Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 6

चिद् विलास, सबसे खास

105 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

‘‘पावन मेरे नयन भये तुम दरश तैं, पावन पाणी भये तुम चरणन परस तैं। पावन मन हो गयो तिहारे ध्यान तैं, पावन रसना मानी तुम गुण गानतै ॥’’
भक्ति
जो आत्म कल्याण में लगा है उससे जीवों का कल्याण व रक्षा होती ही हैं।
धर्म
किसी वस्तु से लगाव होना राग है और उसके बिना न रह पाना मोह है।
अनासक्ति
सबमें न वह योग्यता, मिले न सबको मोक्ष। बीज सीझते सब कहाँ, जैसे ठरा मोठ ॥
कर्म
मूर्छित, सुसुप्त अवस्था में भी आत्मा पर मन्त्रों का प्रभाव होता है संक्लेश खत्म होता है अतः समाधिमरण पाठादि सुनाना चाहिए।
समाधि
कभी पुण्योदय से शुभ निमित्त मिलते हैं कभी शुभ निमित्तों से पुण्य की उदीरणा होती है इसी तरह कभी के उदय से अशुभ निमित्त मिलते हैं, कभी अशुभ निमित्तों से पाप की उदीरणा हो जाती है, अतः शुभ निमित्त जुटाना चाहिए।
कर्म
भगवान् जगत् के लिए मंगलकारी हो इसलिए प्रतिमा के नीचे स्वस्तिक आदि रखे जाते हैं।
भक्ति
आत्म शुद्धि पर अधिक लक्ष्य रखो। तुम्हारे क्षमादि भाव ही तुम्हारे रक्षक हैं और कोई रक्षा करने वाला नहीं है।
क्षमा
बाह्य कार्य कोई भी अपने ऊपर मत लो, इस मनुष्य जीवन के क्षण ही कितने है? आत्मा का लाभ शुद्धात्मा के ज्ञान व ध्यान से है।
ध्यान
इस असार परिवर्तनशील संसार में प्रतिष्ठा का व्यामोह करना घोर दुःखों का कारण है।
अनासक्ति
परवस्तु को ग्रहण करने वाला चोर कहलाता है, परन्तु तुम तो सतत पर को अपना मानते हो धिक्कार ऐसी चोर जैसी जिन्दगी को।
अनासक्ति
जो प्रत्येक साधन का लक्ष्य शुद्धात्म तत्त्व को बनाता है, वह शिवपथिक है।
धर्म
सम्मान का अभाव अखरना, दूसरे अच्छी दृष्टि से न देखे तो अखरना, पड़ोसी से अधिक वैभव न हो तो अखरना, पर आत्माओं से स्नेह होना ये सब पर द्रव्य को अपना मानने के कारण होता है। अनात्म दृष्टि पिशाचिन की करतूत है।
अनासक्ति
आत्म शान्ति के लिए परिचय, उपकार, कषाय, विषयाभिलाषा छोड़ना होगी।
संयम
त्याग में पराधीनता नहीं सामाजिक बातों में बहुत पराधीनता है।
संयम
हे देव! मुझे अनंत दर्शन नहीं आत्म दर्शन की चाह है। धन, वैभव और कीर्ति आदि से अपने को बड़ा मत समझो, वे तो पर वस्तु हैं, अपने को बड़ा समझो अपनी वस्तु अर्थात् दर्शन, ज्ञान और चारित्र की स्वच्छता या वृद्धि से।
ज्ञान
आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ अच्छा आदर्श छोड़कर जाना अध्यात्म का एक हिस्सा है।
चरित्र
खलनायक पथभ्रष्ट और नायक सत्यनिष्ठ होता पर जैन संस्कृति मूलनायक बनने की है।
चरित्र
डेढ़ घंटे में १० मिनट सप्ताह में एक दिन एक महीने में २-३ दिन एक वर्ष में ८-१५ दिन सपरिवार तीर्थक्षेत्र पर या साधु संगति में धर्मध्यान कर मनोरंजन करें।
धर्म
भगवान् नहीं कहते मुझे मन्दिरों में बसाओ, वे कहते हैं मुझे दिल में बसाओ।
भक्ति
निष्कपटता की परीक्षा स्वार्थ साधन के अवसर पर होती है। छलने से आत्मा मलिन होती, छले जाने से नहीं।
चरित्र
भविष्य में स्वप्नवत् हो जाने वाली घटना को अभी स्वप्न वत समझो तो महती शान्ति मिलेगी।
अनासक्ति
विभाव-विकार के वियोग से मोक्ष मिलता है, अतः अच्छा है।
अनासक्ति
सांसारिक सुख रेत का घर है और उसका फल उसे मिटना ही है।
अनासक्ति
यदि तुम कल्याण व उन्नति चाहते हो तो दूसरों के कल्याण व उन्नति में ईर्ष्या मत करो प्रत्युत उनके कल्याण व उन्नति की भावना रखो क्योंकि मात्सर्य भाव स्वयं अकल्याण है, इस अशुभ प्रयोग के रहते उन्नति हो ही नहीं सकती है।
क्षमा
जब तुम्हें कोई चिंता हो, तब अखण्ड अविनाशी अपने ज्ञायकभाव का चिंतन करो, इसके ध्यान के प्रताप से तत्काल चिंता नष्ट हो जाती है।
ध्यान
संसार में सार क्या है, जिसके लिए असंतोष किया जाय असंतोष तो दरिद्रता है।
संतोष
जो सबसे बड़ा और मालिक बनना चाहेगा वह संतोष नहीं पा सकेगा।
संतोष
चिंता-शंका से रहित, परमात्म गुणस्मरण-आत्म स्वरूपलीनता ही मोक्ष का उपाय है।
ध्यान
‘‘सुख पर में और पराधीनता में नहीं निज में और निजाधीनता में है’’ अतः ज्ञायक बनो।
संयम
पर पदार्थ की उधेड़बुन में समय क्यों खोते हो? भगवान् के ज्ञान में जो झलका है वह तो होकर ही रहेगा, तुम्हारे सोचने से क्या होता है।
संतोष
स्वाधीन कार्य शान्ति में अधिक सहायक है, सत्समागम व सेवा पराधीन है, स्वाध्याय बहुशः स्वाधीन है। ‘‘जो विषय-कषाय में बंधा है वह पराधीन है।’’
संयम
विषयों और प्रतिष्ठा में बुद्धि का न फँसना ही स्वतंत्रता है स्वतंत्र व्यक्ति ही तत्त्वतः सुखी होता है, निर्विकल्प आत्मा का अनुभव ही तुम्हारा कष्ट हरेगा।
संयम
धर्म में अनुराग हुए बिना धर्मात्मा की सेवा नहीं हो सकती व धर्म में दृष्टि हुए बिना संसार से पार होने का पात्र नहीं हो सकता है।
धर्म
जिन पदार्थों के देखने से राग-द्वेष बढ़े उनका देखना और सुनना भी अपशकुन है।
अनासक्ति
जिन पदार्थों के देखने-सुनने से राग-द्वेष मोह में शैथिल्य हो उनका देखना-सुनना शुभ शकुन है।
अनासक्ति
पर पदार्थ में ममत्व रखने के कारण अनन्त काल से दुःख भोगा है, पर पदार्थ अपना होता नहीं है, फिर ममत्व क्यों करना?
अनासक्ति
जब-तक राग रहेगा चाहे वह धार्मिक संस्था का भी क्यों न हो, निर्भय और निःशल्य नहीं रह सकोगे, निर्मलता ही अलौकिक वैभव है और वही सहायक है।
अनासक्ति
आशा व तृष्णा का स्वभाव ही आकुलता उत्पन्न करना है चाहे वह धार्मिक कार्य की ही क्यों न हो अतः प्रत्येक कार्य के ज्ञाता-दृष्टा बने रहो।
संतोष
कोई भी घटना होने पर ‘‘ऐसा तो होना ही था, अनहोनी तो नहीं हुई है फिर उस सम्बन्ध में कुछ भी विकल्प करना व्यर्थ है एवं आगामी दुःख के लिए नया बंध बांधना है।’’
संतोष
अनासक्ति की परीक्षा इष्ट अनिष्ट द्रव्य के लाभ होने में होती है।
अनासक्ति
निःस्वार्थ भाव ही अमृत है और निःस्वार्थ भाव से कार्य करना ही अमृतपान है।
चरित्र
दुःख में दुःखी, सुख में सुखी रहने वाला पुरुष अधम है, दुःख में भी सुखी रहने वाला मध्यम पुरुष है, दुःख सुख में समान रहने वाला उत्तम पुरुष है और दुःख सुख की कल्पना से भी रहित है वह उत्तमोत्तम है।
संतोष
इच्छा करना अपनी आत्मा को दुःखी करना है। जिसकी इच्छा की जाती है उसका परिणमन उसके होनहार से होता है इच्छा से अपना बिगाड़ करने के अलावा और कुछ नहीं होता। कदाचित् इच्छा के अनुकूल उसी की होनहार से कुछ हो भी जावे तो भी राग रूपी कीचड़ लपेट देने के सिवाय आत्मा को और क्या मिल जाता है?
अनासक्ति
जगत् में केवल रोने वाले ही पापी नहीं है किन्तु हँसने वाले भी पापी समझिए क्योंकि जैसे उनके अरति शोक मोहनीय पाप का उदय है, इनके भी हास्य, रति, मोहनीय पाप का उदय है, पुण्यात्मा तो वे हैं, जिनकी रुचि परमात्मा या निज शुद्धात्मा में है।
कर्म