Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
ध्यान

अपत्य वित्तोतर लोक तृष्णया, तपस्विनः केचन कर्म कुर्वते। भवान् पुनर्जन्म जराजिहासया, त्रयीं प्रवृत्तिं समधीरवारुणत्॥

कोई तपस्वी सन्तान, धन, स्वर्गादिक की तृष्णा से तपस्या करते हैं किन्तु हे शीतलनाथ भगवन्! आपने जन्म, जरा और मरण के नाश के लिए मन, वचन, काय को स्थिर करके ध्यान किया।

Some ascetics practise austerity out of craving for children, wealth or heaven; but You, O Lord Shitalnath, steadied mind, speech and body and meditated in order to destroy birth, old age and death.

— आराध्य सूत्र · #27

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