Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 21

प्रतिष्ठा के लिए शिष्टाचार होना चाहिए।

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जीवन में ऐसे मित्र जरूर रखिए जिससे कि दर्पण देखने की जरूरत न पड़े अर्थात् मित्र गलतियाँ बताते रहें।
संगति
ज्ञानी मित्र के सदृश जीवन में कोई वरदान नहीं है।
संगति
मिलने पर मित्र का आदर करो, पीठ पीछे उसकी प्रशंसा करो, तथा आवश्यकता के समय मदद करो।
संगति
यदि दृढ़ मित्रता चाहते हो तो बहस करना, उधार लेना-देना, मित्र की स्त्री से बात करना छोड़ दो।
संगति
अपनी कला दूसरों को सिखाइए, आपकी सफलता विश्वव्यापी हो जाएगी।
दान
धन को इतना मूल्य मत दीजिए कि आप अपने चरित्र और स्वभाव को गिरवी रख बैठें।
चरित्र
आशा को सहेली और उत्साह को मित्र बनाइए आप मञ्जिल पा जायेंगे।
पुरुषार्थ
उदारता का पहला अधिकारी अपना भाई है बाद में पडोसी या पात्र दान है।
दान
दूसरों को सम्मान देना और झगड़े से दूर रहना ये आत्म रक्षा के अचूक मन्त्र हैं।
विनम्रता
हर समय इतने व्यस्त रहें कि चिन्ता करने का समय ही न मिले, समय का धन की तरह सदुपयोग करें।
समय
क्रोध यमराज है, तृष्णा नरक की वैतरणी नदी की तरह दुखदाई है, विद्या कामधेनु गाय है और सन्तोष इन्द्र का नन्दनवन है।
संतोष
अपने कर्मचारी से भी इतने धैर्य और शान्ति से बात करें, कि वह अपने कर्तव्य के लिये सहज प्रेरित हो जाय।
वाणी
मन में दूषित विचार उठते ही दिशा बदल दें अन्यथा भीतर की दिव्यता और पवित्रता खण्डित हो जाएगी।
मन
गिरते हुये को गिराने के लिये टक्कर नहीं रोकने के लिए सहारा दें, आप प्रेम दें दूसरे आपसे नफरत करना छोड़ देंगे।
अहिंसा
मनोरञ्जन का उपयोग नमक की तरह थोडा करें मनोरञ्जन को भोजन न बनायें।
संयम
ओंठो से हँसना अच्छी बात है, आँखों से हँसना उससे भी अच्छी बात है पर दाँतों से हँसना अधम बात है।
चरित्र
जो समय को बर्बाद करता है समय उसे बर्बाद कर देता है, अतः समय का सदुपयोग ही आत्मोत्थान का उपाय है।
समय
जीवन की सर्वोच्च शैली का सूत्र- 'न्यूनतम लेना, अधिकतम देना और श्रेष्ठतम जीना' है।
दान
जो हम सोचते हैं वह कभी-कभी होता है पर जो नहीं सोचते हैं वह अक्सर होता है।
मन
प्रतिभा से धन कमाया जाता है धन से प्रतिभा नहीं, आत्मविश्वास खोना ही सबसे बड़ी हानि है।
पुरुषार्थ
किसी काम में सफलता तभी मिलती है जब कार्य करने में आनन्द आये।
पुरुषार्थ
धृतराष्ट्र ने मुनिराज से पूँछा मेरी आँखों के सामने मेरे सौ पुत्र मारे गये क्या कारण है? मुनिराज ने कहा कि तीन भव पूर्व तुमने सर्पिणी के सौ बच्चे मारे थे, यह उसका फल है।
कर्म
दुनिया में जितने धर्म हैं सभी ने जीना सिखाया, लेकिन जैन धर्म की विशेषता है कि उसने जीने के साथ मरना भी सिखाया है। राम-कृष्ण जीवन सुधारते हैं, तो महावीर मृत्यु भी सुधारते हैं, मृत्यु भी आदमी की परीक्षा है। घर में कैसे जीना राम से सीखिए, कैरियर कैसे बनाना यह कृष्ण से सीखिए और मरण को सुमरण कैसे बनाना है यह महावीर से सीखिए।
समाधि
कर्म रुपी केसिट अन्दर है, उचित-अनुचित व्यवहार बाहर दिखाई देता है।
कर्म
जीवन में चरित्र, हृदय में पवित्रता, वाणी में मधुरता, व्यवहार में कुशलता, प्राणियों में मित्रता और स्वभाव में नम्रता ये शुभ भावनाएं ही शुद्धाचरण हैं।
चरित्र
वर्तमान के षडावश्यक- लोग देवपूजा नहीं डॉक्टर पूजा करते हैं, मन्दिर परिक्रमा नहीं अस्पताल की परिक्रमा करते हैं, गुरु उपासना नहीं टी.वी. की उपासना करते हैं, स्वाध्याय के नाम पर समाचार पत्र पलटाते हैं, संयम जेल या अस्पताल में करते हैं, तप पैसा कमाने के लिए मेले में या बाज़ार में धूप में बैठकर करते हैं, दान के नाम पर टेक्स या घूस देते हैं।
धर्म
मन्दिर धन से बनता है पर पूजा मन से होती है, मन की सादगी और शान्ति यौवन को स्थाई बनाती है।
भक्ति
हमारी विचार धारा ही हमें बूढ़ा या जवान बनाती है, चलता हुआ आदमी और दौड़ता हुआ घोड़ा कभी बूढ़ा नहीं होता है।
मन
जीवन में बहादुरी की जरुरत कभी-कभी पड़ती है किन्तु समझदारी की जरूरत हर समय पड़ती है।
विवेक
ज्ञानी को बोलना और अज्ञानी को मौन अखरता है, वाणी के मौन से मन का मौन और भी श्रेष्ठ है।
वाणी
भरतचक्रवर्ती की अपेक्षा राम के भाई भरत ज्यादा अच्छे हैं, क्योंकि उनको सिंहासन मिला पर बैरागी रहे, भरतचक्रवर्ती ने साठ हजार वर्ष दिग्विजय में ही गंवा दिये।
अनासक्ति
भरतचक्रवर्ती ने जैसे राजा श्रेयाँस को आहार दान के समय, जयकुमार को स्वयंवर के समय प्रोत्साहित किया वैसे ही बाहुबली को प्रोत्साहित करते तो शायद युद्ध नहीं होता।
संगति
पाप समय निर्बल बनों, धर्म समय बलवान। वैभव समय विनम्र अति, दुःख में धैर्य महान।।
चरित्र
छिलका और चावल- 'जिस शरीर में धर्म के साधक जीव का निवास है, उस शरीर की रक्षा बड़े यत्न से करना चाहिए' इस प्रकार की शिक्षा जिनागम का ऊपरी छिलका है, और 'देह त्यागने योग्य ही है' यह शिक्षा जिनागम का चावल है, असली बाह्य परिग्रह तो शरीर ही है, उससे भी जो ममत्व नहीं करता वही परम निर्ग्रन्थ है और इन्द्रियों की विषयाभिलाषा अन्तरङ्ग परिग्रह है।
अनासक्ति