Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Devotion

भक्ति

456 सूत्र · पृष्ठ 3 / 7

रात–दिन भगवान् के भजन–ध्यान में तल्लीन रहने वाले व्यक्ति से संसार का जो हित होता है, वह रात–दिन कर्म करने वालों से नहीं होता है।
भक्ति
मंदिर जी में देव दर्शन को जाएँ तो हाथ भरा एवं मन खाली करके जायें।
भक्ति
बुद्धि की शुद्धि के लिए भगवान् की भक्ति से बढ़कर कोई भी साधन आज तक अनुभव में नहीं आया है।
भक्ति
भक्ति में एक अद्भुत शक्ति है, भक्ति से शक्ति, शक्ति से युक्ति और युक्ति से मुक्ति प्राप्त होती है अत: जीवन की नैया को भक्ति रूपी डोरी से जोड़ दो क्योंकि भक्ति ही भगवान् बनने की सच्ची राह है।
भक्ति
भगवान् से रागी और विषयों से वीतरागी बनो।
भक्ति
मंदिर बनता है धन से, लेकिन पूजा होती है मन से।
भक्ति
जो जिन प्रतिमा, जिन मन्दिर तथा सिद्धान्त ग्रन्थों का निर्माण कराते हैं उनको अपने परिणामों में विशुद्धि के कारण अविनाशी फल प्राप्त होता है।
भक्ति
जो भी परिस्थति सामने आ जाये, उसी में प्रसन्न रहना 'भजन' है।
भक्ति
भगवान् का भजन करते समय संसार को याद नहीं करना चाहिए और संसार का काम करते समय भगवान् को भूलना नहीं चाहिए।
भक्ति
जो व्यक्ति देव, गुरु और धर्म की उपासना के उद्देश्य से स्नान नहीं करता उसका स्नान मत्स्य, मगर आदि जलचर जीवों के स्नान की तरह व्यर्थ है।
भक्ति
शास्त्र के अनुसार मन्दिर समवसरण का प्रतीक है लेकिन व्यवहार से मन्दिर एक विद्यालय, न्यायालय, चिकित्सालय, जलाशय, उद्यान का प्रतीक भी है।
भक्ति
जिस प्रकार समवसरण में नरकगति के जीव नहीं जाते, उसी प्रकार मन्दिर जी में भावी नारकी जीव भी नहीं जाते हैं।
भक्ति
संसार का आश्रय लेने से पराधीनता और भगवान् का आश्रय लेने से स्वाधीनता प्राप्त होती है।
भक्ति
जब तक मनुष्य भगवान् का सहारा नहीं लेगा, तब तक कोई भी सहारा टिकेगा नहीं, अत: जन प्रिय नहीं जिनेन्द्र प्रिय बनो।
भक्ति
स्वच्छ हृदय में ही प्रभु का वास होता है।
भक्ति
भगवान् से विमुख होते ही जीव अनाथ हो जाता है।
भक्ति
आत्म समर्पण के बिना प्रभु अनुभूति संभव नहीं है।
भक्ति
परमात्मा को देखने के लिए चर्म चक्षु नहीं, श्रद्धा की आँख चाहिए।
भक्ति
दूरदर्शन से नहीं देवदर्शन से आत्मरंजन होता है।
भक्ति
हमारे कर्म ही हमें प्रभु की कृपा के योग्य बनाते हैं, न कि हमारे वचन।
भक्ति
कामना की धूल भक्ति के दर्पण को गन्दा कर देती है।
भक्ति
प्रभु का चिन्तन करो, तुम्हारी चिन्ता प्रभु स्वयं करेंगे।
भक्ति
तीर्थ हमारी साधना और उपासना के केन्द्र हैं, तीर्थ हमारी आस्था और भक्ति के केन्द्र हैं।
भक्ति
तीर्थयात्रा वही सार्थक या सफल है, जिसमें मानव दुष्कृत्य का परित्याग कर देवे।
भक्ति
मानसिक उद्वेग पर प्रभु नाम वही काम करता है, जो आग पर पानी करता है।
भक्ति
निराधारों के लिए परमात्मा का सबसे बड़ा आधार है।
भक्ति
जैसे मन्दिर के बाहर अपने पदत्राण उतार देते हो वैसे ही अपनी मान्यताओं, परम्पराओं को बाहर छोड़ देना चाहिए।
भक्ति
जो जिनपूजा अनेक जन्म सम्बन्धी पापों को नष्ट कर देती है वह क्या प्राणियों के पूजा सम्बन्धी विधि से होने वाले पाप को नष्ट नहीं करेगी?
भक्ति
पवित्र मन से पूजा करने वाला आज का पुजारी ही कल का परमात्मा है।
भक्ति
प्रार्थना वाणी से नहीं हृदय से करने की चीज है।
भक्ति
प्रार्थना पश्चाताप का एक चिन्ह है तथा प्रार्थना में असीम शक्ति है।
भक्ति
प्रार्थना पदार्थ के लिए नहीं अपितु परमार्थ के लिए होना चाहिए।
भक्ति
असहाय अवस्था में प्रार्थना के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है।
भक्ति
सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना प्रभु स्वीकार करता है।
भक्ति
प्रार्थना और उपवास आत्मशुद्धि की एक अत्यन्त शक्तिशाली प्रक्रिया है।
भक्ति
यदि आपकी प्रभु–प्रार्थना, याचना से युक्त हो तो कर्ममुक्त नहीं कर सकती है।
भक्ति
प्रार्थना के साथ कामना और साधना के साथ वासना हो तो साधक का पतन हो जाता है।
भक्ति
जो बिना प्रार्थना किए सोता है, वह हर दिवस को दो रात बनाता है।
भक्ति
हृदय की सच्ची प्रार्थना से हमें सच्चे कर्त्तव्य का पता चलता है, अन्त में तो कर्त्तव्य करना ही प्रार्थना बन जाती है।
भक्ति
प्रार्थना जीभ से नहीं हृदय से होती है इसी से गूँगे, तोतले और मूढ़ भी प्रार्थना कर सकते हैं।
भक्ति
प्रार्थना चिन्ता को ठण्डा और पत्थर को मोम कर सकती है।
भक्ति
प्रार्थना तूफान को रोक सकती है और डूबती नैया को किनारे लगा सकती है।
भक्ति
जैसे आप बीमारी में साँस लेना नहीं छोड़ते वैसे ही कष्टों में भजन करना नहीं छोड़ना चाहिए।
भक्ति
मनुष्य का शरीर भारत की लोकसभा जैसा है, इस शरीर में सभी मंत्रालय हैं–प्राण प्रधानमंत्री है, सिर शिक्षामंत्री है, कान दूरसंचार मंत्री, जुबान सूचना व प्रसारण मंत्री है, पेट खाद्य मंत्री है, हाथ श्रम मंत्री है, पैर यातायात मंत्री, नाक स्वास्थ्य मंत्री है, आँख कानून मंत्री, दिल वित्तमंत्री है, फेफड़े गृह मंत्री और आत्मा राष्ट्रपति है। इतना सब कुछ तो आपके पास है फिर क्यों आप लाल–पीली बत्ती माँगते–फिरते हो? अरे! प्रभु के नाम लगाने को सिर्फ समय माँगों बस।
भक्ति
मंदिर में सिर्फ कपड़े बदलकर न जायें बल्कि अपना मन बदलकर जायें क्योंकि भगवान् आपके शुद्ध कपड़े नहीं देखता वह तो आपके मन को देखता है कि मन शुद्ध है या नहीं।
भक्ति
आप भगवान् के दास बन जाओ तो भगवान् आपको मालिक बना देंगे।
भक्ति
भगवान् का भक्त कितनी ही नीची जाति का क्यों न हो, वह भक्ति हीन विद्वान् से श्रेष्ठ है।
भक्ति
जो भगवान् का भक्त नहीं, वह करोड़पति होने पर भी कंगाल है।
भक्ति
भक्त की परीक्षा वक्त पर होती है।
भक्ति
जैसे वृक्ष के नीचे ताली बजाने से उस पर बैठे पक्षी भाग जाते हैं, वैसे प्रभु की भक्ति (भजन) स्मरण से आत्मा के पाप कर्म उड़ जाते है।
भक्ति
संसार में भगवद्भक्ति के समान मूल्यवान कोई चीज नहीं है।
भक्ति
जैसे थोड़ी सी औषधि भयंकर रोग को शांत कर देती है और जैसे थोड़ा सा अमृत मृत्यु के भय को दूर कर देता है, उसी प्रकार ईश्वर की थोड़ी–सी स्तुति बहुत से पापों को नष्ट कर देती है।
भक्ति
भक्ति में भय नहीं होता और भय से भक्ति नहीं होती।
भक्ति
भक्ति के मार्ग में सिद्धान्त नहीं श्रद्धा काम आती है।
भक्ति
जैसे आप संकट में साँस लेना और भोजन करना नहीं छोड़ते, उसी प्रकार कष्टों में भक्ति करना न छोड़ें। क्योंकि यदि आप भोजन छोड़ देंगे तो जिंदा न रह सकेंगे और भजन छोड़ देंगे तो ठीक से मर भी नहीं पायेंगे।
भक्ति
भक्ति ने संगीत को और संगीत ने भक्ति को बहुत आगे बढ़ाया है।
भक्ति
भक्त और भगवान् में मात्र इतना अन्तर है कि भक्त खदान में उस हीरे के समान है जो अभी सान पर नहीं चढ़ा है, जबकि भगवान् उस हीरे की भाँति है जो सान पर चढ़कर विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर चुका है।
भक्ति
भोगों की प्राप्ति सदा के लिए नहीं होती और सबके लिए नहीं होती। परन्तु भगवान् की प्राप्ति सदा के लिए होती है और सबके लिए होती है।
भक्ति
भगवान् को मनाने में नहीं अपितु भगवान् को मानने में कल्याण होता है।
भक्ति
भोजन शरीर की खुराक है और भजन आत्मा की खुराक है।
भक्ति
जैसे श्रद्धा के बिना वैद्य की औषधि काम नहीं करती, उसी प्रकार आस्था के बिना मन्त्र भी काम नहीं करता है।
भक्ति
केवल ईश्वर का चिन्तन करने वाला मन, केवल मधु ही पीने वाले भ्रमर के समान है।
भक्ति
संसार का संपूर्ण विस्मरण और परमात्मा का सतत् स्मरण ही मुक्ति है।
भक्ति
संसार की तरफ चलने वाले का कोई भी साथी नहीं होता, पर भगवान् की तरफ चलने वाले के सब साथी हो जाते हैं।
भक्ति
सुख के लिए परमात्मा की प्रार्थना होना चाहिए, याचना नहीं।
भक्ति
संसार से सम्बन्ध जोड़ें तो दु:खों का अन्त नहीं है और भगवान् से सम्बन्ध जोड़ें तो सुखों का (आनन्द का) अन्त नहीं है।
भक्ति
जिसकी बुद्धि में जड़ता (सांसारिक भोग और संग्रह) का ही महत्त्व है, ऐसा मनुष्य कितना ही विद्वान् क्यों न हो, उसका पतन अवश्यम्भावी है, परन्तु जिसकी बुद्धि में जड़ता का महत्त्व नहीं है और भगवत्प्राप्ति ही जिसका उद्देश्य है, ऐसा मनुष्य विद्वान् न भी हो तो भी उसका उत्थान अवश्यम्भावी है।
भक्ति
पूजा करने वाला पूजा करने में अपने उत्तम गुणों को बाहर लाता है।
भक्ति
भगवान् की पूजा के लिए सबसे अच्छे पुष्प हैं–श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, दया, मैत्री, सरलता, साधुता, समता, सत्य, क्षमा आदि दिव्य गुण।
भक्ति
हे भगवन्! मेरा बोलना आपकी जाप हो, मेरी चेष्टाएँ आपकी उपासना से सम्बद्ध मुद्राओं की रचना हो, चलना आदि प्रदक्षिणा लगाना हो, भोजन करना आपको विधिवत् दी गयी आहुतियाँ हो, भूमि में लेटना आपके लिए प्रणाम हों, इस प्रकार जितना भी मेरा विलास और चेष्टाएँ हैं, वे सब आत्मार्पण की विधि से की गई आपकी पूजा के पर्यायवाची हो जाएँ।
भक्ति
पूज्य पुरुषों की पूजा पूर्वक किए हुए कार्य अवश्य ही सफल होते हैं।
भक्ति
भगवान् के भक्त बनना भिखारी नहीं क्योंकि भक्त को बिन माँगे मिलता है जबकि भिखारी द्वार–द्वार पर माँगता फिरता है।
भक्ति
यदि तुम सर्वज्ञ परमेश्वर के श्री चरणों की पूजा नहीं करते हो तो तुम्हारी सारी विद्वत्ता किस काम की है?
भक्ति
जो मनुष्य प्रभु के गुणों का उत्साहपूर्वक गान करते हैं, उन्हें अपने–बुरे कर्मों का दु:खद फल नहीं भोगना पड़ता है।
भक्ति
जो बचपन और जवानी में भजन–साधना नहीं करते, वे प्राय: बुढ़ापे में भी भजन–साधना नहीं कर सकते हैं।
भक्ति