Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 25

कहो वही बात जो सच्ची हो, अच्छी हो, उपयोगी हो।

114 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

सरल व्यक्ति धोखा खा सकता है पर धोखा दे नहीं सकता है।
चरित्र
भीतरी अनुशासन जागे विना जीवन बदल नहीं सकता। अपने अहं को आदर्शों और उद्देश्यों से ऊपर न उठने दें।
संयम
समय की कमी नहीं सम्यक् योजना की कमी होती है। जहाँ समझने की गुञ्जाइश न हो वहाँ मौन रहना श्रेष्ठ है।
समय
मूल्यवान पूरा जीवन ही नहीं महत्त्वपूर्ण प्रसङ्ग या क्षण भी होता है।
समय
ऐसा कोई काम मत करो जिसे छिपाने की जरूरत हो।
चरित्र
अनैतिकता से पैसे कमाना कला नहीं क्रूरता हैं।
धन
आकाङ्क्षा, कम करो, उपलब्धियाँ बढ़ जाएँगी।
संतोष
हमारी चिन्ताएँ हमेशा हमारी कमजोरियाँ बताती हैं।
मन
गुणी व्यक्ति ऐश्वर्य के अभाव में भी धनाड्य माना जाता है।
चरित्र
महत्त्वाकांक्षी नहीं महान् बनने का प्रयत्न करो।
चरित्र
सङ्कट के समय धैर्य रखना ही आधी लड़ाई जीत लेना है।
संयम
विचारों की भीड़ से मुक्त होना ही एकान्त हैं।
ध्यान
पहचान सिर्फ चेहरे से नहीं, चरित्र से होती है।
चरित्र
जीवन में अविश्वसनीय होना सबसे बड़ा घाटा है।
चरित्र
लक्ष्य सपने की तरह नहीं स्थिर सङ्कल्प हो, कोई कभी यह न सोचे कि मेरे विना कोई काम रूक जायेगा।
पुरुषार्थ
गलती एक क्षण में हो जाती है, पर उसे सुधारने में बहुत समय लगता है।
चरित्र
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है अपने आप में रहना। धर्म शून्य समाज स्वयं मनुष्य के लिए आफत है।
धर्म
ईमानदारी के विना दयालुता नहीं आ सकती है। पाप पाप ही है, फिर चाहे वह बड़ा हो या छोटा।
चरित्र
समय बदलने पर लोगों की नजर भी बदल जाती है।
समय
जो इतिहास से अनजान हैं उन्हें परिवर्तन अखरता है।
ज्ञान
झगड़े मिटाने के लिए जीवन में समन्वय की जरूरत है। जहाँ कथनी और करनी एक होती है उसे साधना कहते हैं।
चरित्र
संसारकी उपलब्धियाँ समय में और सत्य की उपलब्धियाँ सङ्कल्प में होती हैं।
सत्य
सफल व्यक्ति बड़े कामों से महान् नहीं बनता बल्कि छोटे कामों को अच्छे ढंग से करता है।
समृद्धि
भय वस्तु से पैदा नहीं होता राग से पैदा होता है, 'राग' विराग में बदला कि भय समाप्त हो जाता है।
अनासक्ति
सब मेरे विचारों से सहमत हों, यह मत सोचिए, बल्कि यह सोचिए कि मेरे विचार सही व शुद्ध हों।
मन
केवल चाबी का गुच्छा मिलने से ताला नहीं खुलता बल्कि सही चाबी से ताला खोलने की कला समझिए।
विवेक
विश्वास के महल में सन्देह की छत न हो अन्यथा यह छिद्र बनकर हर मौसम में दुख देगी।
चरित्र
शिकायत, उपालम्भ(उलाहना) या आरोप लगाने से पूर्व सोचिए 'क्या यह बात बहुत बड़ी है'?
वाणी
चिन्तन के साथ निर्णय करना जरूरी है, अन्यथा चिन्तन भार-भूत बन जायेगा।
मन
गम्भीर व्यक्ति शोर नहीं मचाता, वह अपनी शक्ति और स्थिति देखकर काम करता है।
चरित्र
'यह भी बीत जायेगा' यह ऐसा स्वर्णिम सूत्र है, जो निराशा के अंधेरे में आशा का चिराग जला देता है।
समय
आवश्यकता से ज्यादा सङ्ग्रह और उपयोगिता से ज्यादा आकांक्षा जीवन और जीविका के बीच असन्तुलन पैदा करते हैं।
संतोष
करने योग्य काम बहुत है, जिन्दगी बहुत छोटी है, इसलिए हर क्षण सार्थकता से जियें।
समय
सिद्धान्त कितने ही अच्छे क्यों न हो पर जीवन में उतारे विना सफल परिणाम नहीं मिल सकता हैं।
चरित्र
गाँठ में सरलता नहीं होती है, भले ही वह कपड़े में, रस्सी में, शरीर में या विचारों में हो।
चरित्र
यश की चाह और अहं का पोषण दोनों एक साथ जीवित नहीं रह सकते हैं।
विनम्रता
उन सभी कर्मों को अशुभ मानें जो निजी गुणों का अन्त कर देते हैं।
कर्म
बेईमानी के धन से ईमानदारी की गरीबी अच्छी है।
धन
महान् वही होता है जिसमें विनम्रता होती है। जीवन में प्रतिक्रिया नहीं, समीक्षा करना सीखें।
विनम्रता
नियति व पुरूषार्थ में विश्वास रखने वाले का मनोबल बढ़ता है। मनोबल बीमारी और बुढ़ापे से बचाता है।
पुरुषार्थ
आधे मन से किये काम के नतीजे भी आधे ही आते हैं। अल्प समय की फिसलन दीर्घ काल तक दुःख देती है।
पुरुषार्थ
वेश भूषा अपने आप में एक परिचय पत्र है इसलिये भोगी बनकर नहीं, योगी या उपयोगी बनकर जियें।
चरित्र
हमारा आदर्श वीतरागता है उसे पाने का साधन संयम है।
अनासक्ति
चाह मोक्ष की हो जिसके बाद कोई चाह शेष नहीं रहती है।
अनासक्ति
समय का ज्ञाता वही होता है जो समय निरर्थक नहीं खोता है और न दुरुपयोग करता है।
समय
यदि सम्यक पुरुषार्थ है तो भविष्य कभी बुरा नहीं हो सकता है।
पुरुषार्थ
जागृति का एक क्षण करोड़ों मूर्छा के क्षणों से श्रेष्ठ है।
ध्यान
जन्म की कुण्डली ज्योतिषि बनाता है पर भविष्य की कुण्डली हम स्वयं बनाते हैं।
पुरुषार्थ
एक क्षण भी प्रमाद मत करो यह वाक्य छोटा है पर साधना बड़ी है।
पुरुषार्थ
सौ बार सिद्धान्तों की दुहाई देने की अपेक्षा एक बार उनका आचरण करना अच्छा है।
चरित्र
स्वयं के प्रति ईमानदार बनना ही सच्चे धर्मात्मा की पहचान है।
सत्य
कलाँ का सूत्र हैआँख खोलकर देखना और संयम का सूत्र हैआँख बन्द कर देखना।
ध्यान
उपेक्षित व्यक्ति सक्षम और प्रतिभा सम्पन्न क्यों न हो पर उसमें आत्मविश्वास की कमी रहती है।
मन
वह मत कहो जो तुम नहीं कर सकते हो।
सत्य
शुद्ध साध्य के लिए शुद्ध साधना की आवश्यकता होती है।
धर्म
अतीत को वर्तमान नहीं बनाया जा सकता, पर उससे अनुभव अवश्य लिया जा सकता है।
समय
जो असुर और सुरेन्द्रों के भोगों से तृप्त नहीं हुआ वह मनुष्यों के अल्प भोगों से किस प्रकार तृप्त हो सकता है? समुद्र का जल पीने से जो सन्तुष्ट नहीं हो सका, वह तृण के अग्रभाग पर स्थित पानी के पीने से क्या तृप्त हो सकता है?
संतोष
विष और विषयों में अत्यन्त दूर का अन्तर है, क्योंकि विष तो खाये जाने पर मारता है परन्तु विषय स्मरण से भी मारते हैं।
अनासक्ति
मन का विशुद्ध होना ही तीर्थ है, वचन, संयम और इन्द्रिय निग्रह करना भी शरीर में उत्पन्न तीर्थ है, जिस पुरुष के ये तीर्थ हैं वे उसकी स्वर्ग गति को निर्दिष्ट करते हैं।
ध्यान
न मुझे भक्तों की भीड़ से, न शिष्यों के समूह से, न पुस्तकादिक से, न शरीरादि से और न किसी कार्य से प्रयोजन है, विशुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा में ही मेरी सदा लीनता रहे।
ध्यान