Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भाग 2 · अध्याय 20

समय, सलाह, सम्पदा बिना मांगी कभी न दें।

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किसी के बारे में बुरा विचारें भी नहीं- विचार बहुत शक्ति शाली हथियार है, कोई भी व्यक्ति अच्छा बुरा जैसा करता है, उसी के अनुसार भोगेगा उसके लिए आप क्यों परेशान होते हैं?
मन
हर परिस्थिति से शिक्षा लें- हर क्षण और परिस्थिति नयी होती है, हम उससे नया अनुभव ले सकते हैं।
ज्ञान
तुलना न करें- आपके पास जो है, उससे अधिकतम सन्तोष पाने का प्रयत्न कीजिए, इस परिवर्तनशील संसार में एक के बाद एक बढ़िया और आकर्षक चीजें आती रहेंगी उनका कोई अन्त नहीं है।
संतोष
विनम्र बनें- सबसे अधिक महान व्यक्ति वह है जो सबका सेवक है, महान व्यक्ति जैसे-जैसे अधिक धन, सम्मान, शक्ति, प्रतिष्ठा पाते हैं, वैसे-वैसे अधिक विनम्र बनते जाते हैं, अहङ्कार करना अविकसित व अस्वस्थ मन की निशानी है, घमण्ड और अक्खड़पन से व्यक्ति निश्चय से पतन की ओर जाता है, वास्तविक महानता गुणों और विशेषताओं से आती है न कि पद या धन से, वही शासन करने योग्य है, जो मुकुटको विना इच्छा के पहनता है।
विनम्रता
सराहना करना चाहिए- अच्छे कर्मचारी को यह बताने से न चूकिए कि कम्पनी के लिए उनका कितना महत्त्व है, इससे प्रोत्साहन मिलता है।
वाणी
अपने निर्णय स्वयं लें- आप दूसरों से सलाह ले सकते हैं, लेकिन अन्तिम निर्णय खुद का होना चाहिए, महान बनने के लिए आपको अपने जीवन में एक न एक खाई खुद ही पार करनी पड़ेगी, किसी न किसी दरवाजे से आपको अकेला ही निकलना होगा।
विवेक
व्यक्ति के पास नब्बे रुपये हैं, तो दस रुपये का आभाव खटकता है, सौ रुपये के चक्कर में रहता है, नब्बे रुपये का सुख नहीं भोग पाता है।
संतोष
आवश्यकता शरीर से जुड़ी है और आकङ्क्षा मन से। दुःख आवश्यकता में नहीं, आकाङ्क्षा में है।
अनासक्ति
शिष्टाचार- जी, श्री, आप, धन्यवाद और कृपया शब्दों का उदारता से उपयोग कीजिए।
वाणी
अपने से बुजुर्ग आगन्तुक का स्वागत करते हुए खड़े हो जाइए।
विनम्रता
उधार ली हुई चीजों को वापस कीजिए, एवं किसी से व्यङ्ग पूर्ण वचन का उपयोग न कीजिए।
चरित्र
रहस्यों को अपने तक सीमित रखिए। उनको बताने के लोभ से बचिए। अपने घनिष्ट मित्र को भी कोई रहस्य बताने से पहले दोबार विचार कीजिए। जो लोग आपके चारों ओर रहते हैं उनके नाम याद रखिए।
वाणी
निजी गोपनीयता का आदर कीजिए, किसी के कमरे में जाने से पहले दरवाजा खटखटाइये आज्ञा लेकर प्रवेश कीजिए।
चरित्र
आप असहमत हो या सहमत जब लोग बोल रहें हों, तो उनके बीच में टोकने की प्रवृत्ति को रोकिए, चाहे वह चीज आप पहले से जानते हों या नहीं। ध्यान से और पूरी तरह सुनिये अपनी बारी आने पर ही बोलिये। एवं क्रोध किये विना असहमत होना सीखिए।
वाणी
समय की पाबन्दी कीजिए बैठकों को निश्चित समय पर कीजिए।
समय
जब तक पूँछा न जाए, लोगो को विना माँगे सलाह न दीजिए, अपने वचनों का पालन कीजिए।
वाणी
काम या व्यापार की बातें सड़क पर न कीजिए। प्रशंसा सबके सामने कीजिए, आलोचना एकान्त में।
वाणी
ऐसे समय भी प्रसन्नता दिखाना सीखिए जब कि आप वैसा अनुभव नहीं कर रहे हैं।
मन
कौन गलत है या सही है इसकी चिन्ता मत कीजिए, जबकि क्या सही है इसकी चिन्ता ज्यादा कीजिए।
विवेक
किसी से पहले कभी न कहिए वह थका हुआ उदासीन या बीमार दिखाई दे रहा है।
वाणी
किसी के द्वारा दी गई सहायता के लिए उनके प्रति आभार तथा कृतज्ञता प्रकट कीजिए।
विनम्रता
काम पर समय से आइये और छुट्टी से पहले मत जाइये।
चरित्र
आपने जो वस्तु जिस परिस्थिति में ली है उसे उसी स्थिति में लौटाइये।
चरित्र
कुछ समय केवल अपने परिवार के लिए सुरक्षित रखिए और उन्हें अपने शब्दों तथा कार्यों से यह जताइये, कि आप उन्हें प्यार करते हैं और वे आपके लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं।
परिवार
जब निंदा करने का अवसर आये तो अपनी जुबान बन्द रखिए, दूसरों को सदैव गलत मत समझिए, निर्णय लेने से पहले दोनों पक्षों को सुन लीजिये, ये छोटी-छोटी बातें समय पर बहुत प्रभाव डालती हैं।
वाणी
सत्ता और शक्ति के पीछे भागें नहीं, उनको अपने आप आने दें, महानता सदैव अपने प्रयत्नों से प्राप्त की जाती है, यह किसी को उपहार में बहुत कम मिलती है। निषेध में आकर्षण होता ही है।
अनासक्ति
अपने मस्तिष्क में केवल ऐसे ही विचार रखने हैं जो आपको प्रसन्नता का अनुभव कराएँ, न कि आपको अवांछित कष्ट प्रदान करें।
मन
वह ही जीवित लोक में, जिसको नहीं कलङ्क। मृतकों में नर है वही, यश जिसका सकलङ्क।।
चरित्र
निन्दक जन पर अज्ञ यह, करता है बहु रोष। पर निज पर करता नहीं, रखकर भी बहु दोष।।
क्षमा
जो पदार्थ इस विश्व में, निश्चित उसका नाश। अतुल कीर्ति ही एक है, जिसका नहीं विनाश।।
चरित्र
ऋषियों का जो वेश धर, बनता कातर दास। सिंह खाल को ओढ़कर, चरता है वह घास।।
चरित्र
धर्मात्मा का रूप धर, जो नर करता पाप। झाड़ी भीतर व्याध सा, बैठा वह ले चाप (धनुष)।।
चरित्र
धूर्त नहीं है त्यागता, मन से कोई पाप। पर निष्ठुर रचता बड़ा, त्याग आडम्बर आप।।
चरित्र
शर (बाण) सीधा होता तथा, वक्र तमूरा आर्य। इससे आकृति छोड़कर, नर के देखो कार्य।।
चरित्र
जिस बुध ने त्यागे अहो, लोक निन्द सब काम। जटा जूट अथवा उसे, मुण्डन से क्या काम।।
चरित्र
हँसी जिसे भाती नहीं, करवानी निज नाम। विना विचारे वह नहीं, करता बुध कुछ काम।।
विवेक