Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 26

हाथी पाकर, खुश होता ईंधन ढोकर।

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जिससे ज्यादा राग हो वह धोखा दे तब लगता है राग दुःखदाई है।
अनासक्ति
वैराग्य के विना अध्यात्म का उपदेश पचता नहीं है।
अनासक्ति
जिनका हृदय क्रूर है वे धर्मात्मा कैसे हो सकते हैं।
धर्म
धर्मात्मा इस बात का अवश्य ख्याल रखता है कि कहीं मेरी खुशी में किसी की आँखों में आँसू तो नहीं छिपे हैं।
अहिंसा
अपने दोष अपने को दिखाई नहीं देते जैसे अपनी आँख की लालिमा स्वयं को दिखाई नहीं देती, अगर कोई बताता है तो हमें नाराज न होकर उसे सुधार लेना चाहिए।
विवेक
ब्रह्मचर्य के विना शेष गुण महत्त्व को प्राप्त नहीं होते हैं अतः ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये गम्भीर होना जरूरी है।
ब्रह्मचर्य
विशालहृदय में ईर्ष्या का वास नहीं होता है तथा घृणा सेवा में बाधक है।
चरित्र
जहाँ आज तक सन्तोष नहीं मिला अज्ञानी प्राणी वहीं खोज रहा है।
संतोष
ईमानदार की लोग मदद करते हैं।
सत्य
समर्पित को धोखा देना महापाप है।
चरित्र
आकुलता संसार को बढ़ाने वाली है।
मन
नासमझ दूसरों को समझाना चाहता है, उसकी बात भीतर से नहीं मुँह से निकलती है, इसलिए कानों तक रहती है हृदय तक नहीं पहुँचती है।
वाणी
सारा जीवन सुख के साधन जुटाने में और दुःख के साधन हटाने में निकल जाता है।
अनासक्ति
दीक्षा भूमिका है, पूर्णता नहीं, अपना अपराध दूर करना मोक्ष मार्ग है।
धर्म
निष्पक्ष होने से नई बात सीखने को मिलती है।
विवेक
अज्ञानी को और सब का पता है पर खुद का पता नहीं है।
ज्ञान
वैरागी को आभार भी भार लगता है।
अनासक्ति
दिखने वाले पुद्गल को ओझल कर देखने वाले आत्मा को देखो।
ज्ञान
जीवन भर रावण का काम किया, अन्त में शव को 'राम नाम सत्य है' सुनाते हैं। यह विडम्बना नहीं तो क्या है?
चरित्र
जो अपना नहीं उसी की चिन्ता में संसार बसा है, संसार की असलियत देख लें तो राग खत्म हो जाये।
अनासक्ति
जीवन आदर्श से बदलता है उपदेश से नहीं।
चरित्र
भोग का काल अल्प, लालसा का काल अनल्प होता है।
अनासक्ति
इष्ट-अनिष्ट राग-द्वेष के फैसले हैं, वस्तु स्वरूप नहीं।
विवेक
असुन्दर को ही सजाया जाता है।
विविध
विवाद वस्तु स्वरूप को नहीं बदल सकता है।
सत्य
ककड़ी का जहर निकल जाय तो मीठी लगती है, उसी प्रकार आत्मा का विभाव/विकार निकल जाए तो आत्मा में आनन्द आता है।
संयम
वर्षों का बना महल क्षण में धराशायी हो जाता है उसी प्रकार अनादि का कर्म महल अन्तर्मुहूर्त के ध्यान में धराशायी हो सकता है।
ध्यान
उठा-धरी को पुरूषार्थ समझना कर्तृत्व बुद्धि है।
कर्म
मोह से दूर होना याने मोक्ष के निकट होना है।
अनासक्ति
आशा का गड्ढा सन्तोष रूपी जल से भरेगा, विश्व की सम्पदा से नहीं।
संतोष
सभी पूँछेंगे आप कैसे हैं, जब तक आपके पास पैसे हैं।
धन
झगड़ा न समझी की अचूक पहचान है।
विविध
यश से अधिक सत्य की कीमत है।
सत्य
विनय को विवेक का प्रकाश चाहिये, तत्काल उद्विग्न होना अविवेक है।
विनम्रता
आज परोपकार गौण और यश लिप्सा मुख्य हो गयी है।
चरित्र
व्यक्ति का परिचय वस्त्रों से नहीं, गुणों से होता है वैसे ही आत्मा का परिचय कर्म नोकर्म से नहीं, चैतन्य स्वरूप से होता है।
ज्ञान
अपनी भूल को समझने वाला स्वयं सुधरता है।
विवेक
निन्दक से रूष्ट होना अपने लिये हानिकारक है।
क्षमा
मन वहीं लगता है जहाँ प्रीति होती है।
मन
कड़वा मजाक दोस्ती का जहर है।
संगति
विना विचारे की गयी दया, कहीं-कहीं हिंसा से बढ़कर होती है।
विवेक
जीवन में इतने ज्यादा मीठे न बनें कि लोग चखें और चटकर जायें और इतने कडवे भी न बनें कि लोग चखें और थूँ-थूँ करने लग जायें।
चरित्र
चिड़ियों की तरह हवा में उड़ना और मछलियों की तरह पानी में तैरना सीखने के बाद अब हमें इंसानों की तरह जमीन में चलना सीखना बाकी है।
चरित्र
अपने परिणामों को परखने की कला आ जाये बस यही तो जागृत होना है।
विवेक
धर्मात्मा दयालु ही होगा, सम्यग्ज्ञानी वैरागी होता ही है।
अहिंसा
जो तृण नाखून से टूट जाय, उस पर कुल्हाड़ी चलाने से क्या प्रयोजन है।
विविध
गरीब लोग प्रेम और सहानुभूति के भूखे होते हैं।
दान
घृणा को केवल प्रेम से जीता जा सकता है।
अहिंसा
विवेक की आँखें स्वयं को पतन से बचाती है।
विवेक
सन्त जागते रहें और पापी सोते रहें, तो संसार का भला होगा।
विविध
जय, विजय और प्रभुत्व की आकाङ्क्षा मानवता से पतित कर दानव बना देती है।
चरित्र
ऋण, हत्या और बैर ये संसार के बढ़ाने वाले हैं।
कर्म
पठन कार्य में रसना की लम्पटता बाधक है।
संयम
कृतज्ञता मनुष्यता की जननी है और कल्याण का मार्ग निरीह वृत्ति है।
विनम्रता
घर के साथ-साथ कषाय भी छोड़ो, नहीं तो जहाँ जाओगे वहीं घर बसाओगे।
संयम
पर पदार्थ के आलम्बन से स्वसंवेदन छूट जाता है।
अनासक्ति
अनुभवी हित की बात करता है फालतू बात नहीं करता है।
वाणी
कषाय तीव्र होने पर संसार की कोई भी शक्ति दुर्गति में जाने से नहीं रोक सकती है, एवं कषाय मन्द होने पर कोई भी शक्ति दुर्गति में नहीं ले जा सकती है।
संयम
हँसी मजाक से व्रत भङ्ग हो जाता है।
संयम
क्यों व्यर्थ रोते हो? तुम्हारा क्या गया जो रोते हो? तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था जो नाश हो गया? तुम न कुछ लेकर आये थे, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं पर दिया, खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाओगे, जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, आगे किसी और का होगा, तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो, बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुःख का कारण है।
अनासक्ति