Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 166

क्षमाधर्म दोहावली।

42 सूत्र

भोजन छोड़ेंगे लेकिन अशुभ विचार नही छोड़ेंगे तो क्षमा धर्म नहीं आएगा।
क्षमा
हर कार्य के लिए मुहूर्त देखते हो, लेकिन क्रोध के लिए नहीं इसलिए अनिष्ट होता है।
क्षमा
जब क्रोध में हो तो दस बार सोचो, जब अधिक क्रोध में हो तो हज़ार बार सोचो।
क्षमा
क्रोध ज्ञानी के हृदय में झाँक सकता है पर निवास तो मूर्खों के हृदय में रहता है।
क्षमा
मोक्षमार्ग पर चलने वाले को कर्म बन्ध से बचना पढ़ता है।
कर्म
कुत्ते को लाठी मारो तो लाठी चबाता है, उसे मूल शत्रु की पहचान नहीं, बन्दर को चिढ़ाओ तो वह भी चिढ़ाता है, उसी प्रकार यदि हम पर कोई क्रोध करे और हम भी करें, तो हम पशु से भी गये-बीते हुए।
क्षमा
साधु पुरूषों के प्रति शिष्टाचार का परित्याग कभी नहीं करना चाहिए।
विनम्रता
रामचंद्र जी वन में क्रोध नहीं सकारात्मक विचार करते हैं कि कैकई माता धन्य हैं जिसके निमित्त से अनेक तीर्थों के और अनेक साधुओं के दर्शन हुए।
क्षमा
खाली कुंए से वाल्टी खाली आती है, उसी प्रकार आत्मा कषाय से खाली हो तो भेजी हुई गाली व्यर्थ जायेगी।
क्षमा
काम और क्रोध को छोड़े विना कोई भी रिद्धि-सिद्धि को प्राप्त नहीं होता है।
क्षमा
जो लोक में पुण्यवान हैं जिनके दोनों लोक सुधरना है उन्हीं को क्षमा गुण प्रकट होता है।
क्षमा
आदमी देवता न बने कोई गम नहीं, आदमी दानव न बने यह भी कम नहीं। न जिये दूसरों के लिए कोई गम नहीं, दूसरों को जीने दे यह भी कम नहीं ॥1॥ सत्सङ्ग सर्वोत्तम न मिला हो कोई गम नहीं, खराब सङ्गत से दूर रहें यह भी कम नहीं। न बन सके सहारा दूसरों का कोई गम नहीं, दूसरों का जबरन सहारा न छीनें यह भी कम नहीं ॥2॥ गिरे को न उठायें, कोई गम नहीं, दूसरों को न गिरायें यह भी कम नहीं ॥3॥
चरित्र
निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन विना निर्मल करें सुभाव ॥4॥
संगति
खोद-खाद धरती सहे, काट कूट वनराय। कुटिल वचन साधु सहे, और से सहा न जाय ॥5॥
क्षमा
गाली सुन मन खेद न आनो, गुण को औगुण कहे अयानो।
क्षमा
काले भुजङ्ग मन के सदृश जब क्रोध का हो अवतरण, तो जीभ में टाँके लगा मैं मौन की लेलूँ शरण। मुझ पर चलाये जो दनादन क्रोध रञ्जित गोलियाँ, उत्तम क्षमा से नाथ मैं भरदूँ उसकी झोलियाँ ॥6॥
क्षमा
जो तुझको काँटा बोये, ताहि बोये तू फूल। क्षमावान सज्जन पुरूष, कभी न बोयें शूल ॥7॥
क्षमा
एक व्यक्ति के क्रोध से कभी न झगड़ा होय। आपस में जब दो भिड़ें तब निश्चित झगड़ा होय ॥8॥
क्षमा
मारना है गर किसी को मार दो अहसान से, क्या मिलेगा गर किसी को मार दोगे जान से। जान से मारा गया बापस कभी आता नहीं, एहसान का मारा गया फिर सर उठा सकता नहीं ॥9॥
क्षमा
क्षमा शोभती उस भुजङ्ग को जिसके पास गरल है। न कि उसे जो दन्त हीन, विषहीन, विनीत सरल है ॥10॥
क्षमा
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्य भाव रक्खूँ में उन पर ऐसी परिणति हो जावे ॥11॥
क्षमा
क्रोध तुल्य रिपु कौन जो, कर दे सर्व विनाश। हर्ष तथा आनन्द का, वह है यम का पाश ॥12॥
क्षमा
इच्छायें उसकी सभी, फलें सदा भरपूर। जिसने अपने चित्त से, कोप किया अति दूर ॥13॥
क्षमा
बैर की भावनाओं का संहार कर, मित्रता के लिये मित्रवत व्यवहारकर। चाहता है अगर तू सरल जिन्दगी, तो सरल से सरल अपना व्यवहार कर ॥14॥
क्षमा
तुम्हारी शान घट जाती कि रूतबा घट गया होता। जो गुस्से में कहा तुमने, वो हँसकर के कहा होता ॥15॥
क्षमा
जिसके हाथ मे क्षमा रूपी शस्त्र है, उसका दुर्जन क्या करेगा क्योंकि तृणहीन स्थान में गिरी अग्नि स्वयं शान्त हो जाएगी।
क्षमा
शरीर मे सामर्थ्य न होने से चिरकाल तक तपश्चरण नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, किन्तु मन से वश में करने योग्य जो कषाय रूपी शत्रु हैं, अगर उन्हे वश मे नहीं करते हो तो ये तुम्हारी अज्ञानता है।
क्षमा
पत्थर के टूटने पर जिस प्रकार फिर नहीं जुड़ता है, उसी प्रकार जिसका बैर(क्रोध) संख्यात, असंख्यात व अनन्त भव तक रहता है वह नरक गति में जाता है, पृथ्वी की दरार के समान जिसका बैर(क्रोध) है अर्थात् छह माह से अधिक बैर रहता है वह पशु गति मे जाता है, धूल पर बनी रेखा के समान जिसका बैर(क्रोध) होता है अर्थात् पन्द्रह दिन मे जिसका बैर मिट जाता है, वह मनुष्य गति को प्राप्त होता है और जल पर फेरी हुई रेखा के समान अन्तर्मुहूर्त जिसका क्रोध होता है वह देव गति में जाता है।
क्षमा
प्राणी मात्र के प्रति मित्रता, जो गुणों में अधिक उनके प्रति प्रमोद भाव, दुःखी जीवों के प्रति करुणा भाव और उद्दण्ड लोगों के प्रति माध्यस्थ भाव होना चाहिए।
अहिंसा
जिस प्रकार अन्न के विना शरीर, नेत्र के विना चेहरा, न्याय के विना राज्य, नमक के विना भोजन और चन्द्रमा के विना रात्रि की शोभा नहीं होती है, उसी प्रकार धर्म के विना जीवन की शोभा नहीं होती है।
धर्म
दिखाई देने वाला अचेतन है, और जो चेतन है वह दिखता नहीं है, अतः किसी से राग-द्वेष न करके मैं मध्यस्थ होता हूँ।
अनासक्ति
मनुष्य का आभूषण रूप है, रूप का आभूषण गुण है, गुणों का आभूषण ज्ञान है और ज्ञान का आभूषण क्षमा है।
क्षमा
हे भगवन ! आपने क्रोध को नौवे गुणस्थान में नष्ट कर दिया तब घातिया कर्मों को विना क्रोध के कैसे नष्ट किया अथवा समझ में आ गया क्या ठण्डी तुषार हरे भरे वनों को नष्ट नहीं कर देती है ?
क्षमा
शरीर की स्थिति के लिए साधु श्रावक के यहाँ आहार लेने जाते हैं, दुष्टजन उन पर क्रोध करते हैं, हँसते हैं, प्रताड़ित करते हैं फिर भी उनके मन में कलुषता उत्पन्न नहीं होती है उसे क्षमा कहते हैं।
क्षमा
वस्तु का स्वभाव धर्म है, क्षमादि दस भेद धर्म हैं, रत्नत्रय धर्म है और जीवों की रक्षा करना भी धर्म है।
धर्म
क्रोध के समान पाप व शत्रु दूसरा नहीं है, क्रोध समस्त अनर्थों का मूल है इसलिए छोड़ देना चाहिये।
क्षमा
बार-बार तपाये जाने पर भी सोना अपने दिव्य वर्ण को नहीं छोड़ता, बार-बार घिसे जाने पर भी चन्दन अपनी सुगन्ध नहीं छोड़ता, टुकड़े-टुकड़े किए जाने पर भी गन्ना अपनी मिठास नहीं छोड़ता उसी प्रकार प्राणान्त होने पर भी उत्तम पुरुष अपने क्षमा स्वभाव को नहीं छोड़ते हैं।
क्षमा
मैंने पहले विवेक पूर्वक जिस समता का अभ्यास किया है उसकी परीक्षा के लिए ये विरोधी आज उपस्थित हुये हैं, अगर समता की मर्यादा का उल्लङ्घन करके शत्रु पर क्रोध करता हूँ तो मेरे ज्ञान रूपी नेत्र का उपयोग कब होगा ?
क्षमा
प्राणान्त उपस्थित होने पर भी आत्महित के लिए ज्ञानीजनों ने उसका क्षमा ही प्रतिकार बतलाया है।
क्षमा
कुल्हाड़ी और चन्दन में समता रखकर के ही प्राचीन मुनियों ने सिद्धि प्राप्त की है।
क्षमा
जो नरक से मुझको निकालकर स्वयं अपने को नरक में डाल रहा है तो कौन बुद्धिमान उपसर्ग आदि का प्रतिकार करेगा ?
क्षमा
अगर अपकार करने वाले पर क्रोध किया जाता है तो जीव के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, और जीवन को नष्ट करने वाले अपकारी क्रोध के ऊपर ही क्रोध करना चाहिए।
क्षमा