Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 21

प्रतिष्ठा के लिए शिष्टाचार होना चाहिए।

94 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

आँसू न बहाइये दुर्भाग्य पर- चींटियाँ कभी आँसू नहीं बहातीं, बल्कि पुरुषार्थ करके सफलता प्राप्त करती हैं, तराजू के एक पलड़े पर अरबों चींटियां दूसरी ओर मनुष्य, अर्थात् मनुष्य में अरबों चींटियों से ज्यादा बल है।
पुरुषार्थ
आप जो भी देते हैं, वह कई गुना होकर आपके पास वापस आता है, सलाह दें या भावना दें, यदि वापस कभी नहीं भी मिलते हैं तो आत्म सन्तोष का परम सुख दायक उपहार आप प्राप्त करते हैं।
दान
लक्ष्यसाध्य- अर्जुन की तरह लक्ष्य के अलावा और कुछ नहीं दिखना चाहिए।
पुरुषार्थ
आचरणीय सूत्र- 1.प्रत्येक शब्द को हृदयङ्गम करें, 2.वाञ्छित विषय में गहन रुचि विकसित करें, 3.जो भी पढ़ें उसका मन से हानि-लाभ का विचार अवश्य करें, 4.पाठ को ध्यान से सुनें, 5.प्रत्येक संशय को कागज पर लिखें और पाठ पूरा होने पर उसका स्पष्टीकरण प्राप्त करें, 6.सामान्य शब्दों का ही अधिकाधिक प्रयोग करें, तथा शब्दों को ही अपना मार्गदर्शक बनाएं।
ज्ञान
प्रशंसा का एक वाक्य व्यक्ति की जिन्दगी बदल देता है, कटाक्ष करने से हृदय से अपना स्थान मिट जाता है।
वाणी
दिगम्बर मुनि होने के लिए केवल वस्त्र ही नहीं उतारना पड़ते वल्कि मन से वासनाओं को भी उतारना पड़ता है।
अनासक्ति
'मौन' शक्ति व आनन्द का अक्षय कोष है, एक घण्टे का मौन सात घण्टे की गहरी नींद के बराबर है, और एक घण्टा बोलने से सात कि.मी. चलने बराबर शक्ति खर्च होती है।
वाणी
मन तो भिखारी का पात्र है जो कभी भरता ही नहीं है।
संतोष
व्यक्ति चेहरे के रङ्ग को नहीं बदल सकता, पर जीवन जीने के ढंग को अवश्य बदल सकता है।
चरित्र
काम-क्रोध-मद-लोभ की जो लों मन में खान। तो लों पण्डित मूर्खों भव्यो एक सामान।।
संयम
जिस देश में तीर्थ, प्रतिमाएँ और धार्मिक लोग न हों, धर्म की रक्षा करने वाले पुरुषों को उस देश में नहीं जाना चाहिए।
धर्म
अपराजित शत्रु बुरा और अधूरा काम। शेष अग्नि सम वृद्धि पा बनते विपदा धाम।।
पुरुषार्थ
द्रव्य क्षेत्र साधन समय और स्वरूप विचार। करले पहले कार्य फिर करे विबुध विधि वार।।
विवेक
श्रम इसमें कितना अधिक कितना लाभ अपूर्व। बाधा क्या-क्या आयेगी सोचे नर यह पूर्व।।
पुरुषार्थ
वह कौन सी गति है जो सैकड़ों बार प्राप्त न हुई हो, वह कौन सा सुख है जिसे पहले अनेक बार न भोगा हो और वे कौन सी लक्ष्मियाँ हैं जो अनेक बार प्राप्त न हुई हों, हे मन! फिर भी तुम्हारी इच्छायें बढ़ती जा रही हैं।
अनासक्ति
जो आशा के दास हैं वे समस्त संसार के दास हैं, इसके विपरीत आशा जिनकी दासी है समस्त संसार उनका दास है।
संतोष
राजा का नाश खोटी मन्त्रणा से, मुनि का नाश परिग्रह से, कुल का नाश कुपुत्र से, लज्जा का नाश शराब से, स्नेह का नाश प्रवास से, समृद्धि का नाश अन्याय से, बालक का नाश लाड़-प्यार से, व्रतों का नाश अध्ययन नहीं करने से, ब्रह्मचर्य का नाश कुसङ्गति से, खेती का नाश देख-रेख न करने से, मैत्री का नाश स्नेह नहीं करने से, एवं धन का नाश आलस से हो जाता है।
विवेक
ऐश्वर्य का आभूषण सज्जनता, ज्ञान का आभूषण शान्ति, धन का आभूषण पात्रदान, शक्ति का आभूषण क्षमा, शौर्य का आभूषण वचन संयम, अध्ययन का आभूषण विनय, तप का आभूषण क्रोध न करना एवं धर्म का आभूषण निश्छलता है।
चरित्र
जिसके पास निर्दोष विनय है, कल्पवृक्ष उसका सेवक है, चिन्तामणि रत्न उसके हाथ में है और यक्ष उसके पास रहता है।
विनम्रता
विनय मुक्ति का कारण है, विनय लक्ष्मी का कारण है, विनय प्रीति का कारण है और विनय बुद्धि का भी कारण है, विनय के विना विजय नहीं होती है।
विनम्रता
मोक्ष को प्राप्त कराती है वह विनय है, विनय से सब प्रकार के कल्याण नियम से प्राप्त होते हैं, 'विद्या ददाति विनयं' जब सामान्य विद्या विनय को देती है तो जिनवाणी के अध्ययन से तो विनय आना ही चाहिए, क्योंकि जिनवाणी में सद्गुणों का ही कथन है, मनुष्य पर्याय का सार जिन मुद्रा धारण करना है, जिनवाणी की शिक्षा सम्यक् विनय से समाधि आदि गुण प्राप्त होते हैं, विनयसम्पन्नता, विनयतप, मार्दव धर्मादि प्राप्त होते हैं।
विनम्रता
न्यायाधीश के चार गुण- शिष्टता पूर्वक सुनना, बुद्धिमत्ता पूर्ण उत्तर देना, गम्भीर होकर विचार करना, और निष्पक्ष न्याय करना।
विवेक
फल युक्त वृक्ष और कुलीन मनुष्य नम्र होते हैं परन्तु सूखी लकड़ी और मूर्ख कभी नम्र नहीं होते हैं।
विनम्रता
शिक्षाहीन साधु का बहुरूपिया के समान वेष धारण करना आत्म विडम्बना है और विनयहीन मनुष्य की शिक्षा भी दुर्जन की मित्रता के समान खोटा फल देने वाली है।
विनम्रता
जितेन्द्रियपना विनय का कारण है, विनय से गुणों की वृद्धि होती है, अधिक गुणवान पुरुष में जनसमूह अनुरक्त होता है और जनसमूह के अनुराग से सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।
विनम्रता
जिस प्रकार सूर्य की तीक्ष्ण किरणें कमल की पाँखुड़ी को विकसित कर देती हैं, उसी प्रकार गुरु के वचन भव्यों के मन रूपी पाँखुड़ी को विकसित कर देते हैं।
भक्ति
विद्या के साथ मर जाना अच्छा है, परन्तु अयोग्य को विद्या नहीं देनी चाहिए, विद्या लेकर मूर्ख शिष्य शत्रु बन जाता है।
ज्ञान
दान, दया, इन्द्रिय दमन, देव दर्शन, देवपूजन, इन पाँच दकारों से दुर्गति नहीं होती है।
धर्म
गाय, भैंस तथा दासी-दास आदि जीवधन, कोई धन नहीं है, सुवर्ण आधा धन है, अनाज महाधन है, 'विद्या, ब्रह्मचर्य और मित्र' ये तीन धन से भी बढ़कर हैं।
ज्ञान
विदेशों में विद्या धन है, सङ्कटों में बुद्धि धन है, परलोक में धर्म धन है और 'ब्रह्मचर्य सर्वत्र धन है।'
ब्रह्मचर्य
समस्त शास्त्रों में पाँच प्राणी जीवित रहते हुए भी मृत कहे जाते हैं, 1.दरिद्र, 2.बीमार, 3.मूर्ख, 4.परदेश में गमन करने वाला और 5.नित्य नौकरी करने वाला।
Misc.
विद्वत्ता युवकों को संयमी बना देती है, विद्वत्ता बुढ़ापे का आराम है, विद्वत्ता निर्धनता में धन का काम देती है एवं विद्वत्ता धनवानों को आभूषण का काम देती है।
ज्ञान
घूँस कानून को मोल ले लेती है, दान से कोई कङ्गाल नहीं बनता, दया वह भाषा है जिसे बहरे भी सुन सकते हैं और गूँगे भी समझ सकते हैं।
दान
छोटी-छोटी बातों पर बिगड़ने से केवल झूठे अहङ्कार को सन्तोष मिलता है और गलत धारणा रिश्तों को समाप्त कर देती है।
क्षमा
लगातार शिकायत और नौंक झोंक से बचें, विना पूँछे ज्यादा स्पष्टीकरण और सफाई न दें।
वाणी
अपने प्रति कठोर बनें एवं दूसरों के दोषों तथा कमियों के प्रति उदार बनें।
विनम्रता
कठोरता, कटुता, कर्कस वाणी और घटिया व्यवहार ये सब प्रभावी व्यक्तित्व के दुश्मन हैं।
वाणी
नम्रता, मिष्ठवाणी और मधुर व्यवहार आपके श्रेष्ठ मित्र हैं।
वाणी
दूसरों से गलती होने पर माफ कर देना, अपने से गलती हो तो माफी माँग लेना ऊँचा उठने का सरल मन्त्र है।
क्षमा
पुरुषार्थ, साहस, धैर्य, आत्मबल, बुद्धि और शारीरिक बल, ये छह जिसके पास हैं देव भी उसके आज्ञाकारी होते हैं।
पुरुषार्थ
काम, अर्थ व यश के विषय में किया गया पुरुषार्थ निष्फल हो सकता है, परन्तु 'धर्म कार्य का संकल्प निष्फल नहीं होता है।'
धर्म
उद्योग, कलह, खुजली, जुआ, मद्यपान, परस्त्री, आहार, मैथुन और निद्रा, इनका जैसे-जैसे सेवन किया जाता है वैसे-वैसे ये बढ़ते जाते हैं।
संयम
सहयोग लेकर या पूँछकर भटकने से बचो और समय बर्बाद करने से बचें, एक बार भटकने की अपेक्षा दो बार पूँछना अच्छा है।
विवेक
जैसे मकड़ी जाल तोड़कर बाहर नहीं जाती है, उसी में मर जाती है, उसी प्रकार प्रायः गृहस्थों का हाल होता है।
अनासक्ति
उधार लिये वाहन के पेट्रोल की टङ्की फुल करके दीजिये।
चरित्र
थके हों, उदासीन हों, बीमार हों तो हर किसी को न बताएं।
मन
चेहरे से ज्यादा चरित्र को मूल्य दीजिए, व्यक्ति सुन्दर नहीं होता है, सफलता सुन्दर बना देती है।
चरित्र
विचारों के प्रति सावधान रहिये, विचार ही वाणी, व्यवहार व चरित्र बनाते हैं।
मन
समस्या घर में नहीं है, मन में है, जो भी निराशा और चिन्ता पैदा होती है, जैसे ही मन की दशा सुधरती है, तत्काल समाधान हो जाता है।
मन
अपनी प्रशंसा, पर की निन्दा, महापुरुषों से ईर्ष्या और अप्रासङ्गिक बहुत बोलना, ये कार्य अपने आप को नीचे गिरा देते हैं।
वाणी
जो मनुष्य प्रायश्चित्त, आयुर्वेद, ज्योतिष और धर्म की बात शास्त्र पढ़े विना कहता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।
ज्ञान
जो व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किये विना पदार्थों का विवेचन करना चाहता है, वह चन्द्रमा का चुम्बन करना चाहता है, सूर्य को ग्रहण करना चाहता है, चन्द्र और ताराओं से सहित आकाश को आच्छादित करना चाहता है और भुजाओं से अपार गहरे समुद्र को तैरना चाहता है।
ज्ञान
अच्छे गुणों की तारीफ सभी करते हैं, पर पालन कोई-कोई करता है, जैसे फूलों का सार इत्र है, वैसे ही जीवन का सार चरित्र है।
चरित्र
विचारों को व्यवस्थित कीजिए- प्रत्येक बात या घटना को सकारात्मक रूप से देखें चाहे वह कितनी ही दुःख पूर्ण क्यों न हो, नकारात्मक विचार मन को कमजोर बनाते हैं।
मन
भावनात्मक लगाव को कम कीजिए, जीवन को सरलता से लीजिए, हमें यह तथ्य समझना चाहिए कि कोई भी समस्या हमेशा रहने वाली नहीं है।
अनासक्ति
समस्याओं और कठिनाइयों का स्वागत करें- आप जीवन की प्रत्येक समस्या से शिक्षा और लाभ ले सकते हैं, और उससे अपने व्यक्तित्त्व का विकास कर सकते हैं। प्रत्येक सङ्कट और कठिनाई में अपने आप से पूछिये कि यह समस्या मुझे क्या सन्देश देती है तथा इससे मैं क्या लाभ उठा सकता हूँ? समस्या का सामना करने के बाद आपको पहले से अधिक बुद्धिमान और परिपक्व बनकर निकलना चाहिए। जीवन में जो भी बात आपके साथ घटित होती है वह अच्छाई के लिए होती है।
विवेक
हर बात का कोई न कोई कारण अवश्य होता है, अचानक कुछ नहीं होता। कर्मों के बन्धन से मुक्त होने के लिए सफलता-असफलता, लाभ-अलाभ, निन्दा-प्रशंसा में अपने मन को सन्तुलित रखिए। कोई घटना या प्रसङ्ग इतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता, जितना कि उसके प्रति आपकी मानसिक प्रतिक्रिया या दृष्टिकोण होता है। संसार न अच्छा है न बुरा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे देखते हैं यह आपकी मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। जो आपके अन्दर है वही बाहर भी दिखाई देता है। प्रयोगों से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि विकास उन्हीं से होता है।
कर्म
परोपकार करना चाहिए परन्तु अध्यक्ष नहीं बनना चाहिए, हर कार्य की शुरुआत मुस्कान से कीजिए।
दान
किसी को उसकी गलतियाँ न बतायें वरना वह आपकी गलतियाँ ढूँढ़ने लगेगा।
वाणी
आँख की पुतली से यह शिक्षा मिलती है कि छोटों से बड़ा काम निकलता है इसलिए छोटों का ध्यान रखना चाहिए।
विनम्रता