Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 9

धर्म से रिक्त – 10 लोग

96 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी अपने वर्तमान दुःखों के लिए रोया नहीं करते हैं, अपितु वर्तमान में दुःख के कारण पापों को रोका करते हैं।
ज्ञान
सब प्रकार का भाग्य संकटपूर्ण होता है, सौभाग्य ईर्ष्या को लाता है और दुर्भाग्य लज्जा को।
कर्म
भारत में दार्शनिक तो संत होते हैं और संत दार्शनिक होते हैं।
Misc.
चिंतन द्वारा मन विलीन होता है और मन के विलय होने पर ही कल्याण होता है।
ध्यान
यदि मन में प्रपञ्च हो तो मन में भगवान् नहीं हो सकते हैं और यदि मन में भगवान् है तो प्रपञ्च नहीं हो सकता है।
मन
दुर्लभ मनुष्य जन्म पाकर जिसने भोगों में नष्ट किया है उसने मानों ईंधन के लिए कल्पवृक्ष को उखाड़ डाला है।
अनासक्ति
वैराग्य एवं तपस्या की कमी के कारण आज कल लोग परमात्मा तो बनना चाहते हैं किन्तु महात्मा नहीं बनना चाहते हैं।
अनासक्ति
परोपकार में सर्वदा संलग्न रहने वाला सज्जन व्यक्ति विनाश के अवसर पर भी विनाश करने वाले से भी शत्रु भाव नहीं रखता है जैसे चन्दन का वृक्ष काटने वाले कुल्हाड़े का भी मुख सुगन्धित कर देता है।
दान
दो अक्षरों का 'मम' (यह मेरा है ऐसा भाव) मृत्यु है और तीन अक्षरों का 'न मम' (यह मेरा नहीं है, ऐसा भाव) अमरता है।
अनासक्ति
मनुष्य 'योग' में स्थित होकर, तत्त्व को जानकर, मृत्यु काल में भी दुःखी नहीं होता है।
समाधि
ऐसे मरो की फिर से गर्भ वास न हो।
समाधि
मैंने मृत्यु का चिंतन तो काफी किया, लेकिन मृत्यु की चिंता मैं नहीं करता हूँ।
समाधि
मनुष्य की आयु सौ वर्ष की अवधि में सीमित है, उसका आधा रात्रि में बीत गया, शेष का आधा बालत्व और वृद्धत्व में बीत गया शेष भाग रोग वियोग, दुःखादि के साथ सेवा आदि में बीत गया जल की तरंग के समान अत्यधिक चंचल जीवन में प्राणियों को सुख कहाँ मिलता है?
समय
रत्नों से भरी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा स्वर्ण, सारे पशु और स्त्रियाँ किसी एक पुरुष को मिल जायें तो भी वे सब उसके लिए पर्याप्त नहीं होंगे, वह और भी पाना चाहेगा, ऐसा समझकर संतोष धारण करें, भोगेच्छा को दबा दें।
संतोष
सुख और आनन्द ऐसे इत्र हैं, इन्हें जितना अधिक दूसरों पर छिड़केंगे उतनी ही सुगन्ध आपके भीतर समाएगी।
दान
जहाज किसी भी दिशा में क्यों न जाय, कम्पास की सुई उत्तर दिशा ही दिखाती है, इस कारण जहाज को दिशाभ्रम नहीं होता। इसी प्रकार मनुष्य का मन यदि भगवान् की ओर रहे तो फिर उसे कोई डर नहीं रहेगा।
भक्ति
समय कैसा है, मित्र कौन-कौन हैं, देश कैसा है, क्या आमदनी है, क्या खर्च है, मैं कौन हूँ, मेरी शक्ति कितनी है, इन बातों पर मनुष्य को बार-बार विचार करना चाहिए।
विवेक
जीवित मनुष्य के लिए दुष्ट अन्तःकरण की यातना ही तो नरक है।
मन
जो सन्तोष रूपी अमृत पीने से शान्त व तृप्त हो जाते हैं, वे आत्मा में रमण करने वाले महात्मा ही परमपद को प्राप्त होते हैं।
संतोष
हे भव्य! यह समझ लो मोक्ष का रहस्य वैराग्य ही है।
अनासक्ति
दस प्रकार के लोग धर्म के तत्त्व को नहीं जानते हैं –१. नशे में मतवाला, २. असावधान, ३. पागल, ४. थका हुआ, ५. क्रोधी, ६. भूखा, ७. जल्दवाद, ८. लोभी, ९. भयभीत, १०. कामी।
धर्म
काम करने पर भी बोझ न लगे यह अनासक्ति का रूप है।
अनासक्ति
यौवन, रूप, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य और प्रियजनों का समागम ये सब अनित्य हैं विवेकशील पुरुषों को इनमें आसक्त नहीं होना चाहिए।
अनासक्ति
सबसे अधिक अच्छी लगने वाली वस्तुओं का संग्रह ही पुरुष के लिए दुःखदायी है एवं जो अकिंचन है, वह विद्वान् अनंत सुख पाता है।
अनासक्ति
जो अपने कल्याण की बात है, उसे आज ही कर, वृद्ध होकर क्या करेगा? क्योंकि वृद्धावस्था में तो अपने अंग भी भार हो जाते हैं।
पुरुषार्थ
यज्ञ में मन्त्र बोलकर द्रव्य चढ़ाई जाती है तप में समता की मुख्यता होती है।
धर्म
इस शरीर में रहते हुए ही हम आत्मा को जान लेते हैं तो ठीक है, यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है जो उसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
ज्ञान
'आत्म विश्वास' सफलता का प्रथम रहस्य है।
समृद्धि
मैं अब अपने आदर्श से हटकर जीने की अपेक्षा आदर्श के समीप मरना अधिक पसंद करूँगा।
चरित्र
'आयु' तो वायु से भी चंचल कमल पत्र पर स्थित जल बिन्दु के समान है।
समय
जब कोई मनुष्य किसी दूसरे के दोषों पर अँगुली उठाता है तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि शेष तीन अँगुलियाँ उसी की ओर संकेत कर रही होती हैं।
विवेक
वास्तव में जिसे किसी प्रकार की आशा नहीं है, वही सुख से सोता है, आशा का न होना ही परम सुख है।
संतोष
अंग गल गए हैं, बाल सफेद हो गए हैं, दाँत गिर गए हैं, काँपते हाथों में डंडा लिया हुआ है, फिर भी 'आशा' मनुष्य का पिण्ड नहीं छोड़ती है।
अनासक्ति
'आशा' एक नदी है जिसमें मनोरथ रूपी जल है, तृष्णा रूपी तरंगें उठ रही हैं, राग रूपी मगरमच्छ है, वितर्क रूपी पक्षी है, यह नदी धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फेंकने वाली है, इसमें अज्ञान रूपी भँवर हैं, जिनके पार जाना कठिन है और जो अतिगहन हैं, इसके चिन्ता रूपी तट बहुत ऊँचे हैं, इसके पार जाकर विशुद्ध मन वाले योगीराज ही आनन्दित होते हैं।
अनासक्ति
जो आशा के दास हैं, वे सम्पूर्ण लोक के दास हैं तथा आशा जिनकी दासी है, सम्पूर्ण लोक उनका दास बन जाता है।
संतोष
आशा मनुष्यों की कोई आश्चर्यमयी शृंखला है, जिससे बँधे हुए मनुष्य तो दौड़ लगाते हैं तथा उससे मुक्त व्यक्ति पंगु के समान स्थिर रहते हैं अर्थात् आशावान को दौड़ धूप करना पड़ती है।
अनासक्ति
संसार से प्रतिदिन प्राणी यमलोक में जा रहे हैं किन्तु जो बचे हैं, वे सर्वदा जीते रहने की इच्छा करते हैं, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा ?
समाधि
यह ''स्नेहमय पाश'' ज्ञान और वैराग्य, ज्ञान वैराग्य के बिना नहीं तोड़ा जा सकता है।
अनासक्ति
हर कहीं, हर किसी वस्तु में मन को मत लगा बैठिए।
अनासक्ति
संतों की वाणी सुनो, शास्त्र पढ़ो, विद्वान् हो जाओ, लेकिन ईश्वर के प्रति भक्ति नहीं तो कुछ नहीं।
भक्ति
तृष्णावान का मन धन सम्पत्ति में और मूर्ख का मन काम सुख में रमता है पर जो सज्जन है वह ज्ञान द्वारा भोग इच्छा को जीतकर शान्ति में रमता है।
संतोष
इच्छा से पाप का बंध होता है, इच्छा से दुःख होता है, इच्छा को दूर करने से पाप दूर हो जाता है, पाप दूर होने से दुःख दूर हो जाता है।
अनासक्ति
इच्छा रखनी ही है तो पुनः जन्म न लेने की इच्छा रखनी चाहिए।
अनासक्ति
जिसका साथी ईश्वर है उसको दुःख क्या, फिक्र क्या, दूसरे साथी की आवश्यकता क्या है ? मेघों से ढके हुए सूर्य वाला दिन 'दुर्दिन' नहीं है, उसी दिन को दुर्दिन कहो जिस दिन भगवान् की कथा का अमृतमय सुन्दर आलाप रस सुनायी नहीं पड़ता है।
भक्ति
निष्काम भाव से की जाने वाली भक्ति की तुलना तीनों लोकों के किसी भी पदार्थ से नहीं की जा सकती है। मन में कामना रखकर भजन करने से केवल उसका फल मिलता है, पर निष्काम भक्ति से प्रभु पद की प्राप्ति होती है।
भक्ति
कर्म भावना प्रधान उत्साह ही सच्चा उत्साह है, फल भावना-प्रधान उत्साह तो लोभ का ही एक छुपा रूप है।
पुरुषार्थ
जो भारतवर्ष में जन्म लेकर पुण्य कर्मों से विमुख होता है वह अमृत का कलश छोड़कर विष का पात्र अपनाता है।
कर्म
आत्म कार्य भी महान् कार्य है, केवल पर कार्य ही नहीं।
चरित्र
है आदमी, है काम, नहीं है आदमी, नहीं है काम।
पुरुषार्थ
निश्चय ही इस संसार में कर्मों के अनित्य सम्बन्ध से कभी कोई वस्तु स्थिर नहीं रहती है।
अनासक्ति
पराधीनता का सुख और अज्ञानी का वैराग्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
विवेक
स्वयं को ज्ञान और विनय से नित्य शुद्ध करें, ऐसा करने पर मरण होने पर पश्चाताप नहीं होगा।
ज्ञान
मनुष्य का समस्त चरित्र उसके विचारों से बनता है।
चरित्र
एकान्त स्थान में अकेले ही अपने हित का नित्य चिंतन करे क्योंकि अकेले सोचने वाला ही परम कल्याण को प्राप्त करता है।
ध्यान
परमानन्द में लीन दो ही तो चिन्तारहित हैं–अज्ञानी बालक और गुणों के परे पहुँचा हुआ संन्यासी।
संतोष
मनुष्य का जितना चित्त इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है उतना यदि आत्मा में हो जाये तो बंधन से मुक्त हो जाये।
अनासक्ति
प्राणायाम द्वारा अत्यन्त तीक्ष्ण बनाई ऊँकार रूपधार वाली और वैराग्य रूपी पत्थर पर घिसी हुई बुद्धि रूपी छुरी से संसाररूपी सूत्र को काटकर योगी फिर कर्मों से नहीं बँधता है।
ध्यान
योगी विरक्ति रूपी स्त्री के साथ बड़े वैभवशाली राजाओं की तरह सुख और शान्तिपूर्वक सोता है, पृथ्वी ही उसकी सुन्दर शय्या है, हाथ ही बड़ा तकिया है, आकाश ही चंदोबा है, अनुकूल पवन ही उसका पंखा है, चन्द्रमा ही उसका प्रकाशमान दीपक है।
अनासक्ति
अल्पबुद्धि मनुष्य परमात्मा को मूर्तियों में देखते हैं, योगी लोग अपने हृदय में परमात्मा को देखते हैं।
भक्ति
स्वभाव, रुचि, अभ्यास, संगति, सम्प्रदाय और विवेक बुद्धि ये न्यूनाधिक विकास के कारण हैं क्योंकि सबको ये सब चीजें एक सी हृदयंगम नहीं होती हैं।
विवेक