Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 59

संस्कृति की रक्षा संस्कारों से

108 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

किसी व्यक्ति की संस्कृति का पता इस बात से चलता है कि वह झगड़े के समय कैसा आचरण करता है।
चरित्र
स्व-पर कल्याण की भावना से संत बनना बहुत कठिन हैं।
धर्म
इंसान की जिन्दगी के हार जीत का फैसला उसकी सन्तान करती है, अगर संस्कारित और कमाऊ संतान है तो जीत है अगर आवारा बेकार है तो करोड़ों की कमाई हुई पूँजी होते हुए भी हार है। आने वाली पीढ़ी को महावीर के चित्र ही नहीं चारित्र भी सौंपने होंगे क्योंकि चित्र से चित्त और चारित्र से जीवन पवित्र होता है।
परिवार
शादी के बाद बेटे की बुद्धि बिगड़ जाती है अतः भविष्य की सोचकर अपने बुढ़ापे के लिए कुछ बचाकर रखिए।
परिवार
संतोषी कभी प्रश्न नहीं उठाता है।
संतोष
पाप कर्म की ओर व्यक्ति पहले देखता है, फिर सोचता है, फिर बढ़ता है और फिर उसमें लिप्त हो जाता है।
कर्म
अपनी संतानों में माँ ही संस्कार के बीज डालती है और पिता उन संस्कारों का संरक्षण व संवर्द्धन करते हैं।
परिवार
संस्कृति की सुरक्षा संस्कारित संतानों पर ही निर्भर है।
परिवार
अच्छे संस्कार वे रीतियाँ हैं, जो योग्यता प्रदान करती है।
चरित्र
बचपन के संस्कार जीवन में वृद्धावस्था तक निरंतर मार्गदर्शन करते हैं।
चरित्र
माँ रोती थी जब रोटी नहीं खाता था बेटा, माँ आज भी रोती है जब रोटी नहीं खिलाता है बेटा।
परिवार
बूढ़े माँ-बाप दौलत नहीं कमाते पर दौलत व सन्तान की रक्षा अवश्य करते हैं।
परिवार
पात्र और कुपात्र में बहुत अन्तर है गाय सूखी घास खाकर भी दूध देती है और साँप मीठा दूध पीकर भी जहर उगलता है।
संगति
जो माँ बाप को स्वर्ग ले जाता है वो बेटा होता है, जो स्वर्ग को घर ले आए वो बेटी होती है और घर को ही स्वर्ग बना दे वो बहु होती है।
परिवार
रिश्ते चाहे कितने ही बुरे हों मगर उन्हें तोड़ना मत क्योंकि पानी चाहे कितना भी गंदा हो अगर प्यास नहीं बुझा सकता तो आग तो बुझा सकता है।
परिवार
हम शिक्षा से पैसा कमा सकते हैं लेकिन जीवन में नैतिक मूल्य सिद्धान्त, आचरण केवल संस्कारों से ही पा सकते हैं।
चरित्र
हमारे संस्कार हमारी नींव हैं, हमारी धरोहर है इसलिए देश का हर बच्चा संस्कारित हो यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
चरित्र
परमार्थतः बड़े लोगों का अलंकार विनयातिशय है, स्नादिक तो शिलाभार है।
विनम्रता
बुद्धिमान को चाहिए कि किसी का वेष देखकर विश्वास न करें क्योंकि वेष तो दोष के लिए भी ग्रहणकर लिया जाता है।
विवेक
वैर पाँच कारणों से होता है–स्त्री के लिए, घर और जमीन के लिए, कठोर वाणी के कारण जातिगत द्वेष के कारण और किसी समय किए हुए अपराध के कारण।
क्षमा
संसार में उपकारी और कृतज्ञ व्यक्ति दुर्लभ हैं।
चरित्र
जो विद्या और सदाचार से सम्पन्न है वह सब देवताओं और मनुष्यों में श्रेष्ठ है।
चरित्र
मार्ग में जीव बचाकर पाँव रखना चाहिए, वस्त्र से छान कर पानी पीना चाहिए, शास्त्रानुसार हितकारी थोड़ी वाणी बोलना चाहिए, पवित्र मन से सदाचार का पालन करना चाहिए।
अहिंसा
यह समाज शब्द का अर्थ है। जिसमें लोग मिलकर, एक साथ एक गति से, एक से चलें वही समाज है।
संगति
सुन्दर वह जो सुन्दर कार्य करें।
चरित्र
मुस्कुराते हो तो एक दम बच्चे लगते हो, हँसते हो तो एक दम अच्छे लगते हो।
विविध
जो अपने नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे उत्तम, जो पिता के नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे मध्यम, जो मामा के नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे अधम और जो श्वसुर के नाम से प्रसिद्ध होते हैं वे अधमाधम मनुष्य हैं।
चरित्र
महान् पुरुष अपने कामों में काल का अतिक्रमण नहीं होने देते हैं।
समय
अंत समय सुधारना हो तो प्रतिक्षण सुधारो।
समाधि
कुलीन व्यक्ति में प्रसन्न मुख, दान, मधुर बोल तथा दूसरों की निंदा न करना ये चारों गुण स्वाभाविक होते हैं।
चरित्र
गुणियों में गुणों के रहते हुए भी चुगलखोर उनके दोष मात्र को ही ग्रहण करता है, जैसे ऊँट वृक्ष के पुष्प और फल से विरक्त होकर काँटों के ढेर को ही ग्रहण करता है।
वाणी
आज पूरे विश्व में हमारी संस्कृति की अलग ही पहचान है तो संस्कारों से, हमारी शिक्षा पर तो पाश्चात्य संस्कृति ने कब्जा कर लिया है लेकिन हमारे संस्कारों को हमें जीवित रखना होगा।
चरित्र
जो स्वयं को हर परिस्थिति के अनुसार ढालना जानता है, उसे जीवन जीने की कला आ जाती है।
विवेक
कई बार हम सोचते हैं कि परिवर्तन के लिए समय लगता है, लेकिन परिवर्तन तो उसी क्षण से संभव है जिस क्षण आपने सोच लिया कि बदलना है।
पुरुषार्थ
अभिभावक अपने बच्चों को बहुमूल्य समय दें। पैसों से सब खुशियाँ खरीदना संभव नहीं है। बड़ी खुशियाँ पाने के लिए छोटे-छोटे बलिदान आवश्यक हैं।
परिवार
बच्चों के मित्र बनकर उन्हें मार्गदर्शन देवें उनसे दूरी बनाकर न रखें।
परिवार
बच्चा ८वीं कक्षा में आये तो कुछ वर्षों के लिए आप गरीब बन जायें।
परिवार
जब तक बच्चे स्वयं नहीं कमाते उन्हें पेट्रोल या मोबाइल पर खर्च करने का कोई अधिकार नहीं है।
परिवार
जब बच्चे मित्र बनाते हैं तो इस पर नजर रखें और समझाये कि ये रिश्ते अच्छी मित्रता तक ही सीमित रहें, जीवनसाथी का चयन जाति के अन्तर्गत ही हो।
परिवार
पिता पुत्र में मित्रता का माहौल बच्चों को अपने भविष्य निर्माण में अहम् भूमिका निभाता है। 'लक्ष्य को गुप्त रखकर दृढ़ रहिये।'
परिवार
मरणासन्न की जिस स्तुति पाठादि में रुचि है वही सुनाना चाहिए यदि जीवन में धर्म नहीं किया हो तो संसार का स्वरूप समझाते हुए विषय-कषाय का त्याग कराकर दानादि की प्रेरणा करना चाहिए।
समाधि
बड़ों की यही रीति है कि मुख से बिना बोले ही व्यवहार से छोटों को विनय सिखा देते हैं।
विनम्रता
अविनयी लोगों की सम्पत्तियों का अंत विपत्ति में हो जाता है।
विनम्रता
बलवान का बल उसकी विनय शीलता में है शत्रुओं को परिवर्तित करने के लिए बुद्धिमान का शस्त्र यही है।
विनम्रता
विवेक से रहित लोगों का सैकड़ों प्रकार से पतन होता है।
विवेक
संकट पहले अज्ञान और दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं और फिर ज्ञान और शक्ति की प्राप्ति कराते हैं।
पुरुषार्थ
वास्तविक एकता उन्हीं लोगों की हो सकती है जो कि समान आचार-विचार वाले, समान परम्परा वाले, समान संस्कृति वाले और समान ध्येय युक्त होते हैं।
संगति
संगठन शक्ति है और उसका रहस्य आज्ञा पालन है।
संगति
संगीत का गुण यही है कि वह वन में विचरण करने वाले हिरण को भी मन्त्र मुग्ध कर लेता है।
विविध
संगीत किस मनोवेग को जगा और शांत नहीं कर सकता है?
विविध
फालतू सम्पत्ति केवल फालतू वस्तुएँ ही खरीद सकती है।
धन
विश्व एक विशाल ग्रन्थ है और जो कभी घर के बाहर नहीं जाते वे केवल उसका एक ही पृष्ठ पढ़ पाते हैं।
ज्ञान
सज्जन प्रत्यक्ष और परोक्ष में समान व्यवहार करते हैं।
चरित्र
जो बुरा भला कहे जाने पर भी क्रोधित नहीं होता है, न हि अनुचित बोलता है धैर्य शौर्य आदि धर्मों से युक्त होने पर भी जो घमंड नहीं करता है, निरंतर विपत्तियाँ आने पर भी जो कातर नहीं होता है वह सज्जन कहलाता है।
क्षमा
सदाचार से हीन मनुष्य का केवल ऊँचा कुल मान्य नहीं हो सकता है क्योंकि नीच कुल में उत्पन्न मनुष्य का भी सदाचार श्रेष्ठ माना जाता है।
चरित्र
आचारवान पुरुष ही आयु, धन, पुत्र, शौर्य, धर्म तथा शाश्वत भगवद् धाम एवं यहाँ पर विद्वत् समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।
चरित्र
विश्व के साथ अविरोध प्राप्त करने की पद्धति समन्वय है।
विविध
अनेक तपस्या तथा साधना के फल से ही मनुष्य सरल तथा उदार बनता है। सरल हुए बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती है सरल और विश्वासी के समीप ही प्रभु अपना स्वरूप प्रकट किया करते हैं।
भक्ति
यदि तुम छोटे बालकों के समान सरल नहीं बनोगे तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पाओगे।
विनम्रता
ज्ञान राशि के संचित कोश का नाम ही साहित्य है।
ज्ञान