Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 266

तप की प्रेरणा।

39 सूत्र

जीवन का उपभोग नहीं तपस्या करके श्रेष्ठतम उपयोग करो।
पुरुषार्थ
जग के सारे पदार्थ यदि हमारी इच्छानुसार परिणमन करें तो हमें सुख हो पर ऐसा नहीं हो सकता, अपने शरीर तक को अपने अनूकूल नहीं परिणमा सकते तो पर को अपने अनुकूल कैसे परिणमा सकते हैं?
संतोष
यह राग आग दहे सदा, तातें समामृत सेइए, चिर भजे विषय कषाय, अब तो त्याग निज पद बेइए। दाव मत चूको यह- ये महत्त्वपूर्ण वाक्य है, मौका मिला है तो आत्म हित कर लेना चाहिए, जैसे राजगृही में लिफ्ट लगी है, वह चलती रहती है, जो साहस करके बैठ गया तो ऊपर पहुँच जाता है, वरना इसी मौके के लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है।
अनासक्ति
रोटी के दोनों पहलू अच्छी तरह सिक जाते हैं तब वह सिकी कहलाती है, उसीप्रकार जो दोनों तप को तपता है वही तपस्वी कहलाता है।
पुरुषार्थ
आहार ग्रहण का उद्देश्य- भूख की वेदना शमन के लिए, संयम की सिद्धि के लिए, अपनी तथा दूसरों की सेवा के लिए, प्राण धारण करने के लिए तथा मुनि के छह आवश्यक कर्तव्य, ज्ञान, ध्यान आदि के लिए मुनि को आहार ग्रहण करना चाहिए।
आहार
जल तरणी विद्या- एक शिष्य ने बारह वर्ष में जल तरणी विद्या सिद्ध की, और उत्सुकता पूर्वक गुरु को बताया, तो गुरु ने कहा अरे दस रुपए की विद्या के लिए तुमने बारह वर्ष नष्ट कर दिए, नाविक को दस रुपए देकर पार हो जाते दस वर्ष क्यों गंवा दिए, यदि भव तरणी विद्या सीखी होती तो संसार से पार उतर गए होते।
विवेक
भोजन छोड़ने का उद्देश्य- अचानक कोई मारणान्तिक पीड़ा होने पर, देव आदि के द्वारा उपसर्ग किये जाने पर, ब्रह्मचर्य को निर्मल करने के लिए, शरीर को कृश करने के लिए, तप के लिए और प्रणियों पर दया तथा समाधिमरण आदि के लिए साधु को भोजन नहीं करना चाहिए।
आहार
सब शुद्धियों में तप की शुद्धि प्रशंसनीय है, देव तप शुद्धि से शुद्ध मनुष्यों के सेवक होते हैं।
संयम
जो सज्जन विषयों को विष के समान देखकर तपश्चरण करते हैं, वे पुण्यशाली हैं, महोत्साही हैं और वे परम उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त होते हैं।
संयम
अष्टमी अष्ट कर्मों का अन्त करने वाली है, चतुर्दशी सिद्धि प्राप्त कराने वाली है और पञ्चमी केवलज्ञान प्राप्त कराती है, अतः इन तीनों पर्वों के दिन उपवास करना चाहिए।
धर्म
निकाचित कर्म तब तक भस्म नहीं होते जब तक जिनागम में कथित तपरूपी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती है।
कर्म
भय, उदारता, कीर्ति, लज्जा और आशा इन पाँच कारणों से पञ्चम काल में जैन धर्म चल रहा है।
धर्म
पागल, आलसी, मदहोश, थका हुआ, क्रुद्ध, क्षुधातुर, लोभी, भीरु, उतावली करने वाला और कामी पुरुष धर्म को नहीं जानता है।
धर्म
मनुष्य रोते हुए जन्मता है, अपेक्षाओं में जीता है और निराश होकर मरता है, ऐसे में साधना और धर्म का मार्ग ही कल्याणकारी है।
धर्म
व्यक्ति साधना के बारे में बहुत सोचता है, वासना के बारे में विना सोचे पुरूषार्थ करता है।
पुरुषार्थ
सुख साधनों से नहीं साधना से मिलता है।
संतोष
संसारी व्यक्ति ज्योतिष के चक्कर में पढ़ता है, आध्यात्मिक व्यक्ति मन की गति पकड़ता है, हस्त रेखाएं नहीं भुजाएँ देखो 'अर्थात् पुरुषार्थ करो'।
पुरुषार्थ
अमीर बनने के लिए पाँच साल की साधना चाहिए, विद्वान् बनने के लिए दस साल, डॉ. बनने के लिए पन्द्रह साल, वैज्ञानिक बनने के लिए बीस साल तथा मन को जीतकर भगवान् महावीर और बाहुबली बनने के लिए जन्म जन्मान्तरों की साधना चाहिए।
पुरुषार्थ
'तपः सर्वार्थसाधनं'- तप समस्त पुरुषार्थों की सिद्धि करने वाला है।
पुरुषार्थ
तन मिला तुम तप करो, करो कर्म का नाश। रवि शशी से भी अधिक है तुम में दिव्य प्रकाश॥
पुरुषार्थ
तप चाहे सुरराय, करम शिखर को वज्र है। द्वादश विधि सुख दाय, क्यों न करे निज सकति सम॥
पुरुषार्थ
राचन जोग स्वरुप न याको विरचन जोग सही है। यह तन पाय महा तप कीजे यामे सार यही है॥
पुरुषार्थ
काना पोंडा पड़ा हाथ यह चूसे तो रोवे। फले अनन्त जु धर्मध्यान की भूमि विषै बोवे॥
ध्यान
आप हर मञ्जिल को मुश्किल समझते हैं, हम हर मुश्किल को मञ्जिल समझते हैं। बड़ा फर्क है हमारे और आपके नजरिये में, आप दिल को दर्द और हम दर्द को दिल समझते हैं॥
पुरुषार्थ
जो तप तपे खपे अभिलाषा, चूरे कर्म शिखर गुरु भाषा।
पुरुषार्थ
उत्तम तप निर्वाञ्छित पाले सो नर करम शत्रु को टाले।
पुरुषार्थ
जो जीव के लिए उपकारी है, वो शरीर के लिए अपकारी है और जो शरीर के लिए उपकारी है, वो जीव के लिए अपकारी है।
अनासक्ति
कोई तपस्वी सन्तान, धन, स्वर्गादिक की तृष्णा से तपस्या करते हैं किन्तु हे शीतलनाथ भगवन्! आपने जन्म, जरा और मरण के नाश के लिए मन, वचन, काय को स्थिर करके ध्यान किया।
ध्यान
शरीर में क्षमता न होने के कारण चिरकाल तक तपस्या नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं, किन्तु मन से वश में करने योग्य कषाय रूपी शत्रुओं को नहीं जीता तो यह तुम्हारी अज्ञानता है।
संयम
'अहिंसा, संयम व तप रुपी धर्म' मङ्गल और उत्कृष्ट कहा गया है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
धर्म
वह बाह्य तप माना जाता है जिससे मन दूषित न हो, योगों में हानि न हो तथा श्रद्धा बनी रहे।
संयम
वन में वास, कायक्लेश, मासोपवास, अध्ययन, मौन इत्यादि समता से रहित श्रमणों का क्या कर लेंगे? अर्थात् समता के विना ये सभी मोक्ष प्राप्त नहीं करा सकते।
संयम
मोक्षमार्ग में जिसने जितने अंशों में अथवा जितने समय तक इन्द्रिय, कषाय और संज्ञा को वश में किया है उसने उतने अंशों में अथवा उतने समय तक पाप आस्रव को रोका है।
संयम
जो व्यक्ति कषाय रूपी शत्रुओं को जीतता है, दूसरों के दुर्वचन सहन करता है, अन्य साधर्मी के द्वारा किये गये अनादर और देव आदि द्वारा किये गये उपसर्गों को सहता है उसकी बहुत निर्जरा होती है।
क्षमा
प्रमाद से भरी हुई प्रवृत्ति, कलुषता (कषाय की तीव्रता), विषयों की लोलुपता, दूसरों को पीड़ा देना और पर की निन्दा करना ये सब पाप आस्रव के कारण हैं।
कर्म
तप, महाव्रत, ध्यान और निर्वाण मनुष्य गति में ही प्राप्त किया जा सकता है।
धर्म
अगर क्रोधादिक क्षीण हो गए हैं, तो तपस्या के द्वारा खेदखिन्न होने की आवश्यकता नहीं है और अगर क्रोधादिक हैं तो केवल तपस्या से कल्याण नहींहोगा।
क्षमा
पाषाण से प्रतिमा- प्रतिमा की पूजा देख पाषाण खण्ड बोला, बहिन लोग बड़े पक्षपाती हैं तुम्हारा और हमारा अंश और वंश एक है, लोग तुम्हे पूजते हैं, और हमसे टिककर बैठते हैं, प्रतिमा ने कहा तुमने हमारी साधना और समर्पण नहीं देखा, हमारी छाती पर बैठकर छैनी-हथौड़ा से अनावश्यक कलेवर निकाला गया, तब आज हमारी पूजा हो रही है, पूज्य बनने के लिए साधना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
विद्यार्थी सोलह से बीस वर्ष तक अध्ययन की कठोर साधना करता है तब सर्विस मिलती हैं, स्त्री नौ माह गर्भ सम्भालती है, तब पुत्र का मुख देखने को मिलता है, किसान चार माह तप करता है तब फसल मिलती है, दुकान दार दुकान पर बैठकर दिन भर मेहनत करता है तब पेटी भरती है, इसी प्रकार साधक वर्षों वीतरागता की साधना करते हैं तब परमात्मा बनते हैं।
पुरुषार्थ