Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 20

समय, सलाह, सम्पदा बिना मांगी कभी न दें।

96 सूत्र · पृष्ठ 1 / 2

छोटी-छोटी बातों पर परेशान मत होइये- उदार मन के बनिये, छोटी-छोटी बातों का बतङ्गड़ न बनाइये, भूलने और क्षमा करने के गुणों का विकास कीजिए, छोटी-छोटी बातों पर बिगड़ने से केवल आपके झूठे अहङ्कार को सन्तोष मिलता है।
क्षमा
अहम् त्यागिये- आपके विना भी संसार चल सकता है, संसार रूपी इस महान विद्यालय में कुछ प्रशिक्षण पाने के लिए आपका एक अस्थायी पड़ाव है, कोई महान कार्य करके आप मूल रूप से स्वयं अपनी सहायता कर रहे हैं, संसार की नहीं।
विनम्रता
समय या परिस्थिति के अनुसार इन वाक्यों का प्रयोग करने में संकोच न करिये, कि 'मुझे खेद है', 'मुझसे गलती हो गयी', 'मुझे सहायता की आवश्यकता है' या 'मुझे मालूम नहीं', 'क्षमा करें' इत्यादि।
विनम्रता
बाह्य परिस्थितियों में तनाव पैदा करने की शक्ति नहीं- मानसिक तनाव बाह्य परिस्थितियों के कारण नहीं होता, बल्कि आपकी उनके प्रति प्रतिक्रिया के कारण होता है, आप अपनी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को इस सीमा तक नियंत्रित कर सकते हैं कि बाहरी दुनिया में कुछ भी घटित होता रहे, पर आप पर उसका कोई प्रभाव न पड़े, इससे 'मन' दूसरों के आघातों से प्रभावहीन व स्वतन्त्र बनता है।
मन
अप्रिय घटनाओं से घबराइये मत- जब तक हम उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर नहीं समझें तब तक वे घटनाएं हमें विचलित नहीं कर सकतीं। शान्ति पूर्वक हर चीज को स्वीकार कर उसका सामना किया जा सकता है। किसी दुःखद घटना पर जरूरी ध्यान देना और उसके हानिकारक प्रभावों से बचने के लिए उपाय करना बिल्कुल अलग बात है, लेकिन जरूरत से ज्यादा चिन्ता करने और परेशान होने से समस्या खड़ी हो जाती है। यदि आप चीजों को कुछ दूर से देख सकें तो पायेंगे, कि वे चीजें उतनी भयानक नहीं है जितनी आपने उन्हें झूठे नजरिये से कल्पना करने पर पाया था।
मन
चीजों को त्यागना सीखिए- वास्तव में सच्चाई यह है कि खुशी चीजों को एकत्रित करने में नहीं वरन त्यागने अर्थात् उनका मोह छोड़ने में है। आप जब अपने को किसी विशेष चीज से जोड़ लेते हैं या आसक्त हो जाते हैं, तो आपके विचारों और कार्यों की स्वतन्त्रता खत्म हो जाती है। इससे आप सच्चाई को उस रूप में नहीं देख पाते हैं जैसी कि वह है और सच्चाई का वह अज्ञान कष्ट और विसङ्गति पैदा करता है।
अनासक्ति
क्या आप अपने को अकेला और ऊबा हुआ महसूस करते हैं? आध्यात्मिक शब्दावली में अकेला व्यक्ति वह है जिसे आत्मज्ञान नहीं है और जो स्वयं सत्य का सामना नहीं कर सकता है, केवल ऐसा ही व्यक्ति दूसरी वस्तुओं और व्यक्तियों के पीछे भागता है, ताकि वह अपने मन को स्वस्थ रख सके। जब उसके पास अपने मन को व्यस्त रखने के लिये कोई व्यक्ति या वस्तु नहीं होती है, तो वह ऊबने लगता है, 'वह यह अनुभव नहीं करता कि अपने ध्यान को अपने अन्दर केन्द्रित करके विना किसी वस्तु के भी खुशी पायी जा सकती है।' ऐसा व्यक्ति जो आत्मा में उपस्थित है अपने उस आन्तरिक आनन्द और शान्ति को पाने में सफल रहता है। यदि आप अकेले नहीं रह सकते तो इसका अर्थ है कि आपके मन में शान्ति नहीं है, जिस शान्ति को आप पाने के लिए बेचैन हैं, वह तभी मिल सकती है जब आप अपने साथ मित्रता कर लें, और देर सबेर आपको ऐसा करना ही पड़ेगा। अपने आप से भागना शान्ति की राह नहीं, इससे केवल शान्ति पाने में देर लगती है।
ध्यान
किसी की असहमति या स्वीकृति से परेशान न हो- आपको स्वीकार करने वाला व्यक्ति तकनीकी रूप से आपका मूल्याङ्कन करने के अयोग्य हो सकता है, अथवा वह आपके विरुद्ध द्वेष और विपक्षी मनोभाव रखने वाला हो सकता है, इसलिए आप उसे सही कैसे मान सकते हैं?
मन
व्यवहार और बातचीत में आत्मकेन्द्रित होने से बचिए- बातचीत में 'मुझे, मैं, मेरा' इत्यादि अहम् पूर्ण कथन नहीं होना चाहिए, जब असल में चेतन का विस्तार हो जाता है तो केवल अपने लिए कार्य करने और जीवित रहने का विचार बिल्कुल अर्थ हीन लगने लगता है।
विनम्रता
छः अवसरों में साहस- पद से गिर जाने पर, बीमारी में, नुकसान में, यात्रा में, निःसन्तान होने पर, व्रतों में परेशानी आने पर साहस रखना चाहिए।
पुरुषार्थ
बुरा व्यवहार करने वालों से लड़िए मत- अपना स्तर न गिराकर, उच्च मानसिक स्थिति और आदर्श को बनाए रखकर बुरा व्यवहार करने वालों की उपेक्षा कर देनी चाहिए।
क्षमा
आदर्शवादी के तनाव से बचिए- गलतियों से शिक्षा लेते हुये हम निरन्तर अपना ज्ञान बढ़ाकर और अभ्यास करके अपनी अपूर्णता को कम कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
परिस्थितियों के साथ सामञ्जस्य और समझौता करना सीखिए- विसङ्गतियाँ प्राणियों के कर्मानुसार बनती हैं, हमारी इच्छानुसार नहीं बन सकती हैं, अतः हम जिन चीजों को नियन्त्रित और परिवर्तित नहीं कर सकते हैं, उनके अनुसार अपने को ढालना और उनसे समझौता करना सीखना चाहिए।
विवेक
दूसरों को प्रभावित करने के चक्कर में मत पड़िए- दूसरों को प्रभावित करने के प्रयत्न और उससे खुशी पाने के चक्कर में आप अपनी प्रसन्नता की कुञ्जी अपरोक्ष रूप से दूसरों को सौंप देते हैं। कोई भी कार्य मुख्य रूप से आत्म सन्तोष पाने की दृष्टि से करना चाहिए। दूसरों की सराहना का इन्तजार नहीं करना चाहिए।
संतोष
अपनी समस्याओं व कठिनाइयों का विज्ञापन मत करिये- मानव की प्रकृति के अनुसार कोई भी आपकी समस्याओं में दिलचस्पी नहीं रखता, हर एक व्यक्ति सिर्फ अपनी समस्याओं में रुचि रखता है। आपकी समस्याएं सुनकर सामने वाला ऊब जायेगा या अपने से अधिक परेशान समझकर क्षणिक सन्तोष का अनुभव करेगा। आपकी मानसिक कमजोरी या बचपना समझेगा। अपनी समस्याओं का हल किसी समझदार से लीजिए। लगातार शिकायत व नोंक-झोंक से बचिए। विना पूँछे ज्यादा स्पष्टीकरण और सफाई न दीजिए। लोग अपनी मानसिकतानुसार जो सोचते हैं, सोचने दीजिए।
वाणी
सहनशीलता का विकास कीजिये- सहनशीलता सबसे महान गुण है, अपने प्रति कठोर बनें जबकि दूसरों के दोषों तथा कमियों के प्रति उदार, दूसरों के अपराधों को भूलने और क्षमा करने से मन और चेतना शक्तिशाली और शुद्ध बनती है, एक सहनशील व्यक्ति सभी सीमाओं को पार कर किसी भी ऊँचाई पर पहुँच सकता है।
क्षमा
धर्म के स्वरूप को समझें- धर्म शास्त्रों को पढ़े विना आप धर्म नहीं समझ सकते हैं, और धर्म को समझे विना आप अपना भविष्य उज्ज्वल नहीं कर सकते हैं।
धर्म
हर विषय में न उलझें- एक विषय के ही विशेषज्ञ बनें, सांसारिक विषयों के ज्ञान की कोई सीमा नहीं है, किसी भी व्यक्ति द्वारा हर चीज का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना असम्भव है, इसलिए केवल एक विषय के विशेषज्ञ बनिए और उसी से संसार की सेवा कीजिए, दूसरे क्षेत्रों में आम व्यवहार के लिए सामान्य ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, हमारा लक्ष्य आत्मज्ञान पाना है, संसार चलाना नहीं।
ज्ञान
बेझिझक सहायता दीजिए और लीजिए- यदि कोई सहायता न दे या न ले तो द्वेष न करें, जितना आप देते हैं, उससे अधिक आपको मिलता ही है।
दान
प्रत्येक क्षण का आनन्द लीजिए- कुछ लोग बाद में सुखी रहने के लिए पहले संघर्ष करते हैं, पर शायद वह क्षण आये ही न, अतः प्रत्येक कार्य में आनन्द लीजिए, आनन्द मन में है अतः वस्तुओं के न होने पर भी सुखी रहिए।
संतोष
प्रत्येक व्यक्ति से शिक्षा लें- संसार में ऐसा कोई नहीं जिसे सब कुछ आता हो, अतः प्रत्येक व्यक्ति से कुछ अनुभव लीजिए।
ज्ञान
आकांक्षा लेखन- अपने ध्येय को लिखें, सन्त, पण्डित या वक्ता जो भी बनना चाहते हैं उसे अनेक स्थानों पर लिखें।
पुरुषार्थ
निर्णय शुभ घड़ी का- हजारों मील लम्बी यात्रा का शुभारम्भ मात्र एक कदम से होता है, अतः शुभ घड़ी में सोच विचार कर कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिए।
पुरुषार्थ
दुश्चिन्ता न बने बाधा- दुश्चिन्ताओं से घिरा हुआ व्यक्ति अचानक ही विदारक कष्टों को झेलने के लिए मजबूर होता है।
मन
जो सङ्कटों का भविष्य दृष्टा है, वह दो बार कष्ट प्राप्त करता है, जिस दिन ज्ञात हुआ उस दिन और जिस दिन कष्ट आयेगा उस दिन।
मन
क्रोध एक ऐसी अदृश्य ज्वाला है जिसके अङ्गारों में मनुष्य भीतर ही भीतर सुलगता रहता है, और अपने अद्वितीय व्यक्तित्व को वह अनुपयोगी राख के ढेर में परिवर्तित कर लेता है।
क्षमा
विरोधाभासी आकांक्षाओं को एक साथ उद्देश्य न बनाएँ, यदि आप धनवान बनने की इच्छा रखते हैं तो, सन्त बनने की इच्छा को तिलाञ्जलि देना होगा।
विवेक
एक समय में मात्र एक ही उद्देश्य 'श्रेष्ठ ध्येय' आपको निर्धारित करना है, और जुट जाना है, पूरी शक्ति से उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, फिर आपका ध्येय निश्चित ही आपके जेब में होगा।
पुरुषार्थ
खोजिये अपनी महान कमजोरी- अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को ढूँढकर और उसमें अपेक्षित सुधारकर व्यक्ति उस स्थान पर खड़ा हो सकता है, जहाँ की एक गञ्जे व्यक्ति को भी कङ्घी खरीदने के लिए मजबूर कर सकता है।
पुरुषार्थ
कीजिए विकास सर्वाधिक अपेक्षित गुण का- वक्ता बनने के लिए दर्पण में देखकर पहले एकान्त में अभ्यास करें।
पुरुषार्थ
अपनी कमियों का केवल प्रलाप ही न करते रहें, इस प्रलाप को त्याग कर नई वैकल्पिक दिशा खोजने के प्रयास में जुट जाइये।
पुरुषार्थ
रुचि के चयनित क्षेत्र में प्रतिदिन कुछ न कुछ अवश्य कीजिए, पत्रिकाएँ पढ़िए, व्यवहारिक प्रयोग कीजिये, जो आपके लिए तो लाभप्रद हो, साथ ही आपके समाज एवं राष्ट्र के गौरव में भी अपना कुछ योग दान दे सकें, तभी आप सिर ऊँचा उठाकर गर्व की अनुभूति कर सकेंगे।
पुरुषार्थ
वही जीवन सही अर्थों में सौभाग्य शाली है, जिसने मात्र स्वयं के बारे में नहीं सोचा वरन् समस्त समाज के लिए अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है, अपने जीवन में ऐसे पुष्पों की फुलवारी सजाइये जिसकी सुगन्ध मात्र आपके घर की चारदीवारी तक ही सीमित न रहे बल्कि आसपास को भी लाभ दे सके।
चरित्र
आत्म विश्वास हो आपकी नींव- आत्म विश्वास वह सञ्जीवनी बूटी है, जो व्यक्ति के घोर तम निराशा जन्य, मरणासन्न हृदय में भी नवीन जीवन सञ्चार करने की क्षमता रखती है, आत्म विश्वास ही आपकी वह नींव है जिसका सम्बल पाकर आप विश्व विजय जैसा अति महत्त्वाकाङ्क्षी स्वप्न देखने का भी साहस कर सकते हैं।
पुरुषार्थ
अधिकांश सफल व्यक्तियों ने जो भी कार्य प्रारम्भ किया, इस दृढ़ विचार से प्रारम्भ किया कि असफलता शब्द उनके लिए बना ही नहीं। आत्मविश्वास ही सफलता की प्राप्ति का महामन्त्र है।
पुरुषार्थ
मनुष्य उद्यम से ही सफल होता है, धन एवं विद्या का स्थान गौण होता है।
चरित्र
अपनी कमजोरियों की कभी भी अन्य व्यक्ति के शक्तिशाली बिन्दुओं से तुलना न करें, बल्कि आप ही श्रेष्ठ हैं, यह धारणा अपने मन में अमिट बनाइए। अपनी कमियों एवं अक्षमताओं को अधिक महत्त्व न दीजिए, बल्कि उनमें गुणात्मक सुधार करने का प्रयास जारी रखिए।
पुरुषार्थ
लेखा-जोखा रखिए प्रयासों का- आत्मसंयम, मौन, नियमितता, दृढसङ्कल्पता, मितव्ययता, उद्यमता, लगन, न्याय, परिमितता, स्वच्छता, शान्ति, पवित्रता एवं विनम्रता बनाए रखें।
चरित्र
सतत अध्ययन की प्रवृति अपनाएं, सामाजिक कार्यों में रुचि बढ़ाएँ।
ज्ञान
आप सफल तभी बनते हैं जब आप भी उस सङ्गठन का एक हिस्सा बन जाते हैं, उसके कार्यों में बढ़कर हाथ बँटाते हैं। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है कि आप मात्र हाथ बाँधे ही न खड़े रहें और अन्य लोग सङ्गठन के कार्यों को करते हुए वहाँ उपस्थित जनसमुदाय के आकर्षण का केन्द्र बन जायें। उन कार्यों को करने का अनुभव अर्जित कीजिए, यही अनुभव आपकी सफलता को शीघ्रता प्रदान करता है।
पुरुषार्थ
महान सोचें महान बनें- जैसी सोच होती है प्रायः वैसा ही भविष्य होता है।
मन
जहाँ चाह वहाँ राह- एक बार में मात्र एक ही कार्य करें और उसकी सफलता के लिए पूरी लगन, सम्पूर्ण साधन और सम्पूर्ण शक्ति लगा दें। आकांक्षा पूर्ति में सर्वाधिक सहायक साहित्य का अध्ययन करें। जो भी पढ़ें पूरे मनोयोग से धीरे-धीरे बड़े ही मनन पूर्वक और प्रत्येक वाक्य को आत्मसात करते हुए पढ़िए एवं उद्देश्य पूर्ण रुचि अपनाइए।
पुरुषार्थ
बाँटिए और समस्याओं पर राज्य कीजिये- भली-भाँति समझी गई समस्या आधी सुलझी हुयी होती है।
मन
छोटे बच्चों को भी मित्र बनाइए- अपने अवकाश के समय में कुछ क्षण छोटे बच्चों के साथ रहने के लिए भी सुरक्षित रखिये, इनके साथ खेलने का आनन्द उठाइए। ये आनन्द के सागर हैं। इनकी मीठी-मीठी बातें, तुतलाती बोली, लड़खड़ाते शब्द, आपको आनन्द के सागर में डुबो देंगे। इनकी निश्छल जीवन शैली आपको प्रत्येक वस्तु के प्रति एक न एक दृष्टिकोण से परिचित करायेगी। इनके अजीवों-गरीब प्रश्न आपको अधिक गहराई से सोचने पर मजबूर कर देंगे।
संगति
निश्चित आदेश दीजिए अपने मन को- लक्ष्य के अनुरूप अपने मन से काम लें, महत्त्वाकाङ्क्षी हो, एक मात्र अधिकाधिक उपयोग हो मस्तिष्क का, ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा हो, तो मस्तिष्क पूरी तरह कार्य करता है।
मन
सर्वोत्तम स्मृति से महत्त्वपूर्ण है धुँधली सी लिखावट- अपनी स्मृति का भरोसा न करें महत्त्वपूर्ण बातें अवश्य लिखें।
ज्ञान
अद्वितीय प्रतिभा आपकी- साहसी व्यक्ति अकेला ही आगे बढ़ने का साहस करते हुए महासाहसी बन अद्वितीय सफलता अर्जित करता है।
पुरुषार्थ
प्रसिद्ध कहावत है कि दो नावों में सवार व्यक्ति कभी भी अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाता है।
विवेक
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि किसी तथ्य को दोबारा पढ़ने पर, उसे याद रखने या याद करने में लगभग पैंतालीस प्रतिशत कम समय लगता है।
ज्ञान
विभिन्न व्यक्तियों के नामों को याद रखने से उन व्यक्तियों पर अच्छी छाप छूटती है, एवं व्यवसाय और कार्य क्षेत्र में वाञ्छित सहयोग प्राप्त होता है।
संगति
जो भी सीखें उसका अभ्यास अवश्य करें, अभ्यास ही व्यक्ति को परिपूर्ण बनाता है, 'करत-करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान'।
पुरुषार्थ
रखिए सुनिश्चित ध्येय- आपका उत्तम व्यवहार सौभाग्य को आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो अकेले चलते हैं वे तेजी से आगे बढ़ते हैं।
पुरुषार्थ
पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा व्यवहारिक अभ्यास द्वारा सीखा हुआ ज्ञान मस्तिष्क में अधिक देर रहता है, और आप सफलता को शीघ्र एवं सुनिश्चित करते हैं।
ज्ञान
उत्कृष्ट आकाङ्क्षा- सफलता प्राप्ति के लिए दृढ़ विश्वास रखिए, लाभ में अधिक लालच कष्टों को आमन्त्रित करता है, यह कहावत सत्य है और दुर्भाग्य की पोषक है।
पुरुषार्थ
कैसा भी छोटा मौका मिले उसे हाथ से न जाने दें, बढ़ना ही चाहते हो तो नीचे से प्रारम्भ करो।
पुरुषार्थ
अवसर आने पर उसके लिए स्वयं को तैयार रखना ही व्यक्ति की सफलता का गुप्त रहस्य है।
पुरुषार्थ
क्षणिक या अल्प कालीन उपलब्धियाँ केवल अल्पकालीन प्रसन्नता ही प्रदान करती हैं, साहस में ही लक्ष्मी निवास करती है।
पुरुषार्थ
सुखी होने के दस उपाय- 1.अनावश्यक चीजें न खरीदें, 2.कभी-कभी न बोलना भी सीखें, 3.सबकी राय से निर्णय लें, 4.अपनी गलती स्वीकारें, 5.सम्मान से बुलावें, 6.सदैव व्यस्त रहें, 7.पहले लिखें बाद में उधार दें, 8.व्यवहारिक बनें, 9.सोचें फिर बोलें, 10.बहुत कम बोलें।
संतोष
दुःखी होने के दस उपाय- 1.समय पर काम नही करना, 2.पूर्व सुखों का स्मरण करना, 3.अपनी बात को ही सत्य बताना, 4.देर से सोना-उठना, 5.हमेशा स्वयं के लिये सोचना, 6.लेन-देन का हिसाब न रखना, 7.किसी पर विश्वास न करना, 8.निष्प्रयोजन झूठ बोलना, 9.विना मांगे सलाह देना, 10.किसी के लिए कुछ नहीं करना।
Misc.
सर्वश्रेष्ठ को ही लक्ष्य बनाकर चलें, प्रत्येक दिन अपना कार्य पहले दिन से कुछ अच्छा करने का प्रयत्न करें।
पुरुषार्थ