Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 6

चिद् विलास, सबसे खास

105 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

यदि अन्तर्मन में आनंद हो तो स्वर्ग आपके साथ में है।
मन
स्वाद और स्वार्थ की चाह ही जीवन को तबाह करती है। स्वाद आदमी के स्वास्थ्य को बिगाड़ता है और स्वार्थ परमार्थ को बिगाड़ता है। स्वाद की अग्नि आदमी के तन को जलाती है और स्वार्थ की अग्नि आदमी के मन को जलाती है।
संयम
स्वार्थी व्यक्ति परमात्मा से दूर होते हैं।
चरित्र
जो मनुष्य प्रायश्चित्त, आयुर्वेद, ज्योतिष और धर्म निर्णय की बात शास्त्र के बिना कहता है उसे ब्रह्मघाती कहते हैं।
ज्ञान
एक सच्चा हृदय सारे संसार की विलक्षण शक्तियों से अधिक मूल्यवान है।
चरित्र
अधूरी श्रद्धा के गर्भ से भय का जन्म होता है।
भक्ति
श्रद्धा का अर्थ अन्धविश्वास नहीं है। किसी ग्रन्थ में कुछ लिखा हुआ या किसी व्यक्ति का कुछ कहा हुआ अपने अनुभव बिना सच मानना श्रद्धा नहीं है।
भक्ति
बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है वह सब असत् कहलाता है वह न तो इस लोक में लाभदायक होता है न मरने के बाद परलोक में सुखदायी होता है।
भक्ति
धर्म के क्षेत्र में श्रद्धा सर्वोपरि होती है।
भक्ति
जो श्रद्धा अनुभव की अपेक्षा नहीं रखती, वही सच्ची श्रद्धा है।
भक्ति
श्रद्धावान वही है जो विपत्तियों से घिर जाने पर भी डिगे नहीं।
भक्ति
संतोष गरीबों को अमीर बनाता है, असंतोष अमीरों को गरीब बनाता है।
संतोष
हित का बुद्धिगत उपाय ‘एकान्तवासी’ होकर स्वाध्याय तथा तप करना है।
ध्यान
जब त्यागी हुए तब आत्म कल्याण के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य का लक्ष्य नहीं बनाओ। लोग तो उद्धार, परोपकार और शुभोपयोग आदि शब्द कहकर राग की आग लगाकर अलग ही रहते हैं, जलना पड़ता है तुम्हें।
अनासक्ति
सोचना भूल है कि निरन्तर ज्ञानोपयोग नहीं रह सकता, रह सकता है, इतना जरूर है कि कभी कभी कम कभी ज्यादा।
ज्ञान
तुम कुछ बाह्य उपक्रम मत करो, बस इतना ही तो होगा की कोई तुम्हें जानेगा नहीं। सो परिचय उपक्रम में भी कोई तुम्हें जानता नहीं है बाह्य शरीर से परिचय हो जाने पर भी तुम्हें कुछ मिलता नहीं अथवा मिलता है तो विकल्पों का क्लेश/जानने वाले भी विनाशीक है, न जाना तो क्या? तुम तो तुम ही हो अपने में लीन होओ और अनंत सुखी होओ।
ज्ञान
किसी से खास परिचय करना विकल्पाग्नि का ईंधन है, महती विपत्ति है। आत्मा की तो विकल्प में हत्या ही होती रहती है।
अनासक्ति
अनिष्ट विषय में अरुचि का होना इष्ट विषयों में रुचि का द्योतक है।
अनासक्ति
भोग की इच्छा रोग है और भोग दवा है, रोग पैदा करके दवा करने (दबाने) में रुचि करना विवेकी पुरुष का कर्त्तव्य नहीं है, रोग पैदा ही न हो, इससे बढ़कर स्वास्थ्य नहीं है, अतः तत्त्वज्ञान से इच्छा को दूर करो।
विवेक
दूसरों को अपने अनुकूल करने में या दूसरों के अपने अनुकूल होने में क्या भलाई है? अरे! अपने को अपने वश में कर लो तो सर्वसिद्धि है।
संयम
कोई पुरुष किसी के प्रेम में आकर अपने आप को भूल जाता है तो क्या वह आत्मा में रुचि करके पर को नहीं भूल सकता है? आत्म रुचि करो सर्व चमत्कार व सिद्धि पा लोगे।
ध्यान
मान करन तें मर गये रहे न जिनके वंश। तीनों को तुम देख लो रावण कौरव कंश ॥
विनम्रता
संसार की असारता, दुःखों की अपारता। उलझ गये तो कुछ नहीं, सुलझ गये तो शाश्वता॥
अनासक्ति
महा पुण्यात्मा जीव ही गुरु आज्ञा में रहकर चारित्र का पालन करता है।
चरित्र
जब तुमने दुनिया को त्यागा, तब दुनिया के लिए तुम्हारी सत्ता नहीं रही यानि तुम कुछ नहीं रहे, फिर भी यदि जबरन किसी के कुछ बनना चाहो तो तुम्हारा यह जीवन व्यर्थ है और दुःखमय है।
अनासक्ति
लेखन, स्वाध्याय स्वाधीन है, सल्लेखना-कल्पवृक्ष है, ‘मौन’ मुमुक्षु का सर्वोपरि कार्य है।
ध्यान
प्रशंसा किए जाने पर संतुष्ट होना कापोत लेश्या है, प्रशंसा की चाह होना अशुभ परिणाम है।
विनम्रता
हम भीतर गये हम भी तर गये। तुम भीतर जाओ तुम भी तर जाओ अर्थात् आत्म ध्यान से कल्याण होता है।
ध्यान
अपने चैतन्य की विशुद्धि से अपना लाभ मानने वाला कभी प्रशंसा के शब्दों में हर्ष की आकुलता और निंदा के शब्दों में विवाद की आकुलता नहीं कर सकता।
विनम्रता
मृदुता से प्रभुता मिलती है।
विनम्रता
मेरा कर्त्तव्य तो निवृत्ति पथ गमन अर्थात् आत्मकल्याण करना ही है।
धर्म
मुझे लाभ नहीं, जो जनता मेरे समीप आवे, मुझे लाभ नहीं जो उपकार के कोई गुण गावे। कोई क्या कहेगा? यही तो कहेगा कि उपदेश दिये, इनका अच्छा प्रभाव है आदि। सोचो, जो पर पदार्थ के कर्तापन की बात लादे, वह ज्ञानियों की दृष्टि में सम्मान है या अपमान?
विनम्रता
कोई भी प्राणी तुम्हारे द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं है, ये तो सब स्वतन्त्र पदार्थ हैं, इनसे तेरा सम्बन्ध क्या है? अपने क्रोध–मान–माया–लोभ का तिरस्कार तेजी से करो, इन्हीं कषायों ने तुझे भटका रखा है और दुःखी कर रखा है।
क्षमा
‘समानता’ के भाव से अभिमान और दीनता का अभाव होता है।
विनम्रता
समता की साधना से मरण की चिन्ता भी नहीं होती है।
समाधि
निःस्पृह आत्मा ही समता रूप अमृत के पाने का अधिकारी है।
संतोष
अपनी आत्मा को प्रसन्न रखो, कोई अन्य प्रसन्न हों, चाहे न हों।
संतोष
गृहस्थों के चक्र में न पड़ना तथा निरपेक्ष त्यागी रहना, पत्थर पर सोना पर चटाई न माँगना, लँगोटी न मिले तो द्रव्य मुनि ही बन जाना, पर लगोटी न माँगना, सूखी रोटी मिल जावे तो खा लेना, पर घी की इच्छा न करना आदि, आत्म निर्मलता में ही तुम्हारा कल्याण है।
संयम
परमानन्द की प्राप्ति के लिए तो सबसे चित्त हटाना ही होगा।
ध्यान
राग-द्वेष बढ़ाना ही आत्मबल घटाना है, समता रखना ही आत्म बल बढ़ाना है।
अनासक्ति
सबसे दुर्लभ तो आत्मस्थिरता है, उसके पाने पर फिर कोई भी स्थिति पाने योग्य नहीं रहती।
ध्यान
आत्मन्! यह मनुष्यत्व अति दुर्लभ है, चिंताग्रस्त रहकर जीवन व्यर्थ मत करो।
मन
पापोदय में हानि नहीं किन्तु पापात्मा हो जाने में आत्मगुणों की हानि है।
कर्म
रागद्वेष मोह का निमित्त, आश्रय, आधार और विषय पर पदार्थ हैं। यदि किसी से कहा जाये कि तुम रागद्वेष मोह करो किन्तु शुद्धात्मा के सिवाय अन्य पदार्थ में मत करो तो वह कर ही कैसे सकता है।
अनासक्ति
जो आत्महित पर पहुँचा दे, वह सत् उद्देश्य है।
धर्म
राग की वेदना मेटने का उपाय तो यह है कि राग के विषयभूत पदार्थ को भिन्न समझो तथा उस राग को भी अपने स्वभाव से भिन्न एवं अहितकारी समझो।
अनासक्ति
मोक्षमार्ग के सेवक को धार्मिक संस्थाओं के झंझट में भी नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि लोग जुदे- जुदे ख्याल के होते हैं, अपने अभिप्राय के अनुकूल कार्य का होना अत्यन्त कठिन है।
अनासक्ति
मीठे वचनों से स्वागत ही सच्चा अतिथि सत्कार होता है।
वाणी
व्यवहार यद्यपि निश्चय नहीं हैं तो भी व्यवहार के होते हुए ही निश्चय मिलता हैं, जैसे दूध से घी आदि प्राप्त होते हैं।
ज्ञान
सुवर्ण के आभूषण का उपादान सोना ही है, परन्तु ढाँचे में ढलने का निमित्त पाये बिना आभूषण नहीं बनता है उसी प्रकार व्यवहार के बिना निश्चय प्राप्त नहीं होता।
ज्ञान
व्यवहार सर्वथा अभूतार्थ नहीं है क्योंकि अहिंसादि में धर्म का व्यवहार किया जाता है हिंसादि में नहीं? एवं अहिंसादि से निश्चय की प्राप्ति होती है।
अहिंसा
आत्मा अनादि अनन्त है तब मनुष्य पर्याय के व्यवहार में क्या रुचि रखना।
अनासक्ति
पर की अनुकूल परिणति नहीं स्वयं का विरक्ति भाव ही सुखी बनायेगा।
अनासक्ति
न तो यश हित का साधक है न अपयश, बल्कि इच्छा का अभाव हित का साधक है।
संतोष
आत्मा का महत्त्व स्वयं है, पर निंदा आत्म प्रशंसा से नहीं, समुद्र की महत्ता स्वयं है तालाबों की तुच्छता बताने से नहीं।
विनम्रता
तत्त्वदर्शी बनकर स्व-पर कल्याण में तत्पर रहना ही मनुष्य जन्म का सार है।
ज्ञान
पापानुबंधी पुण्य नहीं पुण्यानुबंधी पुण्य सुशील है क्योंकि वह मोक्ष का कारण होता है।
कर्म
जब एक गृहस्थ मुनि दीक्षा नहीं दे सकता है तो भगवान् को दीक्षा कैसे दे सकता है? सबसे बड़ी बात ऐसे लोग जो बिना मुनि से सूरि मंत्र की प्रतिष्ठित मूर्तियों की पूजा कर रहे हैं, उनमें से किसी का भी समाधिमरण नहीं देखा जा रहा है।
भक्ति
भगवान् के गुणों की प्राप्ति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करना शुभोपयोग है।
भक्ति
आत्मा-परमात्मा का राग नहीं माना जाता जैसे दर्पण में हम अपने को सम्हालते हैं।
भक्ति