Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 26

हाथी पाकर, खुश होता ईंधन ढोकर।

88 सूत्र · पृष्ठ 2 / 2

निमित्त का असर किस पर- शीशी में रखी शराब से शीशी में कुछ प्रभाव नहीं होता, कोई आदमी पीले, तो नशा चढ़ जाता है।
संगति
आपका हृदय कैसा है- किसमिस के समान, बादाम, नारियल या बेर के समान स्वयं निर्णय करें।
मन
शक्ति को पहचानना, अभिव्यक्त करना और उसका उपयोग कर लाभ उठाना चाहिए।
पुरुषार्थ
शरीर की, वचन की, मन की एवं आत्मा की शक्ति उत्तरोत्तर अनन्त गुनी होती है।
मन
सकारात्मक और नकारात्मक सोच-चार मिलने वालों ने कहा 'आप अस्वस्थ्य दिख रहे हैं' मन ने स्वीकार कर लिया और व्यक्ति बीमार हो गया, तब अस्वस्थ व्यक्ति अपने को स्वस्थ मानेगा, तो स्वस्थ क्यों नहीं होगा? इसके लिए चार की नहीं अकेले की आवश्यकता है।
मन
मुट्ठी में सारी दुनिया का मतलब अगर आपके पास सोच है तो पेन्सिल से सारी दुनिया का नक्शा बना सकते हैं।
मन
जिसकी उच्चकोटि की मानसिकता होती है उसका भाग्य समुन्नत होता है।
समृद्धि
खिलौने नष्ट होने के लिए ही होते हैं, बच्चे को पता नहीं होता इसलिए रोता है, किन्तु बड़े नहीं रोते पर बड़े खिलोने टूटने पर अज्ञानी रोने लगते हैं, ज्ञानी नहीं रोता है।
अनासक्ति
'मुझे वही करना है जो मेरे हित में है' इससे अन्तः स्रावी ग्रन्थियाँ प्रभावित होती हैं, जिससे हमारी शारीरिक शक्ति बढ़ती है व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
मन
पिच्छि के वेंत की तरह मन को ज्ञान के पानी में भिगोकर धीरे-धीरे मोड़ो, वरना टूट जाएगा।
मन
सोच बदले विना चारित्र नहीं बदलता है, अभी तो उजाला दिख रहा है ऐसा मानकर भोजन कर लेते हैं, आलू का त्याग है झोल का नहीं, ऐसा मानकर झोल ले लेते हैं, जब तक चारित्र के प्रति दृढ़ता नहीं होती तब तक चारित्र नहीं पलता है।
चरित्र
मन प्रायः गलत दिशा की ओर प्रेरित करता है, मौज-मस्ती के लिए, पाप-पाखण्ड के लिए, भोग-विलासिता के लिए, धन-वैभव के लिए, नाम-यश के लिए। एक बार मन की हो जाए तो उसकी माँग बढ़ जाती है, मन की मानोगे तो पाप में फँसोगे और दुर्गति में जाओगे। अतः मन को मनाने की कला सीखें। जो मन की मानता है वह आँसू बहाने को विवश होता है और जो मन को मना लेता है वह मुस्कुराने की कला सीख लेता है। धर्म शिक्षा की लगाम से दुष्ट मन रूपी घोड़े को नियन्त्रित कर सकते हैं।
मन
दूर रहकर भी बीमार व्यक्ति के लिए सकारात्मक प्रार्थना या जाप किये गए, उसे शीघ्र लाभ मिला, जिन्हें नकारात्मक प्रार्थना की गयी, वे ज्यादा बीमार हो गये, वचनों के माध्यम से अपने को व दूसरों के चारित्र को निर्मल बना सकते हैं।
मन
आत्मघात किसी भी समस्या का हल नहीं है बल्कि एक नई समस्या है, पहली कक्षा में भर्ती होना है एवं अनेक समस्याओं को निमन्त्रण देना है।
समाधि
मन घड़ी के उस पैण्डुलम की तरह है, जो सदा दायाँ-बायाँ घूमता रहता है।
मन
मन उस विषेले सर्प के समान है, जो काँचुली तो छोड़ देता है पर विष नहीं छोड़ता है।
मन
मन गधे की उस लीद की तरह है, कि जो ऊपर से चिकनी और अन्दर से खुरदरी होती है।
मन
मन उस मृग की तरह है, जो तृण से आच्छादित खाई को न देखकर तृण खाने दौड़ता है और खाई में गिर जाता है।
मन
मन उस श्वान की तरह है, जो हड्डी को चूसते हुये दाड़ों से रिसते हुये खून के स्वाद में खुश होता है।
मन
मन स्तम्भ से बन्धे हुये उस नटखट बन्दर की तरह है, जो कभी शान्त नहीं बैठता, उछल कूँद करता रहता है।
मन
मन उस चिकनी मछली की तरह है, जो पकड़ में नहीं आती, हाथों से बार-बार फिसल जाती है।
मन
मन उन मेंढकों की तरह है, जिन्हें तराजू पर तौलना सम्भव नहीं है।
मन
मन उस बगुले की तरह है, जो कि तन से धवल और मन से काला होता है।
मन
मन विना लगाम के घोड़े की तरह है, जो सवार को मञ्जिल तक नहीं पहुँचाता, गड्ढे में अवश्य पटक देता है।
मन
मन उस जल की तरह है, जिसका कोई निश्चित रूप गन्ध नहीं होता है।
मन
मन उस दरवाजे की तरह है, जो भीतर की तरफ और बाहर की तरफ भी खुलता है।
मन
मन को वश में करने का उपाय परिग्रह और परिचय से अपने को दूर रखना है।
मन
मन की गति- एक प्रश्न पूँछा कि वायु से भी अधिक चञ्चल क्या है? तब उत्तर में कहा- चञ्चल गिलहरी को पकड़ना, समुद्र की लहरों को गिनना, आकाश की ऊँचाई को मापना, सागर की गहराई को मापना आसान है, किन्तु मनुष्य के मन की गति को मापना आसान नहीं है।
मन