़कर जाना चाहिए, हाथ जोड़कर जाने से श्रावक और
विनम्रता
कलहकारी व्यक्ति की मूर्खता के चार गुण होते हैं– अहङ्कारी होना, दुर्वचनी, हठी, अहितकारी वाणी बोलना।
चरित्र
दूसरों के साथ हँसिये, दूसरो पर मत हँसिये, तुम बर्फ के समान विशुद्ध और पवित्र रहो, तब भी निन्दा से नहीं बच सकते हो।
वाणी
जो विना पूँछे किसी को सलाह नहीं देता है, दूसरों की अच्छी सलाह को मान लेता है, सोच विचार कर कार्य शुरू करता है, हाथ में लिये कार्य को अधूरा नहीं छोड़ता है, पहले तौलता है बाद में बोलता है 'वही बुद्धिमान है'।
ज्ञान
जिसे सोने के लिये गोली नहीं खाना पड़ती हो और उठने के लिये अलार्म की जरूरत नहीं पड़ती हो वह सबसे सुखी आदमी है।
संतोष
जिसको स्वयं पर भरोसा नहीं, वह राम भरोसे क्या कर लेगा? ईश्वर पर भरोसा रखिये, ईश्वर के भरोसे मत रहिये।
पुरुषार्थ
बचपन में अध्ययन, जवानी में अर्जन, बुढ़ापे में चिन्तन ये तीन बातें याद रखना चाहिए।
समय
जिव्हा घी खाने से चिकनी और मीठा खाने से मीठी नहीं होती, अतः जिव्हा की तरह निस्पृह होना चाहिए।
संयम
डाकिया पत्र लाता है, चाहे मृत्यु का हो या खुशी का सब में निरपेक्ष रहता है। आप भी डाकिया की तरह मध्यस्थ बने।
अनासक्ति
नदी के इस तरफ दर्पण रखा है उसमें नदी का पानी दिख रहा है व पर्वत पर लगी आग दिख रही है पर वह दर्पण पानी से गीला नहीं होता और अग्नि से जलता नहीं वह दोनों से निर्लिप्त रहता है।
अनासक्ति
पेट को दीजिये, जीभ को देने की जरूरत नहीं, आँख सुधरने से मन सुधरता है, जीभ सुधरने से जीवन सुधरता है।
संयम
पुत्र एक कुल को तारता है, पुत्री दो कुलों को तारती है।
परिवार
जो भजन नहीं करते, वे मनुष्य नहीं मल-मूत्र बनाने की मशीन हैं।
भक्ति
समय के पैर नहीं पंख होते हैं, वह चलता नहीं उड़ता है, अतः समय की कीमत करनी चाहिए।
समय
दुर्गुणि व्यक्ति में भी एकाध गुण तो होता ही है, जैसे कैसा भी मकान हो कम से कम एक दरवाजा तो होता ही है।
विविध