Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 9

धर्म से रिक्त – 10 लोग

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जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति
जिसने प्रथम बाल्यावस्था में विद्या का अर्जन नहीं किया, द्वितीय युवावस्था में धन का अर्जन नहीं किया और तृतीय प्रौढ़ अवस्था में तप का अर्जन नहीं किया, वह चतुर्थ वृद्धावस्था में क्या करेगा? जीवन को कल्याण मय और सुन्दर बनाने से ही मृत्यु भी शुभ बन सकती है।
पुरुषार्थ
जीवन का आदर्श यही है कि जीवन के उस पार देखा जाये।
ध्यान
कितना सरल हो जाता है जीवन जब विकल्प नहीं रहते हैं।
मन
कमल के पत्ते पर ओस की बूँद के समान मानव जीवन क्षणभंगुर है, हम लोग सिर्फ मुँह से ही यह कहते हैं परन्तु आत्म कल्याण करके नहीं दिखाते हैं।
समाधि
ज्ञान रहित योग से भी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता है, अतः मुमुक्षु को ज्ञान व योग दोनों का दृढ़ अभ्यास करना चाहिए।
ज्ञान
आगामी कल के विषय में डींग मत मारो क्योंकि तुम नहीं जानते कि कल क्या लेकर आयेगा।
समय
आहार के लिए निन्दनीय कर्म नहीं करना चाहिए, आहार भी प्राण धारण करने के लिए करना चाहिए, प्राणों को तत्त्व विज्ञान के लिए धारण करना चाहिए तत्त्व इसलिए जानना चाहिए कि पुनर्जन्म न हो।
आहार
जैसे बसंत ऋतु में वृक्षों की सुन्दरता तथा शोभा आदि गुण बढ़ जाते हैं, वैसे ही तत्त्व को जान लेने वाले मनुष्य में बल, बुद्धि और तेज आदि गुण बढ़ जाते हैं।
ज्ञान
ज्ञान तीर्थ है, धैर्य तीर्थ है, तप को भी तीर्थ कहा गया है, तीर्थों में भी श्रेष्ठ तीर्थ है मन की परम शुद्धता।
ध्यान
भीतर का अभिप्राय शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थ यात्रा, शास्त्र श्रवण और स्वाध्याय- ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।
धर्म
जिसने इन्द्रिय समूह को वश में कर लिया है, वह मनुष्य जहाँ निवास करता है वही तीर्थ बन जाता है।
संयम
ध्यान के द्वारा पवित्र तथा ज्ञान रूपी जल से भरे हुए, राग-द्वेष रूप मल को दूर करने वाले मानस तीर्थ में जो पुरुष स्नान करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।
ध्यान
१. जो अश्रद्धालु है, २. पापात्मा है, ३. नास्तिक है, ४. संशयात्मा है और ५. केवल तर्क वितर्क में ही डूबा रहता है–ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थ के फल को प्राप्त नहीं करते हैं।
भक्ति
'तृष्णा' सबसे बढ़कर पापिष्ठ तथा नित्य उद्वेग करने वाली बताई गई है, उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है, वह अत्यन्त भयंकर पाप रूपी गड्ढे में डालने वाली है, जहाँ-जहाँ 'तृष्णा' है वहाँ-वहाँ संसार है।
संतोष
जब तक मनुष्य तृष्णा से युक्त रहता है, तब तक समृद्धिशाली होने पर भी दरिद्र ही रहता है। 'तृष्णा' दुश्चरित्र स्त्री के समान मनुष्य को अनुचित कामों में प्रेरित करती है।
संतोष
यदि तुम्हारी इच्छाएँ अनंत होंगी, तो तुम्हारी चिंताएँ व भय भी अनंत होंगे।
संतोष
मान को त्याग कर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध को त्याग कर शोक नहीं करता है, काम को त्याग कर अर्थवान होता है, लोभ को त्याग कर सुखी होता है।
संयम
बाहर और भीतर जो कुछ भी मन को फँसाने वाली चीजें हैं, उन सबको छोड़ने से मनुष्य त्यागी होता है, केवल घर छोड़ देने से त्याग की सिद्धि नहीं होती है।
अनासक्ति
जब जगत् का वियोग निश्चित है, तब धर्म के लिए परिवार से स्वयं पृथक् हो जाना अवश्य श्रेष्ठ है।
अनासक्ति
आनन्दित रहने वाला हृदय उत्तम दवा है, निराश मन हड्डियों को भी सुखा देता है।
स्वास्थ्य
'आशा' उत्साह की जननी है, आशा में तेज है, बल है, जीवन है, आशा ही संसार की संचालक शक्ति है।
मन
उस व्यक्ति को क्या लाभ जो सम्पूर्ण विश्व को प्राप्त कर ले किन्तु अपनी आत्मा को भूल जाये। धन खोकर अगर हम अपनी आत्मा को पा सकें, तो यह कोई मँहगा सौदा नहीं है।
अनासक्ति
अन्तःकरण यदि मलिन और अपवित्र बना रहे, तो परमात्मा की उपासना भी फलवती न होगी अतः ईश्वर की उपासना निष्पाप हृदय से करें।
भक्ति
जो दूसरों को जानता है, वह विद्वान् है और जो स्वयं को जानता है वह बुद्धिमान है।
ज्ञान
प्रेम सब पर करो, विश्वास कुछ पर करो, बुरा किसी का भी न करो।
चरित्र
बिना श्रद्धा के किया हुआ शुभकर्म सब असत् कहलाता है वह न तो इस लोक में लाभदायक होता है न मरने के बाद परलोक में लाभदायक होता है।
भक्ति
श्रद्धा का अर्थ अंध विश्वास नहीं है, किसी ग्रन्थ में कुछ लिखा हुआ या किसी व्यक्ति का कुछ कहा हुआ अपने अनुभव बिना सच मानना श्रद्धा नहीं है।
विवेक
शान्ति मानव जीवन के लिए एक परम पावन और वांछनीय निधि है, शान्ति बाहर की से नहीं मिलती, वह अपने अंदर की वस्तु है।
मन
जो कुछ मिले उसी में संतोष रखना तथा दूसरों से ईर्ष्या न करना ही शान्ति की कुंजी है और शान्ति जैसा आनंद कहीं नहीं है।
संतोष
जिसके अंतरंग में शान्ति है, उसे बाह्य वेदना कभी कष्ट नहीं दे सकती है।
मन
जीवन में सम्पत्ति एवं स्वास्थ्य से भी अधिक मन की शान्ति का मूल्य है।
मन
अपनी आवश्यकताएँ कम करके आप वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकते हैं।
संतोष
असत्य में शक्ति नहीं है अपने अस्तित्व के लिए भी असत्य को सत्य का आश्रय लेना पड़ता है।
सत्य
किसी ने सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों को कभी भटकते नहीं देखा है।
सत्य
सत्य के लिए हर वस्तु की बलि दी जा सकती है, पर सत्य की बलि किसी भी वस्तु के लिए नहीं दी जा सकती है।
सत्य