Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 1 · अध्याय 59

संस्कृति की रक्षा संस्कारों से

108 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

किसी से ऐसा मत कहो कि तुम बुरे हो वरन् उससे यह कहो, तुम अच्छे हो और भी अच्छे बनों।
वाणी
संसार रूपी कटु वृक्ष के ये दो फल अमृत के समान हैं–एक तो सुभाषित का रसास्वादन और दूसरा सज्जनों का समागम।
संगति
वह लकड़ी की बात करता है तो बढ़ई ही होगा।
विविध
अच्छा पुत्र वह नहीं जो माँ-बाप को अपने पास रखता है, बल्कि वह है जो खुद माँ-बाप के पास रहता है।
परिवार
हम परिवार में सिर्फ एक-दूसरे की कमियाँ ही न देखें वरन् उनकी खूबियाँ भी स्वीकार करें। परिवार का हर सदस्य मुखिया न बने बल्कि बुजुर्ग को ही मुखिया रहने दें लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि मुखिया को हिटलर नहीं होना चाहिए।
परिवार
एक भी बड़ा दोष समस्त गुण समूह को दूषित कर देता है।
चरित्र
संसार में जो लोग बड़े काम करते हैं, उनका व्यवहार हमारे समान साधारण लोगों के साथ यदि अक्षर-अक्षर न मिले, तो उन्हें दोष देना असंगत है, यहाँ तक कि अन्याय है।
विवेक
जैसे उत्साह स्त्रियों का गुण है उसी तरह गंभीरता पुरुषों का गुण है।
विविध
सर्वोत्तम पुरुष स्वर्ग, निकृष्टतम पुरुष धरती, सर्वोत्तम नारी स्वर्ग, निकृष्टतम नारी नरक जैसी होती है।
विविध
पुरुष स्त्रियों को जितना समझ पाते हैं, उससे अधिक स्त्रियाँ पुरुषों को समझ लेती हैं।
विविध
भिन्न-भिन्न रुचि वाले लोगों के लिए प्रायः नाटक ही एक ऐसा उत्सव है, जिसमें सबको एक-सा आनन्द मिलता है।
विविध
युद्ध जीतने से ही नहीं इन्द्रियों को जीतने से सच्चा शूरवीर होता है। वाक्पटुता से ही नहीं जो हितकर वचन बोले वही सच्चा वक्ता है और केवल धन का दान करने से ही नहीं जो दूसरों का मान सम्मान करे वही सच्चा दाता है।
संयम
पतंगों की तरह कुमारियाँ सदा चमक में फँस जाती हैं।
विविध
छिपकर किया गया पाप जीवनभर कांटे की तरह चुभता है।
कर्म
पिता के प्रति पुत्र का प्रत्युपकार लोगों से यह कहलाना ही है कि न मालूम इसके पिता ने ऐसे पुत्र की प्राप्ति के लिए कैसा तप किया था?
परिवार
प्रतिभा को बढ़ाने के लिए अभ्यास से संस्कार को ताजा करने के अतिरिक्त दूसरा उपाय नहीं है।
पुरुषार्थ
अपूर्व वस्तु के निर्माण में समर्थ प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं।
ज्ञान
प्रतिभा तो स्वतंत्रता के वातावरण में ही मुक्त साँस ले सकती है।
ज्ञान
किसी व्यक्ति की सभा में बैठकर तो उससे ईर्ष्या रखने वाले भी उच्च स्वर में उसकी प्रशंसा कर देते हैं परन्तु विद्वान् मनुष्य को उन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। सच्चा सौहार्द वह होता है जब पीठ पीछे प्रशंसा की जाये।
चरित्र
वह मुख जो शीघ्र न खिले वह देखने योग्य ही नहीं है। वह अक्षर जिसमें कोई तात्पर्य नहीं वह सुनने योग्य नहीं है।
विविध
यह सत्य है कि सब ऐसे भाग्यशाली नहीं होते कि उन्हें कोई प्यार करे, पर यह तो हो सकता है कि वह स्वयं किसी के सुख-दुःख में हाथ बँटा कर अपना जन्म सार्थक कर ले।
विविध
अहो! छोटे लोगों का हृदय सुकुमार होता है क्योंकि वे हृदय में आये हुए अप्रिय को सहसा बक डालते हैं और उसे ही 'मनीषी' लोग पेट में पचा डालते हैं।
वाणी
सरस और कोमल स्वभाव के लोग नीरस और निष्ठुर मन वालों को भी उस प्रकार खींच लेते हैं जैसे चुम्बक लोहे को खींच लेता है।
चरित्र
महापुरुष धनी होने पर भी उन्मत्त नहीं होते हैं युवक होने पर भी चंचल नहीं होते हैं और शक्तिशाली होने पर भी प्रमत्त नहीं होते हैं।
संयम
शास्त्र को जानने वाला भी जो पुरुष लोक व्यवहार में पटु नहीं होता है, वह मूर्ख के समान है।
ज्ञान
दिव्य मृत्यु दिव्य जीवन से कहीं उत्तम है।
समाधि
सबसे अंतिम शत्रु जिसका विनाश किया जायेगा, वह है मृत्यु।
समाधि
शांत अन्तःकरण वज्रपात में भी सो लेता है।
मन
किसी महान् व्यक्ति के अनुयायी प्रायः अपनी आँखें बन्द रखते हैं ताकि वे उनका गुणगान अधिक अच्छी रीति से कर सकें।
भक्ति
सज्जन आत्मीयता से देखते हैं तो सब दुःख हर लेते हैं और आत्मीयता से बोलते है तो सब सुख प्रदान करते हैं।
चरित्र
जीवन स्वयं में न तो अच्छा होता है, न बुरा, जैसा तुम इसे बना दो, यह तो वैसा ही अच्छा या बुरा बन जाता है।
मन
अनेक विद्याओं का अध्ययन करके भी जो समाज के साथ मिलकर आचरण युक्त जीवन व्यतीत करना नहीं जानते हैं, वे अज्ञानी ही समझे जायेंगे।
ज्ञान
अत्याचारी, सबसे अधिक स्वयं के प्रति अत्याचारी होता है।
चरित्र
फल रहित वृक्ष की छाया भी शीतल होती है, भाई गुण हीन भी अच्छा होता है, जो पराया है, वह तो पराया ही है।
परिवार
अहिंसापूर्वक सत्य का आचरण करके आप संसार को अपने चरणों में झुका सकते हैं।
अहिंसा
सत्कारपूर्वक स्वीकार किया गया सत्कार ही संतोष उत्पन्न करता है।
संतोष
खान से निकले हुए सर्वोत्तम रत्न को भी सोने में जड़ने की आवश्यकता तो पड़ती ही है। उत्तेजना में विचार मन्द हो जाता है।
मन
आशा जल-पान के रूप में अच्छी है, भोजन के रूप में खराब।
विविध
जिस प्रकार अन्न की उत्पत्ति के लिए आदर्श बीज भंडारों की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मानव विकास के लिए श्रद्धालु, संतोषी एवं दृढ़व्रती व्यक्तियों के आश्रमों की आवश्यकता होती है।
धर्म
गुरुजनों के शासन से शून्य किस के बाल्यकाल में उद्दण्डता नहीं आती है ?
संयम
मनुष्य उत्सव प्रेमी होते हैं।
विविध
किसी देश की उन्नति छोटे विचार के बड़े आदमियों पर नहीं किन्तु बड़े विचार के छोटे आदमियों पर निर्भर है।
समृद्धि
स्फटिक मणि के समान मन के निर्मल होने पर गुरु के उपदेश या गुण चन्द्र किरणों की भाँति सरलता से प्रवेश करते हैं।
मन
अपना हित करने वाली बातें पहले सुनने में कड़वी लगती हैं, परखने से अंत में वे ही बातें अत्यन्त प्रिय होती हैं।
विवेक
अन्य किसी वस्तु को हम इतनी अनिच्छा से नहीं स्वीकारते जितना उपदेश को।
विविध
बिना माँगा परामर्श ही सबसे सस्ती वस्तु हैं क्योंकि आपूर्ति अधिक है माँग कम है।
विविध
थोड़ा-सा ऐश्वर्य पाकर भी दुष्ट व्यक्ति प्रायः अभिमानी हो जाता है, परन्तु बहुत ऐश्वर्य पाकर भी सज्जन शांत ही रहता है।
चरित्र
अकेला औचित्य गुण ही गुणों की बड़ी राशि के समान महत्त्वपूर्ण है, औचित्य गुण के बिना तो गुणों का समूह भी विषाक्त हो जाता है।
विवेक